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लोकपाल एक अण्णा हजारों

By   /  August 18, 2011  /  No Comments

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||लिमटी खरे||

 ‘मैं अण्णा हूं‘ इस तरह के गगनभेदी नारे, सर पर गांधी टोपियों पर लिखा यह जुमला इन दिनों तहलका मचाए हुए है। देश में अस्सी साल के बुजुर्ग से लेकर छः साल तक के बच्चे की जुबान पर इन दिनों अण्णा हजारे का ही नाम है। अण्णा चाहते हैं जन लोकपाल। एक लोकपाल और देश में अन्ना अब करोड़ों की तादाद में पैदा हो चुके हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों, आलंबरदारों की सियासी चालों के चलते राम किशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के आंदोलन का बलात दमन कर दिया गया, किन्तु किशन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे के आंदोलन के दबाया नहीं जा सका। कांग्रेस के सियासी प्रबंधकों ने भले ही इस आंदोलन को तूल देकर लोगों का ध्यान घपले, घोटाले, मंहगाई, भ्रष्टाचार और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की कथित तौर पर हुई कैंसर सर्जरी से हटा दिया हो, किन्तु अनजाने ही कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के प्रति देश के युवाओं का मोह भंग हो चुका है। युवा वोट बैंक अब राहुल की खामोशी को भ्रष्ट, घपले, घोटालेबाजों के प्रति उनका मौन समर्थन ही मानकर चल रहा है।

‘जनलोकपाल‘ नाम की छोटी सी चिंगारी अब जबर्दस्त आग में तब्दील हो चुकी है, जिसे बुझाना मुश्किल ही प्रतीत हो रहा है। कांग्रेस के प्रबंधकों को भी उम्मीद नहीं थी कि अण्णा की छोटी सी अपील इस तरह समूचे भारत के लोगों को एक सूत्र में पिरो देगी। 17 अगस्त को इंडिया गेट पर मशाल जलूस ने आजादी के पहले के जुनून की यादें ताजा कर दीं। आज वयोवृद्ध हो रही पीढ़ी को वे यादें ताजा हो गई होंगी जिसमें आजादी के परवानों ने गोरे ब्रितानियों को खदेड़ने इसी तरह के मार्च किए थे। चालीस से पचास के पेटे में पहुंचने वाले लोगों को आजादी का संदेश देने वाली फिल्में याद आ रही होंगी। वैसे इस मामले में राजनैतिक दलों की चुप्पी संदेहास्पद ही है। संसद में अण्णा की गिरफ्तारी का विरोध तो हो रहा है, पर वह दम खम नहीं दिख रहा है जैसा होना चाहिए था। स्वाभाविक है कि मामला अगर परवान चढ़ता है तो इसका श्रेय अण्णा के खाते में ही जाने वाला है। यही कारण है कि बिना किसी लाभ की उम्मीद के राजनेता भला क्यों कुछ करने लगे।

कांग्रेस ने लोकपाल का प्रारूप बनाकर स्टेंडिंग कमेटी को भेजा है। अण्णा ने 16 अगस्त से धरना देने का अल्टी मेटम दिया था। इसी दिन सुबह अण्णा को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस का आरोप था कि टीम अण्णा द्वारा शांति भंग की आशंका है। इसके बाद टीम अण्णा को सात दिन की हिरासत में तिहाड़ भेज दिया गया। जैसे ही यह खबर फैली देश में आग लग गई। सरकार का पुरजोर विरोध हुआ। सरकार को अपने सूत्रों से मिली खबरें उत्साहजनक नहीं थीं।

फिर क्या था उसी के चंद घंटों बाद ही टीम अण्णा को अघोषित तौर पर प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया कि उससे शांति भंग का खतरा नहीं है, इसलिए उसे रिहा किया जाता है। अण्णा हजारे को माजरा समझ में आया और उन्होंने तिहाड़ छोड़ने से इंकार कर दिया, और कांग्रेस की सारी चालें धराशायी हो गईं। सच है कि कांग्रेस के हुक्मरान देश के कानून को अपने घर की लौंडी मानते हैं। जिसने विरोध किया उसे डाल दो कारावास में और जब मर्जी आए छोड़ दो। अण्णा के प्रकरण को देखकर लगने लगा है कि मानो कांग्रेस के शासकों के लिए कानून चाबी से चलने वाला खिलौना हो गया है। जब तक चाबी चली तब तक गुड्डा ताली बजाता रहा और चाबी खत्म तो उसके हाथ भी रूक गए। फिर चाबी भरी तो फिर गुड्डा बजाने लगा ताली। अगर अण्णा को गिरफ्तार करने का सरकार का कदम सही, न्याय संगत, तर्क संगत था तो फिर सरकार ने अण्णा के सामने हथियार क्यों डाले? क्यों सारी शर्तों को किनारे कर अण्णा की बातों को माना? क्यों 16 अगस्त के पहले इस तरह की सहमति तैयार करने के प्रयास नहीं किए गए?

अण्णा हजारे के कस बल ढीले करने के लिए सरकार ने हर संभव प्रयास किए। पहले तो अण्णा की तबियत खराब होने की हवा उड़ाई। फिर जीबी पंत चिकित्सालय की एक टीम भेजी उनके स्वास्थ्य परीक्षण के लिए। अण्णा ने टीम को लौटा दिया कि जब वे फिट हैं तो फिर इस डाक्टर्स की टीम का क्या ओचित्य। अण्णा को अपने चिकित्सक डॉ.नरेश त्रेहान पर पूरा भरोसा है। नरेश त्रेहान उनका समय समय पर परीक्षण करते आए हैं। डॉ.त्रेहान के बारे में कहा जाता है कि वे अमीरों, राजनेताओं और पहुंच संपन्न लोगों के चिकित्सक हैं, या यूं कहें कि वे राजवैद्य हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। बताया जाता है कि एक केंद्रीय मंत्री के परोक्ष तौर पर स्वामित्व वाले मंहगे, आलीशान फाईव स्टार चिकित्सालय में वे लंबे समय तक कार्यरत भी रहे हैं। इसलिए अगर आज के इस परिवेश में वे भी मानवता को तजकर स्वार्थ सिद्धि में लग जाएं और इस अनशन में अण्णा के स्वास्य को लेकर कोई बाधा आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

उधर अण्णा अनिश्चित कालीन अनशन के लिए अड़े हुए थे। पुलिस पहले तो समयसीमा बेहद कम ही करने पर आमादा थी, बाद में सात दिन, पंद्रह दिन, इक्कीस दिन की अफवाहें सामने आईं। अंततः सरकार पंद्रह दिन के अनशन का समय देने पर राजी हो गई। सवाल यह उठता है कि यह सब नाटक किसलिए? क्या अण्णा के आंदोलन को ध्वस्त करने के लिए? आखिर सरकार चाह क्या रही है? अगर 16 अगस्त को ही सरकार इन बातों को मान लेती जो आज मानी है तो कम से कम अनशन के कारण राष्ट्र का नुकसान तो नहीं हुआ होता। जगह जगह हजारों लोगों ने गिरफ्तारी दी। क्या इसके लिए अतिरिक्त पुलिस बल नहीं लगा होगा? उनके आने जाने, खाने पाने, रूकने ठहरने आदि का भोगमान कौन भोगेगा? क्या यह अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी अंटी से देगा? जाहिर है नहीं, इसका भोगमान तो देश के आम आदमी को ही भोगना है वह भी उसके द्वारा दिए गए करों से।

देश के वजीरे आजम का देश के दोनों सर्वोच्च सदनों दिया वक्तव्य भी अजीब है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह कहते हैं कि अण्णा अपना लोकपाल देश पर थोपना चाहते हैं। कानून बनाने का अधिकार संसद को है और कोई उसे चुनौति दे वह उचित नहीं है। इसके साथ ही साथ वे यह भी कहते हैं कि अण्णा एक सशक्त और प्रभावी लोकपाल बनाने की राह पर हैं, पर उनका तरीका या एप्रोच गलत है। विपक्ष प्रधानमंत्री से यह नहीं पूछ पाया कि अगर अण्णा का लोकपाल का एजेंडा सही है और उनका तरीका गलत है तो सरकार ने जो ड्राफ्ट स्टेंडिग कमेटी के पास भेजा है वह अण्णा के लोकपाल की तर्ज पर प्रभावी और सशक्त लोकपाल की वकालत क्यों नहीं करता है? क्या अण्णा के गलत तरीके के चलते सरकार अपना कमजोर लोकपाल का प्रारूप पास करवाने पर आमादा है? फिर वही बात सामने आ रही है कि इसका श्रेय भी अण्णा ही ले जाने वाले हैं इसलिए सरकार अण्णा के लोकपाल को दरकिनार करने पर आमादा है।

अण्णा को तिहाड़ जेल में रखा जाना भी अपने आप में मजाक से कम प्रतीत नहीं हो रहा है। समाचार चैनल्स चीख चीख कर कह रहे हैं कि अण्णा को तिहाड़ के प्रशासनिक भवन में रखा गया है। आखिर अण्णा को बैरक के बजाए प्रशासनिक भवन में किस हैसियत से रखा गया है? तिहाड़ जेल अब जेल न रहकर दिल्ली का कनाट प्लेस बन गया है, जहां जिसकी मर्जी आ जा रहा है। इसमें सिविल सोसायटी, सरकार के नुमाईंदे बार बार जाकर अण्णा से चर्चा कर रहे हैं। यह कैसी जेल है जहां हर दस मिनिट में बंदी से मिलने कोई न कोई आ जा रहा है? हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपने निहित स्वार्थों के लिए कानून और व्यवस्था की स्थिति उतपन्न होने की बात को ढाल बनाकर सरकार को अपनी मनमर्जी करने की स्वतंत्रता मिल जाती है।

सरकार के लिए सिविल सोसायटी के दो सदस्य सबसे अधिक मुश्किल पैदा कर रहे हैं। एक हैं कानून के कीड़े प्रशांत भूषण और दूसरी पहली महिला आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी। प्रशांत भूषण भारत के कानून का सही इस्तेमाल कर अपने साथियों को बचाने में आमादा हैं तो दूसरी ओर किरण बेदी दिल्ली पुलिस में सालों साल रही हैं। वे उस गोदे (अखाड़े) से भली भांति परिचित हैं जिसमें पहलवान (टीम अण्णा और सरकार) आपस में कुश्ती लड़ रहे हैं। वे इस गोदे के हर दांव को बखूबी जानती हैं सो इसकी काट वे पहले से ही तैयार रखे हुए हैं।

कथित तौर पर बनी सिविल सोसायटी और सरकार के बीच द्वंद जारी है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग अनजाने ही अण्णा के साथ हम कदम हो चुका है। कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के युवा भारत के सपने के आधार स्तंभ युवाओं के स्तंभ अब राहुल से पर्याप्त दूरी बना चुके हैं। टूजी, कामन वेल्थ, एसबेण्ड, आदर्श सोसायटी आदि घोटालों, राष्ट्रधर्म से बड़ा गठबंधन धर्म मानने, बाबा रामदेव और अण्णा हजारे के मसले पर चुप्पी साधने से युवाओं के मन में राहुल के प्रति भी रोष और असंतोष पनपने लगा है।

हो सकता है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने घपले घोटालों और भ्रष्टाचार की आरे से ध्यान हटाने के लिए अण्णा के इस अनशन का उपयोग अपनी तरह से किया हो। यह सच है कि आज अण्णा के साथ के सामने बाकी बातें गौण हो गई हैं। आज लोग सिर्फ और सिर्फ अण्णा की ही बातें कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह प्रसन्नता की बात हो सकती है, पर अनजाने ही कांग्रेस के सियासी प्रबंधकों ने युवाओं को राहुल गांधी से दूर कर दिया है। कुल मिलाकर इस पूरे मामले को देखकर एक ही बात कही जा सकती है कि ‘लोकपाल एक है पर अब अण्णा हजारों से करोड़ों की तादाद में पहुंच चुके हैं।‘

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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