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60 पर बदनामी

By   /  July 10, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

साठ के लक्षण इन दिनों सही नहीं हैं जी। यूं साठ परसेंट पर स्कूलों में फर्स्ट डिवीजन कई बोर्ड दे देते हैं, पर साठ परसेंट पर तो इन दिनों कालेज के गेट के अंदर तक एडमीशन ना दे रहे।

साठ पर बदनामी विकट हो रही है।OLYMPUS DIGITAL CAMERA

साठ इस कदर, किस कदर बदनाम होगा, रुपये ने डालर के मुकाबले 60 रुपये तक गिरकर बता दिया था। साठ पर रुपये का पतन रुकेगा, ऐसा विद्ज्जन सोच रहे थे, रुपया अब इकसठ के भी पार चला गया। दो साल पहले यानी 11 जुलाई, 2011 को अच्छा-खासा अधेड़ था 44 पर, एक डालर के बदले तब 44 रुपये मिलते थे। सरकार के कर्मों से रुपया 44 के अधेड़पने से एकदम साठोचित बदनाम हो गया।

बदनामियां अब साठ के पार हैं। दो अलग-अलग राज्यों से खबरें हैं, एक सत्तर पार के, अस्सी पार के नेता ऐसी हरकतें करते पाये गये, जिनसे सीडीबनाने वालों, बेचनेवालों का रोजगार नयी ऊंचाई को प्राप्त हुआ। सीडीयोचित हरकतें साठ के पार नयी ऊंचाईयां ग्रहण कर रही हैं। जीवेम शरद शतम् -ये नेता सौ बरस जीयें और मंदी में चाहे जो भी उद्योग डूब जाये, पर नेताओं की सीडीयोचित हरकतों के प्रताप से सीडी उद्योग पर कभी मंदी ना छाये।

पुराने विद्वान बता गये हैं -पचास की उम्र में बंदे को वानप्रस्थ आश्रम में चले जाना चाहिए यानी वन की तरफ मुंह करके बैठ जाना चाहिए। ये सत्तर-अस्सी साल के सीडीयोचित बुजुर्ग वन में भी ऐसी ताक-झांक मचा देंगे कि सघन-वन में भी सीडी की दुकानें खुल जायेंगी। साठ के पार के कई बुजुर्ग वान-प्रस्थ यानी वन की दिशा में स्थित नहीं होना चाहते, ये वानप्रस्थ नहीं, सुंदरियों को ताकने के लिए किसी मचान-प्रस्थ होना चाहते हैं। शापिंग माल में सुंदरियों को ताकते हुए माल-प्रस्थ होना चाहते हैं, सुंदरियों के बालों में स्थित होकर बाल-प्रस्थ। मोटी खाल-प्रस्थ होकर इनमें से कई उदीयमान बाद में धमाल-प्रस्थ, बवाल-प्रस्थ, सवाल-प्रस्थ हो जाते हैं।

मेरी चिंता सीडीयोचित बुजुर्ग नहीं, रुपये का चाल-चलन है। रुपया साठ के पार जाकर नेताओं की बदनामी को फालो करता हुआ सीडीयोचित नेताओं की उम्र पर आ गया, तो -70,80 रुपये प्रति डालर हो जायेगा। तब क्या होगा।

आइये, किसी सीडीयोचित हरकत करनेवाले नेता से पूछें।

(अलोक पुराणिक की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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