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सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, दमन के खिलाफ भी आवाज बुलंद करने की है जरूरत

By   /  August 17, 2011  /  2 Comments

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-कविता सहाय ।।

अन्ना हज़ारे

जब यमन में जनता विद्रोह के लिए उठ खड़ी हुई थी तो विद्रोह की यह आग कई देशों में फैली। ठीक ऐसे ही.. थर्ड मीडिया और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के जरिए। भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त भारत की जनता भी अपने देश में कुछ ऐसा ही देखना चाहती थी। लेकिन हम लोग अहिंसा के पुजारी हैं और अरब मुल्कों के लड़ाकों की तरह खून-खराबा नहीं कर सकते। तभी अन्ना हजारे का आन्दोलन सामने आया और आम भारतीय इस आन्दोलन के साथ जुड़ता चला गया क्योंकि वह आज के हालातों से बड़ा निराश था।

जब आमजन को लगा कि एक 74 साला बुजुर्ग उनके लिए अनशन पर बैठ सकता है तो वे क्यों नहीं उसे समर्थन दें। नतीजा आपने देखा। फिर बाबा रामदेव आये और विदेशों में जमा भारतीय धन वापिस लेन के लिए आन्दोलन शुरू किया, मगर उनके आन्दोलन को जिस तरह रौंद दिया गया और आधी रात को सोते हुए लोगों पर दिल्ली पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और लाठियां भांजी उससे पूरा देश सकते में आ गया।

कांग्रेस सरकार की यह करतूत किसी भी भारतीय के गले नहीं उतर सकती। हमनें उन्हें नेता बनाया है, इसलिए नहीं कि वो हजारों निर्दोष सोते हुए लोगों पर बंद टेंट में आंसू गैस के गोले छोड़े या लाठियों से मारें। अन्ना ने सिर्फ अनशन करने की इज़ाज़त ही तो मांगी थी, उनका पिछला अनशन भी अहिंसक था फिर सरकार के सामने ऐसी क्या नौबत आ गयी कि अन्ना को गिरफ्तार कर लिया गया? वह भी धरना देने से पहले ही।

यहाँ सवाल लोकपाल बिल ही नहीं हमारी अस्मिता का है। हमें सोचना होगा खुले दिलो-दिमाग से कि क्या इस लोकतान्त्रिक देश कि सरकार को इस तरह कि अलोकतांत्रिक और दमनकारी कारनामों कि छूट दे दी जाये। मनमोहन सिंह जी कि ईमानदारी की मिसालें दी जाती हैं पर उनके साथी ही अब तक के सबसे बड़े भ्रष्ट निकले ऐसे में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाना कैसे गलत हो गया?

अन्ना हजारे की गिरफ्तारी न केवल लोकतंत्र के मुंह पर करारा तमाचा है बल्कि हम हिन्दुस्तानियों के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात है। गाँधी के देश में अहिंसावादी आन्दोलन को कुचला जाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा। हमें अपने हर जनप्रतिनिधि, चाहे वो सांसद हो या विधायक, हर किसी से इसका जवाब मांगना होगा और अन्ना हजारे की गिरफ्तारी का विरोध करना होगा।

जहाँ तक लोकपाल बिल का सवाल है, मैं ये नहीं कहती कि अन्ना द्वारा प्रस्तुत जन लोकपाल बिल को जस का तस मान लिया जाये। लेकिन इस देश में जिस रफ़्तार से भ्रष्टाचार बढ़ ही नहीं रहा, हमारी संस्कृति का भी हिस्सा बन रहा है उस पर अंकुश लगाने के लिए कुछ तो करना ही होगा। 121 करोड़ जनता के खून पसीने की कमाई से वसूले जाने वाले टैक्स का सही उपयोग होने के बजाय यह राशि चंद नेताओं, अधिकारियों, व्यापारिक घरानों और सत्ता के दलालों की तिजोरियों में भर जाती है। आखिर क्यों?

इस सवाल का जवाब है किसी के पास?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Suresh Rao says:

    भ्रष्टाचार से ज्यादा महत्वपूर्ण है…इन्सान और इंसानियत ………जब गुजरात में मुसलमान और ओड़िसा में इसाई दंगो में मारे जा रहे थे और उत्तर भारतीयों को महाराष्ट्र से भगाया जा रहा था तब महान संत अन्ना जी कहाँ थे उनको कोई दुःख नहीं हुआ ….कही भ्रष्टाचार की आड़ में कोई साजिश तो देशवाशियो के साथ नहीं हो रही है….सावधान भाई सावधान ……….

  2. Saroj Kumar says:

    Apne desh me bolne ki azadi zaroor hai . Lekin iska matlab ye katai nahi hai ki aap dusre ki azadi par aghat pahuchaye . Apne bhartiya loktantra ki jade kafi gahri hain . Muththi bhar logo ke samarthan ke dum par bhartiya loktantra ki atma bhartiya sansad ko chunauti dene ki harquat bewkufi bhara hi kahlayega . Anna hazare kuchh aisa hi kar rahe hain . Hum sabhi jante hain ki desh me kanoon banane ka adhikar sirf bhartiya sansad ko hai . Ab yadi annaon ke kahe anusar hi kanoon banaye jaane lage to fir sarkar aur sansad ke gathan ki kya zaroorat hai . Anna ke samarthanko ki buddhi mand par gai lagti hai . Loktantra ek chuni hui sarkar ke netritva me chalti hai . Desh me abhi ek chuni hui sarkar hai . Anna ke samarthak apne azende ke sath sahi samay par yani ki aam chunav ke vakt janta ki adalat me jaane ke liye swatantra hain . Bas dhairya ke sath sahi mauke ka intezar kare . Bevakt ki shahnai shobha nahi deti .

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