/भारत में वैचारिक आपातकाल का नया दौर शुरू

भारत में वैचारिक आपातकाल का नया दौर शुरू

जन-समाज, सभ्यता और संस्कृति के ख़िलाफ की गई समस्त साजिशें इतिहास में कैद हैं। बाबा रामदेव की रामलीला मैदान में देर रात हुई गिरफ्तारी इन्हीं अंतहीन साजिशों की परिणती है। यह सरकार के भीतर व्याप्त वैचारिक आपातकाल का नया झरोखा है जो समस्या की संवेदनशीलता को समझने की बजाय तत्कालीन उपाय निकालना महत्त्वपूर्ण समझती है। बीती रात को जिस मुर्खतापूर्ण तरीके से दिल्ली पुलिस ने बाबा रामदेव के समर्थकों को तितर-बितर किया; शांतिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह पर जुटे आन्दोलनकारियों को दर-बदर किया; वह देखने-सुनने में रोमांचक और दिलचस्प ख़बर का नमूना हो सकता है, किन्तु वस्तुपरक रिपोर्टिंग करने के आग्रही ख़बरनवीसों के लिए यह हरकत यूपीए सरकार की चूलें हिलाने से कम नहीं है। केन्द्र सरकार की बिखरी हुई देहभाषा से यह साफ जाहिर हो रहा है कि जनता अब उसे बौद्धिक, विवेकवान एवं दृढ़प्रज्ञ पार्टी मानने की भूल नहीं करेगी। इस घड़ी 16 फरवरी, 1907 ई0 को भारतमित्र में प्रकाशित ‘शिवशम्भू के चिट्ठे’ का वह अंश स्मरण हो रहा है-‘‘अब तक लोग यही समझते थे कि विचारवान विवेकी पुरुष जहाँ जाएंगे वहीं विचार और विवेक की रक्षा करेंगे। वह यदि राजनीति में हाथ डालेंगे तो उसकी जटिलताओं को भी दूर कर देंगे। पर बात उल्टी देखने में आती है। राजनीति बड़े-बड़े सत्यवादी साहसी विद्वानों को भी गधा-गधी एक बतलाने वालों के बराबर कर देती है।’’

काले धन की वापसी के मुद्दे पर बाबा रामदेव ने जो सवाल खड़े किए उसका केन्द्र सरकार द्वारा संतुलित और भरोसेमंद जवाब न दिया जाना; सरकार की नियत पर शक करने के लिए बाध्य करता है। स्विस बैंक में अपनी राष्ट्रिय संपति अनैतिक ढंग से जमा है; यह जानते हुए समुचित कार्रवाई न किया जाना बिल्कुल संदिग्ध है। खासकर राहुल गाँधी जैसे लोकविज्ञापित राजनीतिज्ञ जो जनमुद्दों पर अक्सर मायावती से ले कर नीतिश कुमार तक की जुबानी बखिया उधेड़ते दिखते हैं; आज की तारीख में शायद किसी सन्नाटे में लेटे हैं। राहुल गाँधी का ऐसे संवेदनशील समय में चुप रहना अखरता है। उनके भीतर कथित तौर पर दिखते संभावनाओं के आकाशदीप को धुमिल और धंुधला करता है। क्योंकि यूपी चुनाव सर पर है और प्रदेश कांग्रेस पार्टी इस विधानसभा में खुद को रात-दिन जोतने में जुटी है, राहुल गाँधी का काले धन के मुद्दे पर सफेद बोल न बोलना चौंकाता है।

दरअसल, यूपीए सरकार अपनी इस करतूत का सही-सही आकलन-मूल्यांकन कर पाने में असमर्थ है। उसे इस बात का अहसास ही नहीं हो रहा है कि इस वक्त जनता के सामने बाबा रामदेव की इज्जत दाँव पर न लगी हो कर खुद उसकी प्रतिष्ठा-इज्जत दाँव पर है। वैसे भी बाबा रामदेव के जनसमर्थन में जुटी भीड़ हमलावर, आतंकी या फिर असामाजिक कार्यों में संलग्न जत्था नहीं थी। यह जनज्वार तो देश में दैत्याकार रूप ग्रहण करते उस भ्रष्टाचार के मुख़ालफत में स्वतःस्फुर्त आयोजित थी जो काले धन के रूप में स्विस बैंकों में वर्षों से नज़रबंद है। उनकी वापसी के लिए रामलीला मैदान में ऐतिहासिक रूप से जुटना जनता की दृष्टि में बाबा रामदेव को शत-प्रतिशत पाक-साफ सिद्ध करना हरगिज नहीं है। वस्तुतः बाबा रामदेव हों, श्री श्री रविशंकर हों, स्वामि अग्निवेश हों, अण्णा हजारे हों या फिर किरण बेदी व मेधा पाटेकर। जनता को जनमुद्दों के लिए आवाज़ उठाने वाला नागरिक-सत्ता चाहिए। जनता ऐसे व्यक्तित्व के नेतृत्व में सामूहिक आन्दोलन करने के लिए प्रवृत्त होना चाहती है जिसकी बात सरकार भी सुनें और आम जनमानस भी।

बाबा रामदेव इसी के प्रतिमूर्ति थे। जनता उनसे जुड़कर(तमाम व्यक्तिगत असहमतियों एवं मतभेदों के बावजूद) अपने हक के लिए जनमुहिम छेड़ चुकी थी जिसे केन्द्र सरकार और उसके इशारे पर नाचने वाली दिल्ली सरकार ने अचानक धावा बोलकर जबरन ख़त्म करने की चाल चली। यह सीधे-सीधे सांविधानिक प्रावधानों के रूप में प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है। अब जनता सरकार से किन शर्तों पर पूरी निष्ठा के साथ जुड़ी रह सकती है; यह सोचनीय एवं चिन्तन का विषय है।

बहरहाल, सबसे ज्यादा नुकसानदेह यूपीए की पार्टी को ही जमीनी स्तर पर होगी। स्थानीय पार्टी नेता और कैडर किस मुँह के साथ जनता के बीच समर्थन माँगने का चोंगा लिए फिरेंगे; देखने योग्य है। फिरंगी कुटनीतिक आधार और अक्षम राजनीतिक नेतृत्व क्या यूपी में दिग्गी राजा को देखकर वोट देगी जिन्हें सहुर से बोलना भी नहीं आता है। बाबा रामदेव के अनशन को ‘पाँचसितारा अनशन’ बताने वाले दिग्विजय सिंह क्या बताएंगे कि हाल ही में बनारस में हुए महाधिवेशन के दरम्यान उन्होंने पीसीसी कार्यकारिणी की बैठक कहाँ की थी? उनके वरिष्ठ नेता, मंत्री और हुक्मरान कहाँ ठहरे थे? होटल क्लार्क का शाही खर्चा क्या होटल-प्रबंधन ने उनकी पार्टी को सप्रेम भेंट की थी जैसे बाबा रामदेव को भेंट में एक ‘द्वीप’ हाथ लग गया है।

बाबा रामदेव अगर गैरराजनीतिज्ञ होते हुए राजनीति कर रहे हैं तो कहाँ जनता उन्हें भावी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनाने के लिए पागल हुए जा रही है? इस किस्म का घटिया स्टंट प्रचारित करना सिर्फ कांग्रेस जानती है; और पार्टियाँ तो अंदरुनी कलह की मारी खुद ही दौड़ से बाहर हैं। भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित राहुल गाँधी को क्या यहाँ अपना राजनीतिक स्टैण्ड नहीं प्रदर्शित करना चाहिए था? वह भी वैसे जरूरी समय पर जब देश की तकरीबन 55 करोड़ युवा-निगाह उन्हें क्षण-प्रतिक्षण घूर रही है; और वह परिदृश्य से गायब हैं। जागरूक और जुनूनी युवा जब रामलीला मैदान में पुलिस के हिंसक झड़पों का निशाना बन रहे थे। दिल्ली पुलिस उम्र और लिंग का लिहाज किए बगैर लाठीचार्ज कर रही थी, तो क्या उस घड़ी राहुल गाँधी के शरीर में स्पंदन और झुरझुरी होना स्वाभाविक नहीं था? क्या इन बातों को इस वक्त बाबा रामदेव का ‘पाचनचूर्ण’ खाकर पचा लिया जाना ही बुद्धिमत्तापूर्ण आचरण है?

खैर, जो भी हो। एक बात तो तय है कि कांग्रेस के रणनीतिकार और खुद को बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञ मानने वाले पार्टी नेताओं ने कांग्रेसी-पतलून को अचानक ही ढीली कर दी है जिसे चालाक और हमलावर मीडिया ने एकदम से हथिया लिया है। सनसनी के स्वर में ब्रेकिंग न्यूज ‘ओवी वैन’ के ऊपर चढ़ बैठे हैं। जनता देख रही है कि आमआदमी के हित-प्रयासों, मसलों एवं मामलों को ये राजनीतिक सरपरस्त कैसे-कैसे भुना सकते हैं? कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह भले इस घड़ी विजय की रणभेरी बजा रहे हों; दिल्ली के 10-जनपथ पर उत्सव का माहौल तारी हो। लेकिन इस क्षणिक खुशी से आगे भी जहान है जिसे देखने की दूरदृष्टि केवल जनता के पास है। वह आसन्नप्रसवा उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में इस अविवेकी एवं अराजक कार्रवाई का अपने वैचारिक तपोबल से बदला अवश्य लेगी। पाँचसितारा होटलों में कांग्रेस-सरकार चाहे कितने भी दिवास्वप्न देख ले, आगामी दिनों में कांग्रेस पार्टी को इस अभियान को इस तरीके से कुचलना काफी महंगा पड़ेगा।

रामलीला मैदान से लाखों की जमावट-बसावट को हटा देना दिल्ली पुलिस की बहादुरी मानी जा सकती है; लेकिन जनता को झूठी दिलासाओं, भौड़ी नौटंकी वाले सन्देश यात्राओं तथा ख्याली राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक घोषणापत्रों से विचलित कर ले जाना बेहद मुश्किल है। आप अधिक से अधिक पार्टी कैडर बना सकते हैं, किन्तु बहुसंख्यक जनता जो आपके किए कारस्तानियों का यंत्रणा टप्पल, दादरी, भट्टा-पारसौल से ले कर दिल्ली के रामलीला मैदान तक भुगत चुकी है; वह किसी झाँसे और लोभ की आकांक्षी नहीं है। यह तय मानिए बाबा रामदेव फिर कल से अपने अनुयायियों को योग सिखाएंगे। सार्वजनिक मंच से आपके द्वारा किए गए जुल्म की भर्त्सना करेंगे। उनकी पंताजंलि योग पीठ में पहले की माफिक श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहेगा। किन्तु जनता आपको नहीं भूलेगी, नहीं बख्शेगी। जनता आपका पीछा सन 2014 के लोकसभा चुनाव के उस परिणाम तक करेगी जब तक आप देश की जनता के सामने पछाड़ खा जाने की असलियत नहीं स्वीकार लेते हैं।

(प्रेषक: राजीव रंजन प्रसाद, शोध-छात्र, प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी Blog : www.issbaar.blogspot.com मो0: 9473630410)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.