/पर्यटकों ने शिमला छोड़ श्रीनगर की राह पकड़ी

पर्यटकों ने शिमला छोड़ श्रीनगर की राह पकड़ी

कम से कम पिछली पांच सदियों से ‘धरती पर स्वर्ग’ के रूप में पहचाने जाने वाले कश्मीर ने उन सारे पर्यटकों को अपनी ओर खींच लिया है जो गत वर्षों में हिमाचल की वादियों में टहला करते थे. जितने समय कश्मीर की घाटी आतंकवाद से पीडि़त रही हिमाचल की पहाडि़यां मैदानी इलाक़ों से सैर सपाटे के लिए आने वाले पर्यटकों को लुभाती रहीं लेकिन जम्मू कश्मीर में हालात बदलते ही हिमाचल जा रहे पर्यटकों ने फिर से कश्मीर की राह पकड़ ली है.

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जहां साल के इन महिनों में कश्मीर के होटल और हाउस बोट पर्यटकों से भरे पड़े हैं वहीं हिमाचल प्रदेश अभी भी उन सैलानियों की आस में बैठा है जो कश्मीर के प्रभावित रहते समय प्रदेश में आया करते थे. विशेषज्ञों का मानना है कि हिमाचल प्रदेश में पर्यटन संबंधित बुनियादी ढांचे के विकास के लिए जिम्मेदार नीति निर्माताओं के उदासीन दृष्टिकोण का शिकार रहा है. वे वर्तमान अधिकारियों की नीति निमार्ण में खामियों की तरफ इशारा करते हैं जो सैलानियों की भीड़ के कारण लाभ तो लूटते रहे लेकिन पर्यटकों के प्रवाह को बनाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कुछ नहीं किया. शीर्ष पर विराजमान अफसरों की गलत पालिसी ही कारण है कि अनगिनत रमणीय प्राकृतिक एवं अन्य दार्शनिक स्थल होने के बावजूद आज हिमाचल प्रदेश को पर्यटकों की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है.

हालात का जाएज़ा लेने के लिए हिमाचल प्रदेश में हमारे संवाददाता ने कई स्थानों का दौरा किया.

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चायल में महाराजा पटियाला के प्रसिद्ध महल के कई कमरे पर्यटकों की प्रतीक्षा में आज भी खाली पड़े हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि साल के इन दिनों में यह महल प्रर्यटकों से भरा रहता था. हालात ऐसे ही हैं कि जब हमारे संवाददाता ने उस जगह का दौरा किया तो महल के लान में बना रेस्तरां जो अन्दर के रेस्तरां के भर जाने पर खोला जाता था ‘बन्द’ का निशान दिखा रहा था. महल के बाहर काटेज की ओर जाने वाले मार्ग पर भी ताला पड़ा था जो हिमाचल की दयनीय स्थिति का खुलासा करने के लिए काफी है.

शिमला से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुफरी का दौरा स्वयं शिमला की दुर्दशा परिलक्षित करने के लिए पर्याप्त था. यदि शिमला से इतने करीब कुफरी में झूले और अन्य सुविधाएं पर्यटकों के अभाव में खाली दिखाई पड़ीं तो यह राज्य की राजधानी की हालत को दर्शाने के लिए काफ़ी था. पर्यटकों की कमी के बावजूद वहां की गंदगी अधिकारियों की गलत प्लानिंग को दर्शाती है. कुफरी के समीप स्थित चिडि़याघर का दौरा करने पर एक पर्यटक की अभिव्यक्ति हिमाचल प्रदेश की बदहाली को पेश करने के लिए काफी हैः ‘असक्षम लोगों के हाथों कुदरती सम्पन्न स्थलों की बरबादी’. विडंबना यह है कि जहां चिडि़या घर में पेड़ों की महान विविधता है जिसमें मानवीय प्रयास का ज़रा भी दखल नहीं, वहीं जानवरों से यह स्थल पूरी तरह खाली है. शिमला, कुल्लू और मनाली भी सुविधाओं में कुछ भी बेहतर नहीं हैं.

इसके विपरीत ऐसा लगता है जैसे पर्यटक केवल कश्मीर में आतंकवाद के थमने के इंतेज़ार में थ., न केवल श्रीनगर में बल्कि कश्मीर के कई शहरों में हर साल निरंतर पर्यटकों की संख्या में बढ़ौतरी होती जा रही है. इस में शक नहीं कि कश्मीरियों के लिए यह वर्ष पिछले कई वर्षों में अब तक का सब से बेहतरीन वर्ष साबित होने जा रहा है.

 

(रियल न्यूज इंटरनेशनल न्यूज़ ब्यूरो)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.