Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

साला मैं तो साहेब (प्रेस फोटोग्राफर) बन गया

By   /  June 28, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी||
मैं सलाह देना चाहूँगा कि यदि आप थोड़ा बहुत साक्षर और बेरोजगार हों और समाज में एक शिक्षित एवं सम्मानित व्यक्ति की तरह जीवन जीना चाहते हों तो देर मत कीजिए जल्द ही किसी अखबार का प्रेस रिपोर्टर बन जाइए। बस आप की हर इच्छा पूरी होती रहेगी। क्योंकि मीडिया/प्रेस रिपोर्टर्स की समाज के हर वर्ग में काफी डिमाण्ड है। मसलन माननीयों, सरकारी अधिकारियों को फ्री-फोकट में हमेशा उपलब्ध रहने वाले कथित पत्रकारों की आवश्यकता रहती है। press photografer
इसके लिए आप को करना क्या होगा-
बिन बुलाए आप उन सभी के ‘हुजूर’ में पेश होकर फोटो लें और अपने अखबारों/मीडिया में खबरों का प्रकाशन करें, करवाएँ। ऐसा करने से आप का नाम उन सभी की जुबान पर रहेगा।
आपको लाभ क्या होगा-
आप को समाज के लोग पहुँच वाला मानने की गलती करेंगे। आप एवं आप के अपनों के अवैध धन्धों की अनदेखी करते हुए सम्बन्धित सरकारी मुलाजिम अभयदान देंगे। मजे से पैसे कमाइए। हमारे शहर में ऐसे तत्वों की बहुतायत है जो लिखना-पढ़ना नहीं जानते, लेकिन प्रेस/मीडिया से जुड़कर धन, शोहरत दोनों कमा रहे हैं। क्या समझे आप भी प्रेस रिपोटर्स बनकर माननीय, हाकिम हुक्मरानों के इर्द-गिर्द बने रहिए अखबार/मीडिया के लिए अच्छा खासा विज्ञापन पाएँगे और 25 से 35 प्रतिशत लाभ मिलेगा जिसे अखबार के प्रकाशक देंगे।
इसी बीच मुझे अपनी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों की कुछ बातें याद आने लगी हैं। एक कथित नम्बर वन अखबार के तत्कालीन संपादक ने मुझसे कहा था बेटा हमस ब सरस्वती पुत्र हैं, संवाद लेख लिखने से मतलब रखा करो, अखबार की एजेन्सी और उसके वितरण पर ध्यान मत दो। अखबार का स्वामी पैसे वाला है यह उसकी समस्या है कि अखबार का वितरण कैसे हो और प्रसार संख्या कैसे बढ़े? तुम लेखन में ही अपना ध्यान केन्द्रित करो। विद्वान सम्पादक (स्थानीय) का देहावसान हुए 33 वर्ष बीत गए। तब से अब तक अखबारों की नीतियाँ बदल गईं। संवाददाताओं पर जिम्मेदारी थोप दी गई प्रसार की। यदि प्रसार कम हुआ और विज्ञापन से धन कम मिला तो अच्छे लेखक, संवाददाता अखबारों से हटा दिए जाते हैं।
बहरहाल छोड़िए आप को मेरी नसीहत बकवास लगेगी। ऐसा करिए दो-चार सिम वाला मोबाइल सेट एक कैमरा वह भी डिजिटल और कहने के लिए लैप या पाम टाप या फिर टैबलेट लो लीजिए। फिर क्या करना है यह भी जान लीजिए। कैमरा टाँग या कमर बेल्ट में एक थैली में रख लीजिए। मोबाइल में जितने अधिक सिम हों सभी की स्विच ऑन रखिए। मित्रों से कह दीजिए कि हर एकाध सेकेण्ड पर आप के नम्बर पर मिस कॉल किया करें। आप अपने मोबाइल सेटों को हमेशा कान से लगाए रखिए। इससे प्रतीत होगा कि इस समय के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति आप ही हैं।
यार एक बात तो भूल ही रहा हूँ वह यह कि जब अखबार के संवाददाता हो ही गए हैं तो एक मोटर साइकिल भी होनी चाहिए। मुझे मालूम है कि आप जैसों के लिए उपरोक्त सभी कुछ मामूली बात है। बिन बुलाए सभा/मीटिंग्स में पहुँच जाइए हालाँकि आप को तो खबर बनानी ही नहीं आती उसके लिए आप को एक लेखक रखना पड़ेगा ठीक है। आप दौड़ भाग कर ‘मनी मैनेज’ करें, पुलिस से दोस्ती कायम रखें पी.एम. ग्रुप से भी अच्छी साँठ-गाँठ रखें फिर तो आप की दसों अँगुलियाँ घी और सिर कड़ाहे में होगा। मुआफी चाहूँगा आप की हमेशा चाँदी ही कटेगी।
मेरी बात पसन्द आ गई हो और आप के भूसा भरे दिमाग का ताला बगैर बनारसी पान खाए खुल गया हो तो उठिए जल्दी करिए पत्रकार/छायाकार बन जाइए। मजाक नहीं कितने लोग जिनके पास कैमरे नहीं है वे अपनी खबरों के साथ आप द्वारा खींचे गए माननीयों/अफसरों (प्रशासन/पुलिस) के फोटो माँगेगें तब आप अपने को बिजी बोलकर भाव बढ़ाना। ऊपर वाले की कसम दे रहा हूँ कि ऐसे किसी भी हमपेशा को अपने डिजिटल कैमरे के अन्दर सँजोकर रखी हुई फोटो कभी मत देना।
आज की नहीं पुरानी बात है आप जैसे अल्पज्ञों का इस्तेमाल घाघ किस्म के लोग करते चले आ रहे हैं। आप जैसे लोग समाज में सुख-सुविधा सम्पन्न होने यानि धन और शोहरत पाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। जल्दी कीजिए ले डालिए 10-15 कापियों की अखबारी एजेन्सी और बन जाइए उक्त अखबार का संवाददाता/फोटोग्राफर। और फिर गाओ… ‘‘साला मैं तो साहेब बन गया, ये सूट मेरा देखो ये बूट मेरा देखो जैसे कोई छोरा लण्डन का।’’ बुरा न मानें तो एक बात कहूँ यदि ऐसे लोगों को देखना है, समझना है तो हमारे शहर आ जाइए। आनन्द आएगा साथ ही अनुभव भी मिलेगा।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: