/अनशन ना तोड़ने की जिद पर अड़ी है राजबाला

अनशन ना तोड़ने की जिद पर अड़ी है राजबाला

शनिवार रात रामलीला मैदान में पुलिस की कार्रवाई में घायल हुई राजबाला (51) जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है। दो दिन गुजर जाने के बावजूद उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। गुड़गांव निवासी राजबाला को जीबी पंत अस्पताल के आईसीयू संख्या-17 में रखा गया है। 

उनकी एक बार सर्जरी भी हो चुकी है। स्क्रू, नट बोल्ट, स्टील के प्लेट के सहारे मौत को मात देने में जुटी राजबाला का योग गुरु रामदेव पर से विश्वास तनिक भी कम नहीं हुआ है। जब भी वह चेतना में रहती हैं तो ‘बाबा की जय हो’ का नारा लगाती हैं।

बाबा के एक अनुयायी और राजबाला के करीबी का कहना है कि राजबाला अनशन नहीं तोड़ने की जिद में अड़ी हुई है। जब भी उसे होश आता है, वह बाबा के बारे में ही पूछती है। अपनी सेहत से अधिक बाबा की सकुशलता उसकी प्राथमिकता बनी हुई है। खाना खाने से भी इंकार करती है। बस एक ही रट लगा रखी है कि ‘बाबा की जय हो’। राजबाला का इलाज जीबी पंत के डॉ. संजीव सिन्हा की देखरेख में डॉक्टरों की टीम कर रही है।

डॉक्टरों के मुताबिक राजबाला की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई है। उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है। इसलिए वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है। उसका ब्लड प्रेशर भी नियंत्रण में नहीं है। दवाओं के सहारे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित किया जा रहा है। शुरुआती जांच में राजबाला की हड्डियों के अपने स्थान से हटने की बात सामने आई थी।

प्लेट, स्क्रू आदि के सहारे हड्डी को फिक्स किया गया है। दूसरी तरफ लोक नायक अस्पताल में भर्ती घायलों में से केवल एक मरीज का ही इलाज चल रहा है। अन्य घायलों की हालत में सुधार होने के चलते अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। एलएनजेपी के एक चिकित्सक ने बताया कि जिस मरीज का इलाज अभी भी जारी है, उसे मल्टीपल फ्रैक्चर है।

गौरतलब है कि रामलीला मैदान में पुलिस की कार्रवाई में सवा सौ लोग घायल हो गए थे। जिनमें से रविवार को ही सौ घायलों को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.