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नक्सलवाद का नया अध्याय, कौन है लाल आतंक का ज़िम्मेवार…?

By   /  July 15, 2013  /  4 Comments

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-फाल्गुनी सरकार||

कहते हैं हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. जब देश के बड़े-बड़े विद्वान छत्तीसगढ़ के दरभा में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए नक्सली हमले की कड़े शब्दों में निन्दा कर रहे थे, उस समय मैं प्रदेश की एक आम नागरिक इसके दूसरे पहलू पर सोच रही थी. आगे कुछ भी लिखने से पहले मैं ये स्पष्ट कर देना चाहूंगी कि सभी मृतकों और उनके परिजनों के प्रति मेरी भी उतनी ही संवेदना है जो किसी भी अन्य आमजन की है. संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार का बड़े ही सावधानी और थोड़े डर के साथ उपयोग करते हुए कुछ लिखने का प्रयास कर रही हूं. प्रार्थना कीजिए कि मैं किसी भी कांग्रेसी या अन्य के कोप का शिकार न बनूं.naxal_killings600

अब तक के नक्सल इतिहास में मरने वालों की सूची में नक्सली, सेना के जवान, पुलिस, आदिवासी महिला, पुरूष, वृद्ध तथा बच्चों का ही नाम रहा. हां, कुछ नाकाम हमलों का इतिहास भी रहा है. पर 25 मई 2013 का दिन इस इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब बाकि सबको छोडक़र सिर्फ राजनेताओं और सक्रिय राजनीति के नक्सल विरोधियों पर निशाना साधा गया. इससे एक बात तो साफ हो गई कि दुनिया गोल है जिस कारण विष का प्रवाह घूमकर वापस अपने प्रणेता के पास लौट आया है. हर कहर अपना रंग दिखाता ही है और राजनीति से ऊपजे कहर ने भी अपने लाल आतंक का रंग दिखा दिया है. ऐसा भी हो सकता है कि शायद नक्सलियों को परिवर्तन यात्रा का अर्थ नहीं पता था क्योंकि उनके जीवन में तो परिवर्तन होता ही नहीं. हम शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वैश्वीकरण और ना जाने कितनी थ्योरियों की बात करते हैं पर आदिवासी आज भी जीवन के मूल संसाधनों से वंचित हैं. ना इंफ्रास्ट्रक्चर, ना बिजली, ना शिक्षा, ना स्वस्थ्य सुविधा. तन ढक़ना भी मुश्किल होता है इन लोगों के लिए, वहां अगर कुछ है तो सिर्फ शोषण, तस्करी, बंदूक का डर और करोड़ों के वादों का अम्बार. जहां सीआरपीएफ के जवान मलेरिया से ग्रस्त हैं और गांवों में शोषण कर रहे हैं, बेगुनाहों पर बंदूक का कहर बरपा रहे हैं, ऐसे राज्य और उनकी व्यवस्था का और कितना बखान करूं. नक्सलवाद की लड़ाई उनके जन, जंगल, जमीन, रीति-रिवाज़ और उनके अस्तित्व की लड़ाई है. जिसे नष्ट करने की चेष्टा इसी राजनीति ने की है. घटना के चश्मदीद डॉ. सत्यनारायण दुबे के अनुसार सलवा जुडूम के जनक महेंद्र कर्मा ने भी स्वयं यही किया है. वे भी बातचीत नहीं बल्कि मार-काट के समर्थक थे.

nakshal-wadइस हमले में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मारा गया जो नक्सली हिट लिस्ट में नहीं था. करीब 120 लोगों की इस परिवर्तन यात्रा पर उससे कई गुणा ज्यादा नक्सलियों ने हमला किया और सैंकड़ों राऊन्ड गोली चलायी लेकिन मरने वालों की संख्या 30 थी. हां, घायलों की एक अलग संख्या थी क्योंकि गोली का कोई मज़हब नहीं होता. डॉ. सत्यनारायण दुबे के अनुसार महिला नक्सलियों ने घायलों की पट्टी की, दर्द कम करने के लिए उन्हें इंजेक्शन लगाया, पीने के लिए उन्हें मिनरल वाटर दिया और कईयों की जान बचाई. अब यह समझना इतना मुश्किल नहीं है कि इस नक्सली हमले से क्या संदेश दिया गया है?

आज राजनीति में आमजन की कोई अहमियत नहीं रह गई है. ज्यादा पीछे ना जाते हुए बताना चाहूंगी कि इस नक्सली वारदात के कुछ समय पहले ही छत्तीसगढ़ के ही एडसमेटा गांव में ऐसा ही कुछ हुआ था जिसमें जवानों ने ऐसी ही नक्सली वारदात को अंजाम दिया था और गांव के सभी पुरूषों को नक्सली बताकर उनकी हत्या कर दी थी. उस समय ना ही प्रधानमंत्री आहत हुए थे, न सोनिया गांधी की आंखें नम हुईं थी. और दरभा में हुयी 30 मौतों को लोकतंत्र पर हमला करार दे दिया गया. बंद का आह्वान कर दिया गया. क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं? शायद हमें लोकतंत्र को दोबारा परिभाषित करने की आवश्यकता है.

जब आदिवासियों पर ज़ुल्म होते हैं तो उनकी दास्तान अंधेरी गलियों में चीख-चीखकर दम तोड़ देते हैं पर मीडिया की सुर्खी नहीं बन पाते. और जब वहीं Maoists attack site_0_0आधुनिक हथियार, लैपटॉप, टेबलेट, फस्र्ट ऐड और जंगल में मिनरल वाटर की बॉटल लेकर इस तबाही का कर्ज़ा चुकाते हैं तो उन्हें आतंकवादी कहकर चेतावनी दी जाती है. इस घटना में एक और चर्चा का विषय रहा और वो था बड़ी तादाद में महिला नक्सलियों का इस वारदात में शामिल होना. तो क्या महिला केवल शोषण के लिए ही उचित समझी जानी चाहिए. आज उसने बंदूक उठा ली तो हल्ला हो गया. कल तक वो मर-मरकर जीती रही तो सब चुप थे. वैसे जैसी उठा-पटक दरभा की वारदात के बाद देखने को मिली उसका अगर पच्चीस फीसद भी जवानों के द्वारा गांव वालों की नृशंस हत्या के बाद एडसमेटा में हुआ होता तो शायद ये खूनी खेल टल सकता था. उम्मीद है कि कांग्रेसियों की यह शहादत बेकार नहीं जाएगी और उनकी ये परिवर्तन यात्रा एक नई शुरूआत होगी जो राजनीति से ऊपर उठकर मानवतावाद पर केंद्रित होगी. नक्सली कोई दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं. वे आदिवासी ही हैं जिन्होंने शिक्षा की बज़ाय  तीर-धनुष ग्रहण कर युद्ध कला का प्रशिक्षण लिया है और अपनी जंग लड़ रहे हैं. दु:ख की बात ये है कि इस लड़ाई में दोनों ही छोर पर भारतीय हैं जो एक दूसरे से लड़ रहे हैं. ऐसे में देश की सीमा के सिकुडऩे की खबर भी सुर्ख़ियों में है. पर हम बेबस हैं. अपने घर को संभाल नहीं पा रहे हैं तो पड़ोस के विवाद को कैसे निपटाए? इसमें कोई दो राय नहीं कि नक्सलवाद के चादर के नीचे कुछ लोग आतंक का विस्तार भी कर रहे हैं. आखिर आतंक ही तो वो बाज़ार है जहां हथियारों का व्यापार फलेगा-फूलेगा. और ये तो होना ही था.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. कई लोग छत्तीसगढ़ की घटना को ख़ुफ़िया विभाग की नाकामी मानते हैं तो यह कोई नयी बात नहीं है…लेकिन ये भी हमें नहीं भुलाना चाहिए की देश में नक्सलियों का पनपना देश के सरकारों की नाकामी रही है…लोकतंत्र के विफलता का परिचायक है हिंदुस्तान का नक्सलवाद..और वैसे भी हम खून से खून नहीं धो सकतें हैं…..आखिर हमारे सुरक्षा बल किसे मारते है ग्रामीण इलाकों में..उन्हें जो की निर्दोष हैं और यह मैं नहीं बल्कि यह मानवाधिकार के आंकड़े कहतें हैं..नक्सलियों का तो सुरक्षाबल बाल भी बांका नहीं कर पातें हैं….वैसे सुदूर ग्रामीण इलाकों में जाने के बाद आपको देश के तरक्की का सच सामने दिख जायेगा की कैसे गाँव की विवश युवतियां आज भी अपना तन बेचने को मजबूर हैं..कैसे गाँव का युवा बेकारी अशिक्षा और भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबी सरकार के उदासीनता से लाचार अपने हाथों में बन्दूक उठा लेता है, कैसे सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में इलाज के अभाव में माँ के गर्भ में ही देश का नौनिहाल दम तोड़ देता है, कैसे आज भी बंधुआ मजदूरी की प्रथा कायम है…..देश के जो भूभाग कभी आदिवासियों का सर्वस्व हुआ करता था, आज वे उसी से बेदखल किये जा रहें हैं…जब तक ग्रामीण इलाकों में जनता, नक्सलियों का कवच बनी रहेगी तब तक न ही नक्सवाद मिटेगा नहीं नक्सलवादी….देश में नेताओं और अफसरों के गठजोड़ ने हमेशा से ही नक्सलियों को एक ताक़त दी है…क्यों की इनके ही मदद से एक ओर नेता चुनाव जीतता है तो दूसरी तरफ अफसर नक्सल प्रभावित इलाके का हवाला दे कर अपनी जेबें भरता है….इस लिए देश के मीडिया और सरकार को अपने चश्मे का नंबर बदल लेना चाहिए ताकि यथार्थ दिख जाये….वर्ना हमारी गलतियाँ ही हमारा सर्वनाश कर देगी.पूरा तंत्र चाहता है की नक्सलवाद का खत्म न हो क्यों की ऊपर से निचे तक सब की दुकानें चल रही हैं…और उस दूकान का नाम है – " नक्सलवाद से निपटने की सरकारी बजट " जिसकी लागत हजारों करोड़ है.

  2. Anil Dwivedi says:

    अच्छा लिखा फाल्गुनी आपने. कुछ और मुद्दों पर बात होनी चाहिये थे मगर कोई बात नहीं, धीरे-धीरे वह भी आ जायेगा. राज्य में महिला पत्रकारों का दमदार लेखन कम ही दिख पाता है. ऐसे में आप एक उम्मीद बनी हैं.

  3. उम्दा लेखनी फाल्गुनी जी। आपने सच्चाई बयां की है। मैं तो यह कहना चाहंूगा कि आपने पत्रकार धर्म का निर्वाह किया है। अभी तक मेरे पढने में नहीं आया कि कोई पत्रकार इस तरह का कोई लेख लिखा हो। एक बार फिर आपको दिल से बधाई देता हूं।.

  4. esapar bichar krnya kia bat hiya kha glta hua kysa hua obhia to ansan hia.
    bichar kriya jiya hand jiya bharat.

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