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सूचना विभाग का अंधा अफसर बांटे रेवड़ी, अपने-अपने लोगों को दे, और दूध फड़वाये पत्रकार-बिरादरी का।

By   /  May 28, 2013  /  3 Comments

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-कुमार सौवीर||

खबर है कि अपने-अपने मुंहलगे पत्रकारों को लैपटॉप बांट रहे हैं यूपी सरकार के बड़े अफसर।
जी हां, उप्र के सूचना विभाग के अफसरों ने अपने-अपने लोगों को उपकृत करने के लिए  चुपचाप रेवडि़यां बांटने का तरीका खोज लिया है। मकसद है, अपने-अपने पाले गये पत्रकारों को मलाई का दोना-भर मलाई चटवा दिया जाए। पैसा है सरकारी खजाने का, और मौज ले रहे हैं सूचना विभाग के चंद अफसर और चंद पत्रकार। खबर है कि सूचना विभाग के अफसरों ने प्रदेश के मान्‍यता-प्राप्‍त पत्रकारों में दो-फाड़ करने की कवायद छेड़ दी है।

laptop-distribution

ताजा मामला है लैपटॉप-टैबलेट बांटने का। दरअसल, मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश के छात्रों को लैपटॉप-टैबलेट बांटने की योजना बनायी थी, इसके तहत प्रदेश भर के प्रमुख जिलों में जाकर अखिलेश बाकायदा जलसा के तौर पर छात्रों को लैपटॉप-टैबलेट बांटने निकले हैं। ताकि छात्रों को शिक्षा के इस नये तरीके से अवगत करते हुए इन छात्रों के हाथों में नयी टेक्‍नॉलॉजी सौंपी जा सके। इसी बहाने अखिलेश का जन-सम्‍पर्क अभियान भी जोरों से चल रहा है।

लेकिन इसी बीच प्रदेश सरकार के सूचना विभाग ने भी पत्रकारों को भी उपकृत करने का मूड बना लिया और सरकारी खजाने से एक बड़ी रकम बेहतरीन किस्‍म के लैपटॉप-टैबलेट पत्रकारों में बांटने का अभियान छेड़ा। लेकिन खबर है कि इसमें अफसरों ने एक नया खेल शुरू कर दिया है। बताते हैं कि इन अफसरों ने अपने चंद मुंहलगे पत्रकारों को विश्‍वास में ले लिया और अपने पाले वाले पत्रकारों को चुपचाप यह लैपटॉप-टैबलेट बांटने का गुपचुप अभियान शुरू कर दिया। तरीका यह रहा कि पहले ऐसे पत्रकार को फोन बुलाकर उसके घर अफसर जाएगा और उसे मुख्‍यमंत्री, कुम्‍भ वगैरह परचों से भरा एक आकर्षक डब्‍बा थमाते हुए साथ में यह लैपटॉप-टैबलेट का बैग भी थमा दिया जाएगा।

लेकिन झन्‍नाटेदार खबर तो यह है कि कई पत्रकारों ने ऐसे प्रस्‍ताव को बहुत रूखाई से ठुकरा दिया है। उनका साफ जवाब रहा था कि प्रदेश के मान्‍यताप्राप्‍त और गैरमान्‍यताप्राप्‍त पत्रकारों के साथ यह अफसर बंटवारा की नीति अपना रहे हैं, जोकि इस पत्रकार बिरादरी के लिए बेहद घातक साबित होगी। सूचना विभाग को अगर ऐसी सुविधा देनी ही है, तो उसे बिना किसी भेदभाव के मुहैया कराना चाहिए।

दरअसल, यह अफसरों की नायाब योजना कोई पुरानी नहीं है। मायावती सरकार के दौरान भी ऐसे ही कुछ अफसरों ने पत्रकारों के बीच तरीका तजबीज किया था।

बहरहाल, अब पत्रकारों में नाराजगी इस बात पर है कि किन पत्रकारों के इशारे पर सूचना विभाग के अफसर यह विभेदीकरण वाली नीति अपना रहे हैं। और यह अक्‍लमंदी किस-किस अफसरों के भेजे में घुसेड़ी गयी है और क्‍यों।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Ashok Gupta says:

    gath se kiye jata hai or aa reha hai 1 khavat hai ( pota girega too dhool le kare hi utega) ye raj-niti hai

  2. mahendra gupta says:

    यह हालत पुरे देश की ही है.चाहे केंद्र हो या प्रान्तों की सरकारें ,वे किसी भी दल की क्यों न हो ऐसे ही रेवड़ियाँ बाँट रही है.इन नेताओं के घर से जा भी क्या रहा है.जनता के पैसे से वोट बैंक भी बना रहे हैं,और बिकाऊ मीडिया को भी अपने पक्ष में खड़ा करने की कौशिश भी चल रही हैं.कमीशन की भी नेताओं व अफसरों में बन्दर बाँट हो जाती है.जय भारत,जय लोकतंत्र.

  3. यह हालत पुरे देश की ही है.चाहे केंद्र हो या प्रान्तों की सरकारें ,वे किसी भी दल की क्यों न हो ऐसे ही रेवड़ियाँ बाँट रही है.इन नेताओं के घर से जा भी क्या रहा है.जनता के पैसे से वोट बैंक भी बना रहे हैं,और बिकाऊ मीडिया को भी अपने पक्ष में खड़ा करने की कौशिश भी चल रही हैं.कमीशन की भी नेताओं व अफसरों में बन्दर बाँट हो जाती है.जय भारत,जय लोकतंत्र.

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