Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला : लोगों को जगाने का बिगुल …

By   /  July 16, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-के जी सुरेश||

 

उत्तर प्रदेश में जाति आधारित राजनैतिक रैलियों पर प्रतिबंध लगाने वाले इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले ने भारतीय राजनीति में जातियों की भूमिका पर एक बार फिर से बहस छेड़ दी है.  अदालत के फैसले पर प्रतिक्रियाएं संभावित लाइन पर ही आई हैं जिसमें राष्ट्रीय पार्टियों ने उसका स्वागत किया है जबकि क्षेत्रीय दलों ने, खास कर जिनका जातियों से गहरा जुड़ाव है, इस पर भारी आपत्ति की है.caste based political rallies

भले ही राजनैतिक दल इससे इनकार करते रहें, चुनावी राजनीति में जातियाँ महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती रहीं हैं. यदि क्षेत्रीय दलों को अपना जातिगत जुड़ाव दर्शाने में कोई परहेज नहीं होता तो राष्ट्रीय राजनैतिक दल भी, उम्मीदवारों का चुनाव हो या क्षेत्रीय स्तर पर अपने नेताओं का प्रचार करना हो, जातिवाद को हवा देने के उतने ही दोषी हैं. यह जरूर है कि वे जातिगत और सांप्रदायिक राजनीति जीतने वाले उम्मीदवार के नाम पर ऐसा करते हैं.

यहाँ तक कि ऐसे क्षेत्रीय क्षत्रप जो राष्ट्रीय दृष्टि रखने का दावा करते हैं वे भी जातिवादी कार्ड खेलने में परहेज नहीं करते, भले ही वे पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा, हों जो वोक्कलिगा होने की पहचान बनाए रखते हैं, या धर्मनिरपेक्षता के नए चैंपियन नितीश कुमार हों. हालांकि नितीश कुमार अपने धुर विरोधी तथा आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की जातिवादी राजनीति की समय समय पर आलोचना करते रहते हैं मगर वे खुद बिहार में पहले ऐसे राजनेता थे जिसने 1992 में कुर्मियों की जाति आधारित रैली की थी.

भले ही वे छत पर चढ़ कर चिल्लाते रहें कि उनकी विचारधारा न जाति में विश्वास करती है और न धर्म में, साम्यवादियों, जिनमें अति वामपंथी माओवादी शामिल हैं, ने जातियों को ही अधिकतर वर्ग माना है और उनका वर्ग संघर्ष की परिणिती अमूमन जाति संघर्ष में ही हुई है जैसा कि बिहार में सबने देखा है.

राजनीति में जाति के फेक्टर को राष्ट्रीय दल कितना महत्व देते हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आने के एक हफ्ते पहले ही सत्तारूढ़ कांग्रेस ने आने वाले आम चुनावों के लिए सभी 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में विभिन्न जातियों के लोगों की संख्या की जानकारी अपनी राज्य इकाइयों से मँगवाई थी.

मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार कांग्रेस हाईकमांड ने अपनी सभी राज्य इकाइयों के अध्यक्षों को एक गोपनीय परिपत्र भेज कर उन्हें कहा कि वे जातियों की आबादी के आंकड़े तथा वर्तमान सांसदों और पार्टी का टिकट चाहने वालों की पूरी जानकारी भिजवाएँ.

जाने माने समाजशास्त्री आन्द्रे बेतिले के अनुसार भारत में जातिवादी व्यवस्था जारी रहने का कारण परंपरागत काम- धंधे और विवाह संबंध नहीं बल्कि राजनीति है. हाल ही में गुजरात विश्वविद्यालय में एक विशेष भाषण करते हुए पद्मश्री प्राप्त इस समाजशास्त्री ने मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए जातियों को सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक औज़ार के रूप में चिन्हित किया.

भारतीय समाज में जातियां हमेशा ही विभाजक तत्व रहीं हैं और ब्रितानवी लोगों ने इस देश में जातिवादी राजनीति की नींव रखी. कोई आठ दशक पहले ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधान मंत्री रामसे मेक्डोनाल्ड ने यहाँ ‘कम्यूनल अवार्ड’घोषित किया जिसके जरिये अल्पसंख्यक समुदायों – मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, एंग्लो इंडियनों, यूरोपियनों तथा दलितों, जिन्हें दाबी हुई और अछूत जातियां बताया गया, के लिए अलग से मताधिकार की व्यवस्था की गई थी.

पिछड़े वर्गों के लिए अलग से सीटें निर्धारित की गईं जिनके क्षेत्रों में सिर्फ उन्हीं वर्ग के लोग वोट दे सकें. इस विवादास्पद कदम का महात्मा गांधी ने इस आधार पर पुरजोर विरोध किया कि इससे हिन्दू समाज का विखंडन हो जायेगा. मगर ब्रिटेन के इस कदम का डॉ. बी आर अंबेडकर जैसे नेताओं ने समर्थन किया जिनके साथ गांधी ने लंबी समझौता वार्ताएं कीं जिनका परिणाम पूना समझौते के रूप में हुआ. 1932 के समझौते के अनुसार दलित वर्ग के लिए सामान्य मतदाताओं के अंदर ही सीटें आरक्षित रखना स्वीकार किया गया.

देश की आज़ादी के बाद राष्ट्र के निर्माताओं ने एक ऐसा संसदीय लोकतन्त्र चुना जो दुर्भाग्य से ऐसी मतदान प्रणाली पर आधारित था जो जातिगत भावनाओं को समाप्त करके समानतावादी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने की बजाय उन्हें और पुष्ट करने वाली थी.

सीपीआई (एम) के नेता सीताराम येचुरी के शब्दों में “मतदान प्रणाली ने जाति के भेद को भुला कर समानता की गारंटी देने की बजाय उम्मीदवार के चयन में और वोटरों को लुभाने के लिए जाति भावनाओं को बढ़ावा देने और उसे स्थापित करने का काम किया”.

तत्कालीन वी पी सिंह सरकार द्वारा 1989 में मण्डल आयोग की रिपोर्ट को लागू करना भारत की जाति आधारित राजनीति में युगांतरकारी घटना साबित हुआ. मण्डल की हवा पर सवार होकर ही मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव औरे देवेगौड़ा जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों ने चुनावी सफलताएँ पाई.

अपनी किताब “भारतीय राजनीति में जाति” में समाजशास्त्री रजनी कोठारी तर्क देते हैं कि “अपने लिए समर्थन जुटाने और अपनी स्थिति को मजबूत बानाने के लिए मौजूदा ढांचे को पहचानना और उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करना ही राजनैतिक प्रक्रिया होती है. जहां जातिगत ढांचा सबसे महत्वपूर्ण संगठित समूह हो वहाँ राननीति को इस ढांचे का उपयोग जरूर करना चाहिए”.

दुर्भाग्य से जातियों के नेताओं का अपने समर्थकों से आग्रह मौजूदा सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की कमियों को दूर करने का नहीं होता. समस्त आग्रह अपनी बिरादरी के व्यक्ति को सत्ता में लाने के लिए जिताने का होता है.

ऐसा होने से दलितों और पिछड़ों में एक सीमित राजनैतिक सशक्तिकरण, कुछ दृढ़ता और एक आत्म सम्मान का भाव जरूर आता है मगर उनके सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को सुधारने में इससे कोई मदद नहीं मिलती. हम देखते हैं कि जातियों के नेता जिन राज्यों में सत्ता में आए हैं या बड़ा प्रभाव रखते हैं वहाँ जरूरी भूमि सुधार का काम नहीं हो पाया है.

अतः ऐसी पार्टियां तथा नेता अपने निजी हितों के लिए ही शोषणकारी जाति व्यवस्था को जारी रखते हैं और उसे बढ़ाते हैं. ऐसा करके वे शोषक व्यवस्था को ही थोपते हैं.

ये जाति आधारित नेता जब आरक्षण पर पुनर्विचार का जबर्दस्त विरोध करते हैं तो उसका ध्येय न केवल अपने वोट बैंक को बचाए रखना होता है बल्कि सामूहिक मुद्दों पर गरीबों की किसी भी एकजुटता को रोकना होता है.

सत्तारूढ यूपीए तथा विपक्षी पार्टियों के नेताओं की मांग पर 2011 में जाति आधारित जनगणना कराने का फैसला देश की जातियों की राजनीति में एक मील का पत्थर था. प्रो. बेतिले को उद्धृत करें तो “समाजशास्त्री यदि अपने सर्वे में जाति को शामिल करें तो ठीक है मगर सरकार को इसे आधिकारिक अनुमोदन नहीं देना चाहिए”.

यहाँ तक कि प्रगतिशील वामपंथी दल भी यह कह चुके हैं कि जाति आधारित आरक्षण, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का हल नहीं हो सकता. येचुरी ने एक बार कहा था “समुचित आंकड़े प्रस्तुत करके यह बताया जा सकता है कि आरक्षण के बावजूद इन वर्गों की हालत में कोई ठोस सुधार नहीं आया है”. विडम्बना की बात है कि आज़ाद भारत में जातियों की पहली गणना केरल में 1968 में हुई थी जब वहाँ ई एम एस नंबूदारिपाद के नेतृत्व में वामपंथी सरकार थी.

हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का जाति आधारित रैलियों पर प्रतिबंध का फैसला स्वागत योग्य है मगर वर्तमान परिदृश्य में भारतीय राजनीति से जातियों की भूमिका को दबाने में उसका अधिक प्रभाव होने वाला नहीं है. यह सोचना भोलापन होगा कि देश की राजनैतिक पार्टियां इस मामले में कोई पहल करेगी.

यहाँ ओढ़िशा के मामले का जिक्र करना प्रासंगिक होगा जहां लोकप्रिय चुनाव में जाति कभी कसौटी नहीं रही. चाहे वह सार्वजनिक जगन्नाथ संप्रदाय का प्रभाव हो या पंडित गोपाबंधु दास, बीजू पटनायक, या नंदिनी सत्पथी जैसे स्वप्नदर्शी नेताओं की निबाही गई भूमिका रही हो यहाँ के प्रबुद्ध मतदाताओं ने बार-बार ऐसे प्रत्याशियों की कामकाज के आधार पर तरफदारी की है न कि जाति के आधार पर.

हालांकि पटेल समुदाय गुजरात में बीजेपी सफलता में मुख्य भूमिका निभाता रहा है मगर वहाँ के मुख्यमंत्री, जो एक अल्पसंख्यक जाति से आते हैं, को लगातार जबर्दस्त समर्थन वहाँ के वोटरों के नए संस्कारों  को परिलक्षित करता है जो जाति की बजाय सुशासन को तरजीह देते हैं.

मतदाताओं द्वारा प्रबुद्ध चयन के अलावा अब यह विचार करने का समय आ गया है कि क्या  अनुपातिक प्रतिनिधित्व आधारित व्यवस्था देश में जाति आधारित राजनीति का जवाब हो सकती है? इस व्यवस्था में लोग पार्टियों को वोट देंगे न कि व्यक्तियों को. इससे जाति, धर्म और अन्य संकीर्ण आग्रहों को कम किया जा सकेगा.

इसीलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को राष्ट्र हित में सबको जगाने का बिगुल की तरह लेना चाहिए.

(लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

पाकिस्‍तान ने नहीं किया लेकिन भाजपा ने कर दिखाया..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: