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कैमरों का कैरेक्टर

By   /  July 11, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

इंसानों के कैरेक्टर से भरोसा उठने की बात होती है. अब तो सीन ये हैं कि सीसीटीवी कैमरों के कैरेक्टर से भरोसा उठ रहा है.

बिहार में महाबोधि मंदिर में बम धमाके हुए, वहां के सीसीटीवी कैमरों ने ऐसा कुछ ना कैद किया, जिससे जांच को एक ठोस दिशा मिलती.

और इधर दिल्ली की मेट्रो में सीसीटीवी कैमरों ने एक जोड़े के अंतरंग क्षण कैद कर लिये, इन कैमरों को आशिकमिजाज कहना तो आशिकमिजाजी की बेइज्जती है, पर इन सीसीटीवी कैमरों को छिछोरा जरुर कहा जा सकता है.DMRC-executive-director-of-corporate-communications-Anuj-Dayal-said-the-management-has-taken-serious-cognisance-of-the-reported-leakage-of-the-CCTV-footage-and-was-taking-necessary-measures-

महाबोधि मंदिर के कैमरों का कैरेक्टर कतई निकम्मे पांडु हवलदार का सा था, तो दिल्ली मेट्रो के सीसीटीवी कैमरों ने कतई शक्ति कपूराना छिछोरी हरकत की है.

जहां सक्रिय और मुस्तैद होना चाहिए था, वहां तो वो सक्रिय और मुस्तैद ना हुए, कहीं और ही उनकी सक्रियता और मुस्तैदी दिखी.

बात नेताओं की नहीं हो रही है, सीसीटीवी कैमरों की हो रही है.

वैसे एक बात ये भी सामने आ रही है कि परस्पर अंतरंगता दिखा रहे युवा और युवती की यह सीसीटीवी कैमरा फुटेज दिल्ली मेट्रो की नहीं है. कहीं और बाहर की है, उसपे चेपाचापी करके दिल्ली मेट्रो के खाते में डाली जा रही है. मैं इस बात से भी सहमत हूं. सरकारी सीसीटीवी कैमरों की महान परंपरा में कैमरे कुछ खास रिकार्ड ही नहीं करते. अगर सीसीटीवी कैमरों ने कुछ खास रिकार्ड कर लिया है, तो शक स्वाभाविक है कि सीसीटीवी कैमरे सरकारी ना हो सकते, वो मेट्रो के ना रहे होंगे.

खैर मसला सिर्फ कैमरों के कैरेक्टर का भी नहीं है. यू- ट्यूब पर 10 जुलाई, 2013 को सुबह दस बजकर 38 मिनट तक इस मेट्रो-प्रेम-प्रसंग फुटेज को डेढ़ लाख से ज्यादा लोग देख चुके थे. अभी एक डाक्टर मेरे पास भुनभुना रहता था कि डेंगू, मलेरिया, तमाम आपदाओं से बचाने के लिए उसने बहुत अच्छा वीडियो तमाम वैबसाइटों पर अपलोड किया है, कोई ना देख रहा उसे.

मैंने डाक्टर को सुझाव दिया है कि अपने डेंगू विरोधी वीडियो में आगे-पीछे ये मेट्रो प्रेम-प्रसंग लगा ले. चुंबनों की सीरिज के बीच-बीच में डेंगू-आपदा का अभियान भी दबादब देख लेगी पब्लिक.

(आलोक पुराणिक की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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