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मर्डर पाइंट्स का ट्रांसफर

By   /  July 13, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

लो अब जेल से चुनाव भी ना लड़ पायेंगे, तो लोकतंत्र का क्या होगा-लोकतंत्र बचाओ चोरम(चोरों की फोरम का संक्षेप है चोरम) की बैठक चल रही थी। बहुपार्टी चोरम है यह।

लोकतंत्र बचाओ चोरम यानी लोबचो के एक नेता ने विषय शुरु किया-बहुत संकट में है लोकतंत्र, क्योंकि चोर संकट में हैं। उचक्केगिरी की ईंटों से, षडयंत्र के सीमेंट से जो हम पालिटिक्स की पुलिया खड़ी करते हैं। किसी को हक नहीं कि इसे यूं तोड़ दे। चोट्टई की गहरी खाद डालकर, भाई-दामादवाद से हमने इस लोकतंत्र को सींचा है। ऐसा कैसे होने दें कि हम जेल में ही बैठे रह जायें और ये मुरझा जाये।

आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

लोबचो नेता नंबर दो ने कहा-पालिटिक्स पर सब तरफ से मार हो रही है, क्योंकि हम बंटे हुए हैं। चोरम का हर नेता कसम खाये कि हर पार्टी का नेता प्यार-मुहब्बत से कट-कमीशन-पुल-सड़क-हाईवे-स्टेडियम-स्टेशन-एयरपोर्ट-अस्पताल को खायेगा, परस्पर प्रेमपूर्वक रहेगा। कोई करप्शन की शिकायत ना करेगा। जिस तरह से हम संसद में अपनी सेलरी-भत्ते बढ़ाने में एकता दिखाते हैं, उसी तरह से हम हर आइटम खाने में एकता दिखायेंगे। मेरा प्रस्ताव है कि जिसका जितना जनाधार हो, वह अपना धनाधार उतना मजबूत कर ले, झगड़ा-फसाद नहीं। जैसे एक शहर में पांच विधानसभा सीट हैं और तीन एक पार्टी के हैं, दो किसी दूसरी पार्टी के हैं। तो हाईवे को तीन विधायक खायेंगे, अंदर की सड़कों को दो विधायक वाले खायेंगे। कोई शिकायत नहीं करेगा। शिकायत वगैरह ही ना होगी, तो कोई जेल जायेगा ही नहीं।

लोबचो नेता नंबर तीन ने कहा-लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रति विधायक-एमपी के लिए मर्डर का कोटा भी तय होना चाहिए। हर विधायक को कुछ मर्डर-पाइंट्स आवंटित किये जायें, क्योंकि लोकतंत्र संकट में है। जो विधायक हत्या ना कर पायें, वो मर्डर के अपने पाइंट्स किसी विकट हत्यारे विधायक के नाम ट्रांसफर कर दें, ताकि उसे जेल ना जाना पड़े। लोकतंत्र की रक्षा मर्डर पाइंट्स के द्वारा ही संभव है।

लोबचो नेता नंबर चार ने कहा-देश को पब्लिक से बचाकर सिर्फ नेताओं का लंच-डिनर बना दिया जायेगा, उस दिन लोकतंत्र फुल झर्राटे से आ जायेगा।

है किसी की हिम्मत असहमत होने की।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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