Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

राजनीति बुरी नहीं, बुरे हम हो गए

By   /  June 8, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

राजनीति पर निगाह भी सब रखेंगे, राजनीति की चर्चा भी चाय-पान की दुकान पर करेंगे, राजनैतिक विश्लेषक बनके अपने को बुद्धिजीवी साबित करेंगे, राजनैतिक आकलन करके लोगों पर रोब ज़माने की कोशिश की जाएगी और अंत में निष्कर्ष निकालेंगे कि राजनीति सबसे गन्दी चीज है. बात-बात में उस नेता का महिमामंडन किया जायेगा जिसने करोड़ों का घोटाला किया हो, दस-बारह मामले अपहरण, हत्या, बलात्कार, डकैती के जिस पर लगे हों, जिस नेता को माफियागीरी करने के लिए जाना जाता हो वो इनकी बैठकों में चर्चा का विषय होता है. गर्व से चमकती आँखें और बारम्बार चौड़े होते सीने को देखकर ही समझा जा सकता है कि ऐसे राजनैतिक विश्लेषकों के लिए राजनीति के क्या मायने हैंpolitics clipart

वर्तमान राजनीति की सबसे बड़ी बिडम्बना यही है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को राजनीति में पारंगत समझता है और खुद को सर्वश्रेष्ठ राजनैतिक विश्लेषक मानता है. इसके साथ जब एकपक्षीय आकलन, पूर्वाग्रह जुड़ जाता है तो वो विद्रूपता की हद तक पहुँच जाता है. इसी विद्रूपता ने राजनीति को भी कलंकित किया है. घनघोर बुराई होने के बाद भी किसी भी दल के प्रतिनिधियों, पदाधिकारियों द्वारा अपने दल के पक्ष में ही बयानबाज़ी की जाती है, ऐसा करना उनका दायित्व अथवा मजबूरी भी हो सकती है. इसके उलट किसी भी दल के घोटालों, भ्रष्टाचार, काले कारनामों के बाद भी आमजन का नजरिया उस दल के पक्ष में रहता है तो समझा जा सकता है कि राजनीति की दिशा किस तरफ मुड़ चुकी है. आज एक राष्ट्रीय दल के अधिसंख्यक नेता, मंत्री, सांसद, विधायक कई-कई घोटालों में, करोड़ों-अरबों के घोटालों में लिप्त पाए गए हैं, उनकी संलिप्तता के पर्याप्त सबूत भी जनता के सामने उजागर हुए हैं, इसके बाद भी यदि जनता उन घोटालेबाज़ नेताओं-मंत्रियों के पक्ष में, उस भ्रष्ट दल के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है तो इसे राजनैतिक नासमझी के साथ-साथ मानसिक दीवालियापन भी कहा जायेगा. ये स्थिति भी राजनीति को पतन की तरफ ले जाती है.

आज के इस जागरूक माहौल में, मीडिया और तकनीकी के दौर में शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो किसी भी राजनैतिक विचारधारा से खुद को जुड़ा हुआ महसूस न करता हो. ये एक तरह की राजनैतिक जागरूकता अथवा राजनैतिक सक्रियता कही जा सकती है किन्तु इस सक्रियता और जागरूकता में एक तरह का पूर्वाग्रह मिलकर इसे स्वच्छ राजनीति के लिए बाधक बना देता है. ये मान लेना कि सिर्फ और सिर्फ उसका राजनैतिक दल अथवा उसकी राजनैतिक विचारधारा ही सर्वश्रेष्ठ है; पार्टीहित को देशहित, समाजहित से बढ़कर मान लेना; अपने समर्थक राजनैतिक दल, राजनीतिज्ञ के तमाम घोटालों, भ्रष्टाचार के बाद भी उसके पक्ष में कुतर्क की हद तक उतर आना राजनीति की दिशा को भ्रमित करता है. यही भ्रम उन तमाम लोगों को भी भ्रमित करता है जो राजनीति का आकलन समझकर नहीं, देखकर ही करते हैं.

ये बात तो सभी को स्पष्ट रूप से गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि बिना राजनीति के देश, समाज एक मिनट भी नहीं चल सकता. हमारी विदेशनीति, अर्थव्यवस्था, कानून व्यवस्था, नीतियां, सामजिक सरोकार आदि-आदि का सञ्चालन सिर्फ और सिर्फ राजनीति के द्वारा ही संभव है. निरपेक्ष भाव से राजनीति को समझे बिना राजनैतिक विश्लेषण किया जाना संभव नहीं. जब तक आमजन के लिए, बुद्धिजीवियों के लिए, राजनैतिक विश्लेषकों के लिए जनता से, समाज से, देश से बढ़कर पार्टीहित होता रहेगा; उसकी भांडगीरी करना बना रहेगा; पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कुतर्क करना बना रहेगा; सही को सही, गलत को गलत कहने का माद्दा विकसित नहीं किया जायेगा तब तक ऐसे लोगों के कारण ही राजनैतिक चरित्रों में गिरावट देखने को मिलेगी; राजनीति की दिशा गर्त में जाती दिखेगी; राजनीति में गंदगी दिखेगी, राजनीति गन्दी दिखेगी.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन।
सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य।
सम्पर्क – www.kumarendra.com
ई-मेल – [email protected]
फेसबुक – http://facebook.com/dr.kumarendra, http://facebook.com/rajakumarendra

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

जौहर : कब और कैसे..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: