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शोक में हीं, हीं

By   /  June 29, 2013  /  1 Comment

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-आलोक पुराणिक||

एक नेता मिला, खिलखिलाते हुए, ठिठियाते हुए, बोला-जी मैं शोकमग्न हूं।

उत्तराखंड आपदा पर शोक दरशाते हुए कई नेताओं के इश्तिहार छपे, उनके हंसते-मुस्कुराते फोटू के साथ।6a00d834515db069e200e5534a533f8833-640wi

एक नवोदित नेता इस आपदा के बहाने पहली बार टीवी पर आये। चेहरे पर टीवी पर पहली बार दिखने के सुख से लबरेज संतुष्टि का भाव था, पर थे शोकमग्न।

नेताजी के चंपू मुस्करायमान होते हुए पीछे से मोबाइल पर फोन करके घरवालों-मित्रों को बता रहे थे कि देखो, उस टीवी चैनल पर आ रहा हूं, पर थे शोकमग्न।

हीं हीं करते हुए, थे शोकमग्न।

एक सीनियर नेता के चंपू ने बताया-जी उत्तराखंड की आपदा ना हो, तो भी परमानेंट शोक का सा माहौल रहता है। सीबीआई एक्टिव हो गयी है, कब किसे धर ले, इस शोक में परेशान रहते हैं। बालक-बच्चों के सैटलमेंट ना हो पा रहे, ये शोक अलग है। फिर पब्लिक अलग परेशान किये रहती है कि सिर्फ छह घंटे बिजली आ रही है। इत्ता शोक हो रखा है कि अगर सच्ची में ही शोकमग्न हो जायें, तो चौबीस घंटे भी कम पड़ेंगे। कभी-कभार हंस लें, तब ही फोटू खेंच ले फोटोग्राफर और वो ही फोटू छप जाये।

मैंने निवेदन किया कि नेताजी की दो-चार फोटू और खिंचवा लो रोते हुए, आंखों से आंसू टपकाते हुए। शोक-प्रसंगों में रोती फोटू छपवाया करो।

नेता के चंपू ने अंदर की बात बतायी कि सरकारी काहिली का आपको अंदाज नहीं है। किसी सड़क-हाईवे परियोजना के उद्घाटन के वक्त नेताजी की रोती फोटू छप जायेगी, तब विपक्ष और मीडिया कहेगा-देखो नेताजी को इस सड़क परियोजना में कट-कमीशन ना मिला, सो रो रहे थे उद्घाटन में। आफतें कई हैं।

बात सही है, मैंने नेताजी के चंपू को बताया है कि आप आपदा में हंसती फोटुओं के नीचे नेता के नाम के आगे संत लगा दिया कीजिये। संत फलाने दुख-सुख से ऊपर उठे, हंसी-शोक में फर्क ना करने वाले वीतरागी संत…।

एक फुंकित हृदय कह रहा है-आपदा के हैलीकाप्टर-दौरे में तो हर कोई संत हो जाये, जमीन पे आके देखो, तब पता चले।

अबे पता क्या खाक चलेगा, कायदे के संत आजकल जमीन पे चलते ही कहां हैं।

(आलोक पुराणिक की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. सच्चे संत तो अब हैं ही कहाँ,भगवा कपड़ों में भी अब तो ढोंगी चोर लुटेरे बैठे हैं,मठों को भी अय्याशी का अड्डा बना दिया गया है.वे बेचारे पैदल क्यों चलेंगे?बहुत अच्छी स्तिथ्ती बता दी आपने आभार.

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