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4835 अपराधी सांसदों और विधायकों की नेतागिरी जाएगी भाड़ में..

By   /  July 11, 2013  /  1 Comment

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जनप्रतिनिधि कानून 8(4) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा  निरस्त करने के बाद अब कई पार्टियों के नेताओं पर गाज गिर सकती है. भाजपा- कांग्रेस समेत कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं पर आपराधिक मामले अदालत में चल रहे हैं.एक आकड़े के अनुसार भारत के लगभग 31 प्रतिशत नेताओं पर आपराधिक मामले लंबित है. एडीआर के अनुसार 1448 विधायक, सांसद एवं विधान परिषद के खिलाफ मामला अभी कोर्ट में है.SC

इन्होंने चुनाव आयोग को दिये हलफनामे में इन मामलों का जिक्र भी किया है. इस से संबंधित पूरी रिपोर्ट राष्ट्रपति चुनाव के वक्त जारी की गई थी. एनईडब्ल्यू और एडीआर ने कुल 4835 सदस्यों की ओर से दाखिल हलफनामों का अध्ययन किया था. इनमें 772 सांसद और सभी राज्यों के 4063 विधायक और विधान परिषद सदस्य शामिल थे. अध्ययन में खुलासा हुआ कि 1448 के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं. ये कुल 4835 का 31 फीसदी है.

1448 में से 641 के खिलाफ हत्या,हत्या की कोशिश,बलात्कार,डकैती,अपहरण और फिरौती जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं. छह सांसदों,विधायकों और विधान परिषद सदस्यों ने हलफनामों में रेप के आरोपों का जिक्र किया है. 141 विधायकों,सांसदों और विधान परिषद सदस्यों पर हत्या के आरोप हैं. 352 पर हत्या की कोशिश के,145 पर चोरी के,90 पर अपहरण के और 75 पर डकैती के आरोप हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अगर इन विधायकों, सांसदों और विधान परिषद के सदस्यों के लंबित मामले का फैसला उनके खिलाफ आता है तो उन्हें न सिर्फ सदस्यता गंवानी पड़ेगी बल्कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. यह तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश है,और हमारे नेता कोर्ट के उन आदेशों को मानने में विश्वास करते है जो उन के पक्ष में हो.सिब्बल साहब ने कह ही दिया है,फैसले को पढ़कर ही कुकन निर्णय करेंगे.मतलब साफ़ है कि फिर कोई पतली गली निकल लेंगे झैसे चुनाव खर्च,दलों के आयकर रेतुर्न भरने के सम्बन्ध में निकल ली,या दलों को आर टी आई के अंतर्गत लेन पर यह सब एक हो गए.कोई भी दल अपराधियों के बिना चल नहीं पता,देश के 50 प्रतिशत से ज्यादा नेता अपराधी हैं,हर दल में है तो इस विषय पर एक हो कर कानून बनाने में उन्हें कोई परहेज नहीं होगा.राजनीती उनके लिए पारिवारिक व्यापार हो गया है.दो साल कि बात तो बाद में आएगी,वे फैसला ही नहीं होने देंगे,तारीख पर तारीख हमारी न्यायपालिका कि विशेषता है, और ये उसे और बढ़ावा देंगे,विपक्षी को ज्यादा सजा दिल उससे मुक्ति पाने और खुद कि कम करवा बचने के जुगाड़ भी किये जायेंगे.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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