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संगठन को देनी होगी तवज्जो

-राजेन्द्र राज||

सुराज संकल्प यात्रा के जरिए भारतीय जनता पार्टी की नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष वसुन्धरा राजे ने चुनाव की मैदानी तैयारी शुरू कर दी है. यात्रा के दो चरण पूरे हो गए है. मेवाड़ और हाड़ोती क्षेत्र की यात्रा में भाजपा को जनता का अपार समर्थन मिला है. इससे पार्टी के नेता और कार्यकर्ता उत्साहित है. चुनाव में टिकट के दावेदारों के चेहरे खुशी से लबालब है. पार्टी नेताओं को सत्ता के सपने आने लगे हैं. लेकिन, दिल्ली अभी दूर है. इसका अहसास उन्हें होना चाहिए.syraj sankalp yatra
चुनाव में जहां सात महीने का समय है. वहीं, सत्ता हासिल करने के लिए केवल भीड़ जुटने से ही बात नहीं बनेगी. सभाओं में एकत्र होने वाले जन समूह को पार्टी के वोट बैंक में तब्दील करने के लिए जिस मशीनरी की जरूरत होती है, वह भी तैयार करनी होगी. अन्यथा, चार साल पहले जो हुआ, वह फिर से घटित नहीं होगा, इसकी कौन गारन्टी लेगा. इसलिए पार्टी का भला चाहने वाले नेताओं और राजे को हवाई किले बनाने की जगह पार्टी की जड़ों को तलाशना और उनकी मजबूती के लिए खाद पानी के इन्तजाम पर जोर देना होगा.
पिछले विधान सभा चुनाव के समय भाजपा के अतिउत्साही नेताओं ने अपनी कारगुजरियों से पार्टी में ऐसे समीकरणों को जन्म दिया जिनसे भाजपा को सत्ताच्युत होना पड़ा. चाणक्य नीति के अनुसार सत्तारूढ़ शख्स को सत्ता से बेदखल होना पड़े, इससे अधिक शर्मनाक बात उस के लिए और कुछ नहीं हो सकती. येन केन प्रकेरण सत्ता पर कब्जा बनाए रखना ही राजनीति है. राज से बेदखल होने का मतलब राजा की नीतियों के खिलाफ बगावत.
कालान्तर में राजनीति का स्वरूप बदला और सत्ता का मालिक व्यक्ति के स्थान पर जन समूह में तब्दील हो गया. लेकिन, मोटे तौर पर राजनीति के मूल सिद्धान्त आज भी वे ही है. इसलिए भाजपा नेताओं को अपनी उन कमियों व कारगुजरियों को जानना होगा जिनके कारण उन्हें सत्ता से बेआबरू होना पड़ा. यह इसलिए भी जरूरी है कि चुनावी युद्ध की कमान फिर से उन्हीं हाथों में है जिनके हाथों से कांग्रेस ने सत्ता हथियाई थी.
चुनावी राजनीति में सत्ता पर आरूढ़ होने के लिए अनेक चीजों की जरूरत होती है. उनमें सबसे पहला है- पार्टी के पक्ष में जन माहौल. राज्य में इस मामले में कांग्रेस से भाजपा आगे है. बढ़ती मंहगाई, भ्रष्टाचार के नित नए आरोपों और प्रदेश के जातीय समीकरणों में छाई नाराजगी के चलते जनता में कांग्रेस के प्रति नाराजगी है. इसका सीधा लाभ विपक्षी दल भाजपा को मिल रहा है.
दूसरा- पार्टी के नेता का करिश्माई व्यक्तित्व. भाजपा फिर से पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की अगुवाई में चुनाव मैदान में उतरी रही है. जनता और राजनैतिक दल भली भांति समझ रहे है कि बहुमत आने पर राजे ही भाजपा की मुख्यमंत्री होगी. राजे का पांच साल का राज जनता ने देखा है. उनके प्रति लोगों का भरोसा है कि सत्ता में आने पर राज्य का पहले की तरह तीव्र विकास होगा. इस विकास से वे भी लाभान्वित होंगे.
क्षत्रपों को साधना होगा
राज्य में चुनाव जीतने के लिए तीसरी लाभदायक स्थिति तब बनती है जब क्षत्रपों का सहयोग मिले. ये क्षत्रप संभाग, जिला या जाति के हो सकते है. इस दृष्टि से राजे को राजनीति के समीकरण साधने की जरूरत है. यद्यपि सुराज यात्रा के पहले चरण में उन्होंने इस दिशा में कार्य किया है. लेकिन, इसका श्रेय उनसे अधिक प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया को जाता है. जिन्होंने पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व के आदेश के बाद राजे के इशारों पर उनका विरोध करने वाले नंदलाल मीणा और किरण महेश्वरी के साथ वे मंच पर नजर आने के साथ ही एकजुटता का सन्देश दिया.
हालांकि मेवाड़ यात्रा में अपनों की नाराजगी दूर करने के राजे के प्रयास भी सार्थक रहे. इसका नतीजा था जब दलित नेता और पूर्व सांसद व गृहमंत्री कैलाश मेघवाल को पैतरा बदलकर सभाओं में राजे का गुणगान करते देखा गया. मुख्यमंत्रित्वकाल में राजे पर हजारों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर वे सुर्खियों में रहे थे. मेघवाल के आरोपों को दोहराकर कांग्रेस ने भी राजे पर भ्रष्टाचार के हमले किए थे. अब मेघवाल चुनौती दे रहे है कि कोई उन्हें बताए कि उन्होंने राजे पर कब भ्रष्टचार के आरोप लगाए थे.

हाड़ोती क्षेत्र की सुराज यात्रा में भी सबको साथ लेकर चलने की स्थिति देखने को मिली. पिछले चुनाव में राजे के प्रबल विरोधी रहे प्रहलाद गुंजल ने अपने इलाके में राजे की यात्रा का भव्य स्वागत किया. कटारिया के दखल के बाद संघनिष्ठ दलित नेता मदन दिलावर को भी यात्रा में यथोचित सम्मान दिया गया. इस यात्रा में ललित किशोर चतुर्वेदी नजर नहीं आए. उनकी अनुपस्थिति का कारण स्वास्थ्य रहा या राजनीति, राजनैतिक प्रेक्षक इस पर नजर रखे हुए है. यद्यपि पिछले चुनाव में चतुर्वेदी की भीतरघात से राजे को काफी नुकसान पहुंचा था.

चतुर्वेदी जैसे कई क्षत्रप अभी तेल देखो, तेल की धार देखो की तर्ज पर देखो और सोचो की नीति के तहत राजे और उनके प्रबन्धकों के पैतरों पर नजर गढ़ाए हुए है. हालांकि यात्रा भी जारी है. पर समय रहते राजे को चतुर्वेदी, घनश्याम तिवाड़ी, ओम माथुर, रामदास अग्रवाल जैसे संघनिष्ठों के साथ जसवंत सिंह यादव, देवी सिंह भाटी जैसे जनाधार वाले नेताओं को भी साधना होगा. तभी सत्ता के सिंहासन के समीप पहुंचना सम्भव हो सकेगा.
कार्यकर्ताओं को दीजिए सम्मान
चुनावी वैतारणी पार करने के लिए चौथा और महत्वपूर्ण कदम होगा, पार्टी की नींव यानी कार्यकर्ताओं को यथोचित सम्मान देना. ये दुरूह कार्य है. भाजपा को सींचने वाले संघ और जनसंघ के वे मूल कार्यकर्ता है जिन्हें न सत्ता की चाह रही और ना ही संगठन में पद की लिप्सा. वे सिद्धान्तों की लड़ाई को धार देने के लिए राजनीति में आए थे. जिन्हें इसी में सन्तोष होता था कि उनकी विचाराधारा के लोग सत्ता में है या उनके सिद्धान्तों वाली पार्टी की सरकार है. उन्हें चाहिए था, प्यार और सम्मान. कालान्तर में यह स्थिति रही नहीं.
सत्ता की चाशनी चाटने वाले चाटुकारों ने पार्टी पर कब्जा कर लिया. बढ़ते जनाधार के मोह में पार्टी के नेता अपनों की भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे और बाहरियों को गले लगाते रहे. सत्ता के लोभ में सिद्धान्त दूर होते रहे. ऐसे में गली – चौराहों और चाय – पान की दुकानों पर पार्टी के सिद्धान्तों की पैरवी में जान जोखिम में डालने वाले कार्यकर्ता अब पार्टी से किनारा कर गए हैं. सम्मान की चाह रखने वाले कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ना होगा. पिछले चुनाव के समय कार्यकर्ताओं से रही दूरी को राजे को अभी से दूर करना होगा. अभी चुनाव में भी समय है और उनके पास भी पर्याप्त समय है. वैसे भी चुनाव में कितनों को टिकट देकर संतुष्ट किया जा सकता है. सम्मान ही है जिससे उन्हें संतुष्टि का भाव दिया जा सकता है.
भारतीय संस्कृति को दे बढ़ावा
कार्यकर्ताओं को सम्मान देने के साथ की राजे को पार्टी सिद्धान्तों को भी तवज्जो देनी होगी. जनसंघ या भाजपा का गठन भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठापित करने के लिए हुआ था. देश में पाश्चात्य संस्कृति थोपने के लिए कांग्रेस को कोसने वाले भाजपा नेताओं को अपने आचरण और व्यवहार से यह जताना होगा कि वे भारतीय संस्कृति के पैरोकार है. इसकी  शुरूआत गौ हत्या और नशे पर रोक लगाने के वादे से की जा सकती है. इसी प्रकार लालफीताशाही और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेंगे, का जनता में सन्देश जाना चाहिए. इससे भाजपा की रीढ कहे जाने वाले संघनिष्ठ कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और वे भाजपा के लिए चुनाव में काम कर सकेंगे.

निष्ठावान नेताओं को मिले कमान

सुराज यात्रा को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे कि वसुन्धरा राजे ही राज्य में भाजपा का पर्याय है. यदि यह सोची समझी रणनीति के अनुसार किया जा रहा है तो इसकी संभावना ज्यादा है कि पिछले चुनाव का स्वाद इस बार भी चखा जाए. राजस्थान में वसुन्धरा ही भाजपा है और भाजपा ही वसुन्धरा है, जैसा राग अलापने वाले राजेन्द्र राठौड़ जैसे नेता सत्ता सुख के ही साथी होते है, सिद्धान्तों के लिए संघर्ष करने वाले नहीं. ऐसे अहंकारी और बाहरी नेताओं को संगठन और सुराज यात्रा के प्रबन्धन में अहमियत देने से राजे को निष्ठावान कार्यकर्ताओं का दिल से साथ नहीं मिल पा रहा है. यात्रा के प्रबन्धन से जुड़े अहम सदस्यों में से एक भूपेन्द्र यादव को राज्य सभा का टिकट मिलने से पहले पार्टी में गिनती भर लोग मुश्किल से जानते थे. ऐसे में इन्हें राज्य के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कितनी जानकारी होगी, इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है. राजे को राज पाना है तो अपनी व्यक्तिगत वफादारी की कसौटी पर कसने के साथ ज्ञानदेव आहूजा जैसे निष्ठावान और संघनिष्ठ विधायकों को अहमियत देनी चाहिए.

व्यक्ति से संगठन बड़ा

दूध देने वाली गाय की लात भी सहनी पड़ती है. एक समय यह कहावत भाजपा में स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत के लिए कही जाती थी. तब भी पार्टी में आज की तरह दो धड़े होते थे. एक- संघ की पृष्ठभूमि के कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देने वाला. दूसरा- अन्य विचाराधाराओं के जुड़ाव के बाद भाजपा कुनबे में शामिल हुए नेताओं को तवज्जो देना वाला. पहले धड़े के अगुवा ललित किशोर चतुर्वेदी और दूसरे के नेता शेखावत. आज के परिपेक्ष्य में कटारिया और राजे. राजनीति में गुट तो होंगे ही. धड़ेबंदी के बिना राजनीति कैसे होगी. चतुर्वेदी और शेखावत के समय विवाद की स्थिति में संघ समन्वय की भूमिका निभाता था. शेखावत जैसे क्षत्रप के बावजूद भी महत्व तो संगठन और सिद्धान्तों को ही दिया जाता था. पहले प्रतिपक्ष के नेता पद से इस्तीफा नहीं देकर, रामजेठमलानी व भूपेन्द्र यादव को राज्य सभा में भेजकर और हाल ही टिकट वितरण में अपना अपर हैंड बनाए रखने के लिए अध्यक्ष पद हासिल कर वसुन्धरा ने भाजपा में शेखावत जैसे क्षत्रप का स्थान तो पा लिया है, लेकिन वक्त की नजाकत को भाप कर शेखावत की शैली में संघ का साथ भी लेना होगा.

संघ का लेना होगा साथ
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से वसुन्धरा ने संघ को साधने के जो प्रयास किए होंगे, वे अभी सार्थक नजर नहीं आ रहे हैं. प्रदेश और स्थानीय स्तर पर संघ पदाधिकारियों ने भाजपा में कार्यरत अपने कार्यकर्ताओं को अभी तक कोई सन्देश नहीं दिया है. व्यक्तिगत बातचीत में संघ पदाधिकारी ’ केन्द्र का निर्णय है’ जैसे एक लाइन के वाक्य के बाद विषय बदल देते है. पहले बाकयदा बैठक लेकर चुनाव की रणनीति पर गहन चर्चा होती थी. संघ के रवैया से संघनिष्ठ कार्यकर्ता उहापोह की स्थिति में है. हालांकि, अभी चुनाव में सात-आठ माह का समय है. इस बीच समन्वय के तारों को मजबूत किया जा सकता हैं. वसु मैडम को यह तो स्मरण रखना ही होगा कि संघ का साथ मिलने के बाद चुनावी नैया को खैना ज्यादा आसान होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.