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आगरा की लोक नाट्य परंपरा भगत, नई यात्रा की ओर…

By   /  July 22, 2013  /  No Comments

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कौन कहता है कि आसमां में सुराख़ नहीं हो सकता, ज़रा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों..इन पंक्तियों को साबित कर दिया है, वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी अनिल शुक्ल ने… आगरा की मशहूर लोक नाट्य कला ‘भगत’ के लुप्त हो जाने के पचास साल बाद अनिल शुक्ल ने अपनी मेहनत और लग्न के बूते इस लुप्त हो गई लोक कला को न केवल पुनर्जीवित ही किया बल्कि उसे आज के परिवेश में भी ढाल दिया….पदिये पूरी दास्तान खुद अनिल शुक्ल की कलम से…..

हाल के 5-6 वर्षों में आगरा में एक नया सांस्कृतिक आंदोलन उठ खड़ा हुआ है. संस्कृतिकर्मियों और दर्शकों का यह मिला जुला प्रबल आंदोलन उस लोक नाट्य ‘भगत’ के पक्ष में है जो 5 दशक पहले लुप्त हो गया था और अब फिर से खड़ा हो रहा है. आगरा का यह प्रयोग दर्शाता है कि लोक कलाओं के संरक्षण के लिए जरूरी है कि आज के समाज और दर्शकों की सांस्कृतिक सोच और समझ के साथ तालमेल बैठा कर, उसके स्वरूप को (मूल आकार को छेड़े बिना) एक नई संरचना के रूप में पेश किया जाए. आगरा की इस ‘पुनर्नवा’ गाथा को जिस तरह हम लोग गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, हमें उम्मीद है कि हमारे ये अनुभव हिंदी भाषी क्षेत्र में कार्यरत लोक नाट्य और नाटक से जुड़े मित्रों के लिए नए उदाहरण की भूमिका अदा करेंगे.

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‘भगत’ आगरा की 400 वर्ष पुरानी लोक नाटकों की परंपरा है. 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक आगरा के विभिन्न मोहल्लों और बस्तियों में इसके 18 अखाड़े (कमेटियां) हुआ करते थे. इन अखाड़ों की अपनी सीमा रेखा थी और वे इसके बाहर ‘भगत’ का प्रदर्शन नहीं कर सकते थे. एक अखाड़े का अभिनेता दूसरे अखाड़े में शामिल नहीं हो सकता था, यद्यपि साजिन्दों पर यह अनुशासन नही लागू  होता था. गुजरी सदी के 50 के दशक से ये अखाड़े निष्क्रिय होते चले गए और 70का दशक आते-आते ‘भगत’ का कोई नामलेवा नहीं रहा.

वस्तुतः 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आगरा के ताजगंज इलाके के भांड जनजाति के लोगों ने गायकी का एक नया लोक नाट्य शुरू किया. यह मूलतः प्रहसन सरीखे हुआ करते थे और स्थानीय सामंतों और अभिजात्यों पर व्यंग्य (कटाक्ष) के रूप में गाये जाते थे. अपराह्न से शुरू होकर देर शाम तक चलने वाली ये प्रस्तुतियां भांड भगत कहलाती थीं. मोहल्ले से लेकर आसपास के गांवों के सामान्य जनों में यह अत्याधिक लोकप्रिय थे जबकि अभिजात्यों में घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे और वे लोग कभी इसकी प्रस्तुतियों में शामिल नहीं होते थे. यद्यपि इन कृतियों और प्रस्तुतियों का कोई डॉक्यूमेंटेशन उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय कहावतों, लोक गीतों और नज़ीर अकबराबादी की कविताओं में इनका छुटपुट उल्लेख मिलता है. शासन की तरफ से 18वीं सदी में इन पर सख्त रोक लगा दी गई और अगले 75-80 साल तक ये नहीं खेले जा सके.

सन 1827 में स्थानीय मोहल्ला मोती कटरा के भांड जाति के कवि और लोक संगीतकार जौहरी राय अपनी ससुराल अमरोहा (मुरादाबाद) से स्वांग की 4 किताबें (स्क्रिप्ट) लेकर आए. उन्होंने इनमें से एक रूप बसंत को नए सिरे से रचा. ब्रज और आगरा की खड़ी बोली का उसमें भाषाई इस्तेमाल किया और संगीत में, जहां-जहां संभव था ब्रज की लोकधुनों का समावेश किया. यही नहीं, आगरा की खयालगोई परंपरा के कुछ अंशों का भी श्री राय ने उपयोग किया और कार्तिक की एक शाम मोती कटरा के खुले मैदान में पाड़ (मंच) बांधकर सैंकड़ों स्थानीय दर्शकों के बीच उन्होंने इसे यह कहते हुए प्रस्तुत किया कि हम जो खेल खेल रहे हैं, वह भगत कही जाएगी. ‘रूप बसंत’ आधुनिक भगत का पहला प्रदर्शन था और भांट जौहरी राय इस विधा के जनक थे. इस तरह मोती कटरा में भगत का पहला अखाड़ा स्थापित हुआ. बाकी की 3 स्वांग स्क्रिप्ट का क्या हुआ, इस बारे में कोई ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं है परंतु किविदंती यह भी मशहूर है कि ‘रूप बसंत’ की स्थानीय प्रतिक्रिया से दुखी होकर जौहरी राय ने शेष 3 किताबों को कुएं में फेंक दिया. वस्तुतः ‘रूप बसंत’ अंग्रेजों के आगमन से भारतीय समाज में आ रहे व्यापक बदलावों को आधार बना कर लिखी गई थी. इसका परिवेश राज दरबार था और मुख्य पात्र राजा, उसकी युवा रानी और पहली रानी से जन्मे पुत्र रूप और बसंत थे. प्रेम, घृणा, षडयंत्र आदि इसकी ‘थीम’ के हिस्से थे. 30 और 40 के दशक में मोती कटरा में ‘भगत’ खेली जाती रही और जौहरी राय पहले खलीफा बने रहे. मोती कटरा की भगत की चर्चा शहर के दूसरे इलाकों में भी पहुंची और अन्य मोहल्लों के दर्शक भी प्रस्तुति के समय मोटीकटरा में उमड़ने लगे. 40 के दशक में रावतपाड़ा और नमक की मंडी मोहल्लों में ‘भगत’ के अखाड़े गठित हुए. प्रारंभिक दौर की ‘आधुनिक भगत’ के कलाकारों में पिछड़ी और दलित जातियों के पुरुष थे. चूंकि भगत में सारा जोर गायकी पर था लिहाजा ये ऊंची आवाज में गा सकने वाले सुरीले गलों का समूह था. मंच के तीन तरफ दर्शक बैठते थे. साउंड टेक्नोलॉजी तब विकसित नहीं हुई थी लिहाजा प्रत्येक अभिनेता अपने जवाब (संवाद), 3 तरफ घूम-घूम कर गाता था. मुगल काल में आगरा राजधानी था. यही वजह है कि यह व्यापार और व्यवसाय की भी राजधानी था और व्यापारियों के मुख्यालय आगरा में ही थे. बाद में राजधानी के दिल्ली स्थानांतरित होने और आगे चलकर ब्रिटिश ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ का अधिपत्य स्थापित हो जाने के बाद भी आगरा देश का महत्वपूर्ण व्यवसायिक केन्द्र बना रहा. मोती कटरा अखाड़े में कलाकार पिछड़े, दलित और मुसलमान थे और शुरू में वे ही इसके आयोजक हुआ करते थे. जल्द ही सोना-चमड़े के व्यापारियों ने ‘भगत’ के आयोजकों को सहायता देना शुरू कर दिया. व्यापारियों और व्यवसाइयों के चंदों से भगत के मंच ‘ग्लैमरस’ बनने लगे. प्रस्तुति शाम से देर रात की तरफ खिसकने लगी और मंच मशाल और तेल लैम्पों से जगमगाने लगे. धीरे-धीरे भगत में इन व्यापारियों के ‘स्वर’ प्रभावशाली होने लगे और कलाकारों की आवाजें दबने लगीं. ‘खलीफा’ की पदवी भी कलाकारों के साथ इन व्यापारियों में ‘बंटने’ लगीं.

व्यवसाइयों के आगमन से ‘भगत’ अखाड़ों का प्रसार भी चालू हो गया. एक इलाके की दालमंडी के अखाड़े का जवाब दूसरे इलाके की अनाज मंडी के व्यापारियों ने अपने यहां अखाड़ा चालू करके दिया तो एक जगह की सुनार मंडी के जवाब में दूसरे क्षेत्र की जवाहरात मंडी के जौहरियों ने अपने अखाड़ा चालू करके ‘भगत’ खिलवानी शुरू कर दी. 20वीं सदी की शुरूआत होते होते आगरा की सभी 12 मंडियों में 12 अखाड़े थे. बाद में इन अखाड़े वाले कुछ व्यवसायी खलीफा लोगों ने दूसरी जगहों पर बस कर अपने उप अखाड़े स्थापित कर लिए औैर इस तरह इनकी संख्या 18 हो गई. 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भगत आगरा से निकल कर मथुरा और हाथरस तक पहुंची. वहां भी कुछ अखाड़े स्थापित हुए. 20वीं शताब्दी के पूवार्र्द्ध में पहले वहां अखाड़े मृतप्रायः हुए और बाद में आगरा में.

जैसा कि ऊपर कहा गया है 17वीं शताब्दी की ‘भांड-भगत’ से निकले व्यंग्य और कटाक्ष के बोल शुरूआती ‘भगत’ के स्वरों में भी मौजूद रहे. ‘रूप बसंत’ से शुरू हुआ अंग्रेज विरोध तब तक आगरा के भगत मंचों पर प्रखर रहा जब तक इन मंचों पर कलाकारों का दबदबा था. जब व्यवसाइयों की भीड़ ने इन मंचों पर कब्जा कर लिया तो भगत में 3 तरह के बदलाव साफ-साफ दिखने लगे.

(1) भगत बहुत महंगी हो गई. यह महंगाई मंच से लेकर वेशभूषा, आभूषण और श्रंगार सभी जगह दिखने लगी. नहीं महंगा हुआ तो कलाकारों का न्यौछावर (पारितोषिक), जो उनके लिए पारिश्रमिक सरीखा होता था. पाड़ (स्टेज क्राफ्ट) में जस्ते, चांदी और सोने के पत्तर चिपकाये जाने लगे. अभिनेता 5 से 10 किलो के असली सोने-चांदी के आभूषण पहन कर अभिनय करते. ये अखाड़ों की कलात्मक प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि व्यापारियों की व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता थी जो कला की आड़ में व्यवसायिक प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाना चाहती थी ताकि वे अपने व्यापार में उसकी भली-भांति ‘शो केसिंग’ कर सकें.

(2) सामाजिक कठिनाईयां और व्यवस्था विरोध के स्वर गायब कर दिए गए. सामाजिक दुराचारों की जगह मिथकीय कथानक उपजने लगे और व्यवस्था विरोध की जगह ‘प्रभु’ वंदना के स्वर प्रमुख हो गए. सन 1857 के विद्रोह के बाद मथुरा के एक अखाड़े ने ईस्ट-इंडिया कम्पनी की प्रशंसा में यमुना के घाट पर ‘भगत’ खेलने की कोशिश की. क्रोधित दर्शकों ने मंच तहस-नहस कर डाला और अखाड़ा हमेशा के लिए बंद हो गया.

(3) ‘भगत’ मंच पर लक्ष्मी की ताबड़तोड़ बारिश से सरस्वती लुप्त होती चली गई और इस सब का परिणाम यह हुआ कि 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जबकि देश ‘असहयोग’, ‘भारत छोड़ो’ और किसान-मजदूर आंदोलनों की भट्टी में तप रहा था, साहित्य और सांस्कृतिक मंचों पर इनकी बड़ी-बड़ी छाया मंडरा रही थी तब ‘भगत’ के मंच शुष्क दैवीय राग अलाप रहे थे. आगरा और ब्रज राजनीतिक दृष्टि से बेहद चार्ज था और भगत के ऐसे मंचों के प्रति दर्शकों का मोह भंग हो जाना स्वाभाविक था. यही कारण है कि आजादी से पहले ही भगत की प्रस्तुतियों में दर्शकों की तादाद नगण्य होने लग गई और आजादी के बाद अखाड़े सुनसान होते चले गए.

60 और 70 के दशक में जबकि भारतीय समाज चेतना के नए पुर्जों को चीन्हने की कोशिश में जुटा था और अपनी समझ के नए मानदंडों को विकसित कर रहा था तब भगत के खलीफा यह न सोच पाये कि उनके दर्शकों की सांस्कृतिक समझ कहां जा रही है और मनोरंजन की उनकी नई चाहतें क्या हैं. वे यह अन्दाजा भी नहीं लगा पाये कि उनका समाज किन कठिनाईयों से जूझ रहा है और दर्शकों के समक्ष चुनौतियां क्या हैं. बावजूद इन सारी नाकारात्मकताओं के, भगत कलाकारों के स्वरों में बुलंदी और मिठास का समावेश तब भी बना रहा. अखाड़ों में जब दैनंदिन तालीम ठंडी होने लगी तो वे अपने घर और कार्यस्थली पर रियाज और सहयोगियों के मनोरंजन का काम एक साथ करने लगे. सुनार का काम करने वाले मजदूर चांदी की पाजेब जोड़ते-जोड़ते दोहे का गायन करते तो ठठेरे कारीगर बर्तन निर्माण की ठोंका-पीटी को ताल मानकर चौबोले गाते जाते और कूणेभार के कारीगर अपनी ठोंकापीटी के बीच  बहर -ए -तबील की धुनें निकालते. पेठे के कारखानों के बाहर श्रोता इस आस में खड़े मिल जाते कि शायद लावनी के बोल सुनने को मिल जाएं. अखाड़ों से निकल कर गायकी का यह लोक नाट्य 60 के दशक तक कारखानों में पहुंच गया था लेकिन 70 का दशक आते आते मौन हो गया. हमेशा एक दूसरे को नीचा दिखाने की ललक में तपते खलीफाओं ने आखिरकार ‘भगत’ का गला रेत डाला. उनके संगठन श्री काव्यकला संगीत परिषद पर हावी नेताओं के एक गुट ने कोढ़ में खाज का काम किया और एक सदी पहले तक आगरा के सांस्कृतिक शिखर पर सवार रही लोक नाट्य कला को अगले पांच दशकों के लिए कब्र में दफन कर दिया.

2 जनवरी 2006 में सांस्कृतिक संस्था रंगलीला के गठन के वक्त ही हम लोगों ने ‘भगत’ के पुनरुद्धार का संकल्प कर लिया था. हमारा नारा था ‘नए दौर की नई भगत’. हम सभी के दिमाग में यह बात साफ थी कि पुरानी मृतप्राय हो चुकी भगत को उसके हूबहू स्वरूप में खड़ा नहीं किया जा सकता. स्थाई तौर पर आगरा लौटने से पूर्व सन 2002 से 2006 तक मैं इसके पतन के कारणों की पड़ताल कर चुका था. ‘रंगलीला’ के मित्रों के बीच मैंने विस्तार से अपने इस ‘शोध’ की चर्चा की. हमारे सामने चिंता यह थी कि हम शुरू कहां से करें? 18 अखाड़ों में योग्य खलीफा लोगों की तादाद न के बराबर थी. सब जगह कलाकार भी नहीं बचे थे. जो थे उन्हें सम्पर्क करके गोलबंद करना मुश्किल था. कई महीने हम लोग व्यापक जनसंपर्क अभियान में जुटे रहे. खलीफाओं से मिले और कलाकारों से भी. सब जगह निराशा का माहौल था. कोई यह मानने को तैयार हीं नहीं था कि भगत फिर से शुरू हो सकती है. 50-60 साल के लंबे अंतराल में कलाकार लोग या तो जर्जर और वृद्ध हो चुके थे या फिर विभिन्न काम धंधों में पूरी तरह डूब गये थे और लौटने को कोई तैयार नहीं था. यह दीगर बात है कि चाहते सभी थे कि भगत फिर से हो.

शुरू-शुरू में लगता था कि सन्नाटेदार परती जमीन पर नए सांस्कृतिक आंदोलन के बीज बोने की जो कोशिश हम कर रहे हैं उसके कुछ नतीजे हासिल होंगे? छोटे-छोटे समूहों की बैठकों में बैठकर हम लोग उन्हें समझाते कि भगत के मृतप्राय हो जाने की वजहें सिर्फ टीवी और फिल्में नहीं हैं. ये दोनों तो देश में वहां भी हैं जहां लोक नाट्य मौजूद हैं. हम उन्हें बताते कि देश के दूसरे लोक नाट्यों की तरह ‘भगत’ भी समाज की मुख्य लोक धारा के बीच से निकल कर आई है. दुर्भाग्य से समाज की मुख्य धारा विकास की सामान्य धारा के साथ आगे निकल गई. जो लोक कलाएं छिटक कर किनारे लग गई थीं, गोल-गोल घूमकर पोखर में तब्दील हो गई थीं और जिनमें सड़ांध पैदा हो चुकी थी, ‘भगत’ उनमें से एक थी. वे पूछते कि भगत का पुर्नजन्म कैसे होगा! हम उन्हें बताते कि मुर्दों का जन्म सिर्फ किस्से कहानियों में होता है हकीकत में नहीं. अब भगत फिर से शुरू करनी है तो उसकी बुनियाद (गायकी) को छेड़े बिना उस पर नए सिरे से भवन खड़ा करना होगा और इस भवन में इस्तेमाल होगा नई रोड़ी और नया गारा. फिर हम लोग इस ‘रोड़ी’ और ‘गारे’ को परिभाषित करते.

7-8 महीने के हमारे सघन जनसंपर्क का और कुछ भला हुआ हो या नहीं, लोग एक बड़ी सभा में बैठने के लिए तैयार हो गये. दिसम्बर 2006 में ‘रंगलीला’ की पहल पर छीपीटोला मोहल्ले के जैन मंदिर हॉल में भगतकर्मियों की पहली बड़ी सभा हुई. इस बैठक में 3 तरह के तत्व शामिल थे.

  • वे बुजुर्ग जो ‘भगत’ के मृत प्राय होने के आखिरी 1-2 दशकों में इनके संगठन ‘श्री भगत काव्य कल परिषद’ के नेता थे
  • दूसरे वे खलीफा जो उस युग के नेता नहीं थे लेकिन जिनका शानदार कलात्मक योगदान रहा था और जो ‘भगत’ के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का जिम्मेदार अपने नेताओं को मानते थे!
  • इस बैठक में तीसरी और बड़ी हिस्सेदारी उन कलाकारों की थी जिन्होंने अपना युवा जीवन भगत के मंचों पर बिताया था. वे सभी सालों-साल बाद ‘भगत’ के एजेन्डे पर मिल रहे थे. उनके चेहरों पर खुशी थी. माहौल में जबर्दस्त उत्साह था. उनकी आपसी बातचीत में नक्कारों (नगाड़ों) की पुरानी गूंज और फिर से पाड़ (मंच) बांधने के सपने मचल रहे थे.
अनिल शुक्ल

अनिल शुक्ल

रंगलीला की ओर से दिये गये वक्तव्य में मैंने ‘भगत’ के मूल ढांचे (इसकी गायकी) को छेड़े बिना इसके ‘कंटेंट’ और ‘ट्रीटमेंट’ को आज के संदर्भ से जोड़े जाने की जरुरत पर जोर दिया. मैंने उन्हें बताया कि हाथ में कागज के पुर्जों पर जवाब (संवाद) पढ़कर गाने वाला और मंच पर रात-रात भर चलने वाला अराजक मंच व्यवहार जब 50 साल पुराना दर्शक नहीं स्वीकार कर सका तो आज का दर्शक कैसे झेलेगा. मैंने उनसे ‘भगत’ की नई रंगमंचीय डिजायन की बात कही. मैंने कहा कि सिर्फ गायकी नहीं, संवेदनशील अभिनय को भी भगत से जोड़ना होगा. मैंने उन्हें यह भी कहा कि किताब (स्क्रिप्ट) और पाड़ (स्टेजक्राफ्ट) से लेकर वेशभूषा (कॉस्ट्यूम), श्रंगार (मेकअप) और आभूषण – सभी को नये सिरे से परखना होगा. नेता लोग मेरे वक्तव्य से सहमत नहीं थे. उन्होंने अपनी ‘शानदार विरासत’ का गुणगान किया और उसमें किसी भी छेड़छाड़ को अस्वीकार कर दिया. दूसरे कई खलीफाओं ने माना कि दुनिया में कोइे भी चीज रूढ़ नहीं हैं, भगत भी नहीं. कलाकारों में से कुछ ने कहा कि ‘‘नयापन करके देख लिया जाए शायद इसी से कोई राह निकले.’’ बहरहाल बैठक इस नोट के साथ समाप्त हुई कि पहले की राह से अलग हटकर अब अखाड़े एक-दूसरे की मदद करें. अखाड़ों में बचे लेखकों, निर्देशकों और अभिनेताओं के बीच विनिमय का सिद्धांत लागू मान लिया गया जो अब तक की परंपरा नहीं थी. ‘भगत’ के नवजागरण आंदोलन में सबसे बाद में शामिल होने वालों में थे पुनियापाड़ा (लोहामण्डी) के अखाड़ा दुर्गदास के खलीफा फूलसिंह यादव. श्री यादव भगत अखाड़ों के सबसे वयोवृद्ध (87 वर्ष) खलीफा थे. पुरातनपंथी नेताओं को खुलकर ललकारते हुए उन्होंने ‘रंगलीला’ के नये दौर की नई भगत के नारे से खुलकर सहमति जताई. उधर सबसे पुराने अखाड़ों में एक अखाड़ा चौक चमन के निर्देशक डॉ. मिहीलाल यादव ने भी ‘नई भगत’ का समर्थन किया. हम सबके सामने स्पष्ट था कि पुरातनपंथ बनाम पुनर्नवावाद की यह वैचारिक लड़ाई लंबी चलेगी.

‘रंगलीला’ ने अखाड़ा ‘दुर्गदास’ के साथ मिलकर ‘नई भगत’ की राह पर काम करने का फैसला किया. खलीफा फूलसिंह यादव की मुश्किल यह थी कि उनके पुराने शागिर्द अपने-अपने काम धंधे जमा चुके थे और कोई भगत खेलने आने को तैयार नहीं था. यह समस्या और अखाड़ों की भी थी. उन जगहों पर जहां इसे लेकर निराशा थी वहीं हम लोगों ने एक ऐसा नया कदम उठाया जिसने आने वाले वर्षों में सम्पूर्ण आंदोलन को एक नई दिशा दी. हम लोगों ने पुनियापाड़ा मौहल्ले के 5 किशोरों का एक छोटा सा समूह तैयार किया. खलीफा ने उन्हें ‘भगत’ गायन का प्रशिक्षण देना शुरू किया और मैंने उन्हें अभिनय और उसकी बारीकियों से परिचित कराना शुरू किया. भगत के 400 वर्ष के इतिहास में अभिनय एक नया अध्याय था. खलीफा मेरी इस बात से पूर्णतः सहमत थे कि इन बच्चों की तैयारी में समय भले ही लगे लेकिन यह एक ठोस कार्रवाई का शुभारंभ था. एक तरफ बच्चों के प्रशिक्षण का काम चलता रहा दूसरी तरफ ‘रंगलीला’ के सभी साथी और खलीफा ने मिलकर आज के समाज की समस्याओं और उनके बीच के कथाक्रम, भगत की नई डिजायन, प्रस्तुति शिल्प का नया ट्रीटमेन्ट, नया मंच विधान, नये किस्म की श्रंगार शैली और नए वस्त्र विधान की परिकल्पना पर काम करना शुरू किया.

लगभग दो साल की तैयारियों के बाद जाड़ों की एक रात पुनियापाड़ा के चौक में एक छोटा सा मंच और चलताऊ फर्श, कुर्सियां लगाकर हम लोगों ने ‘आज का नेता’ नाम की भगत का आयोजन किया. 5 दशकों के बाद शहर के किसी कोने में भगत का नगाड़ा गूंजा था. शहर के विभिन्न भगत अखाड़ों के सदस्य, संस्कृति प्रेमी और मीडिया की मौजूदगी में पूरा मौहल्ला जमा था. सामूहिक बलात्कार की घटना पर आधारित इसकी स्क्रिप्ट खलीफा ने लिखी (निरक्षर होने के चलते वह बोल-बोल कर लिखवाते हैं). बलात्कार शिकार लड़की की भूमिका एक किशोर (शिवम) कर रहा था. आज 5 साल बाद मैं पलटकर पीछे देखता हूं तो यह मुझे एक आदिम स्क्रिप्ट और प्रोडक्शन लगता है. मेरा प्रत्यक्ष हस्तक्षेप लगभग शून्य था . विषय जरूर नया था, लेकिन स्क्रिप्ट से लेकर प्रोडक्शन तक में खलीफा का ‘ओल्ड स्कूलिंग हैंगओवर’ साफ नजर आता था. नई किस्म की कहानी पर कैसी प्रतिक्रिया होगी, इसे लेकर वह थोड़ा सकपकाए हुए थे. स्थानीय मीडिया ने 50 साल के सन्नाटे के टूटने का स्वागत किया. अखाडे़ वालों और संस्कृति प्रेमियों ने इसे पसंद किया. 2 दिनों तक मौहल्ले की महिलाएं और लड़कियां खलीफा से मिलकर इसकी प्रशंसा करती रहीं. पुरातनपंथी खलीफाओं की परिषद के मंत्री ने इसे ‘भगत के नाम पर कलंक’ कहा.

बहरहाल चारों तरफ से मिली उत्साहजनक प्रतिक्रिया ने खलीफा को प्रोत्साहित किया. अब उन्हें भरोसा हो गया कि ‘नई भगत’ का वार खाली नहीं जायेगा. तमाम खामियों के बावजूद यह एक तरोताजा भोर सदृश्य था. मैंने, योगेंद्र दुबे और रंगलीला के दूसरे सभी मित्रों ने माना कि हमारी ‘हाईपोथीसिस’ सही दिशा में जा रही है. इस प्रस्तुति की 2 स्तर पर गहरी प्रतिक्रिया हुई. एक तो पुनियापाड़ा मोहल्ले के बच्चों (और उनके अभिभावकों ) ने खलीफा से मिलकर भगत सीखने की इच्छा जाहिर की. दूसरे, बाकी अखाड़ों में भी ‘नई भगत’ के पैरोकार पैदा होने लगे. हमारे लिए दोनों बातें सकारात्मक और उत्साहर्वधक थी. जल्द ही नए बच्चों को लेकर ‘भगत की वर्कशॉप’ उसी बालभैरों मंदिर में शुरू कर दी गई, जहां 28 वर्ष से खलीफा रह रहे थे. आगे चलकर स्कूलों और कॉलेजों में वर्कशॉपों का सिलसिला शुरु हो गया. ‘रंगलीला’ और ‘अखाड़ा दुर्गदास’ की इस संयुक्त मंडली में आज 2 दर्जन बच्चे सक्रिय हैं. इन सारी गतिविधियों से प्रभावित होकर अखाड़ा ‘चौक चमन’ और ‘नुनिहाई-शाहदरा’ ने ‘मीरा’ और ‘बहु की विदा’ भगत खेली. यह पुरानी स्क्रिप्ट थीं और उसी ‘पेर्टन’ पर खेली गई थीं.

भारत में शिक्षा-साक्षरता की जरूरत और इस दिशा में होने वाली कोशिशों का निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा विरोध. यह था हमारी अगली भगत कल का इण्डिया का विषय. इस ‘भगत’ में यह दिखाया गया था कि एक तरफ बाज़ारवाद साक्षरता का प्रचार अपने प्रोडक्ट बेचने की नीयत से कर रहा है जबकि इसकी वास्तविक जरूरत मनुष्य और समाज को अपने अधिकार जानने और अपना विकास करने की नीयत से है. इस ‘भगत’ ने एक और ऐतिहासिक मोड़ लिया. 400 वर्ष के भगत के इतिहास में पुरुष ही महिला भूमिकाओं का निर्वाह करते आए थे. पहली बार ‘रंगलीला’ की अभिनेत्री हिमानी चतुर्वेदी माँ की सशक्त भूमिका में मंच पर उतरीं. बस्तियों, स्कूलों और कॉलेजों में अनेक प्रस्तुतियाँ देने के बाद जब इस भगत ने 2011 के ‘ताज महोत्सव’ में दस्तक दी तो सूरसदन के खचाखच भरे हॉल के दर्शक जैस ठगे से रह गए. भगत के मंच पर महिला अभिनेत्री का पुरजोर स्वागत हुआ, हालांकि ‘भगत’ खलीफाओं के पुरातन स्कूल ने इसे ”मंच को गंदा करने“ की कोशिश माना. आगे चलकर इसकी प्रस्तुतियाँ दिल्ली (ग्रेटर नोएडा) स्थित बिड़ला मैनेजमेण्ट संस्थान, और कम्प्यूटर के संस्थान छप्प्ज् के छात्रों और प्राध्यापकों के बीच सफलतापूर्वक हुई. हमारे  ‘नए दौर की नई भगत ‘ की यह पहली स्क्रिप्ट और प्रोडक्शन था जिसमें मैने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया.

सन् 2011 के अक्टूबर की एक रात जब दर्शकों ने पुनियापाड़ा की ‘गांडे वाली बगीची’ के बड़े मैदान में भगत ‘मेरे बाबुल का बीजना’  का शानदार प्रदर्शन देखा तो वे जैसे ठगे से रह गए. यह दरअसल दो साल पहले इसी मोहल्ले के चौक में छोटे से मंच पर सामूहिक बलात्कार के मुद्दे को लेकर देखी गई भगत का जबर्दस्त और शानदार विस्तार था. नई विशाल मंच संरचना पर कहानी को एकदम नए ढंग से कहा गया था. नए किस्म के संवाद थे और नए किस्म के गीत. पिछली भगत से अलग हटकर इस बार बलात्कार की शिकार लड़की की भूमिका सहित तीन अलग-अलग भूमिकाओं में अभिनेत्रियाँ काम कर रही थीं. अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत 5 विदुषी महिलाओं ने दीप जलाकर इस भगत का उद्घाटन किया. दर्शकों ने इस भगत को जी भर कर सराहा. मीडिया ने इस पर विशेष आलेख प्रकाशित किए. सन् 2012 के ‘ताज महोत्सव’ में इसे जब पेश किया गया, 1000 कुर्सियों वाले ऑडिटोरियम में फर्श के एक-एक इंच पर दर्शकों का कब्जा था. भगत की समाप्ति के बाद देर तक हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा. प्रदेश के संस्कृति विभाग ने भी पहली बार इसका ‘शो’ आयोजित किया. डेढ़ साल से इसकी प्रस्तुतियाँ जारी हैं.

वर्ष 2013 में हम लोगों का नया प्रोडक्शन था संगत कीजे साधु की. आज के बाजारवादी स्वार्थमय युग में जबकि मनुष्य अपने और स्वजनों तक केन्द्रित हो चुका है, ‘संगत कीजे साधु की’ उसे वापस व्यापक समाज की जड़ों की ओर लौटने को प्रेरित करता है. इस भगत की दो विशेषताएँ थीं. अभी तक भगत की प्रस्तुतियों को युवा और किशोर ही पेश कर रहे थे. इन बच्चों की सफलताओं की विराट गाथाओं ने केवल दर्शकों को ही उद्वेलित नहीं किया बल्कि भगत अखाड़े के पुराने दिग्गज कलाकारों को भी दोबारा मंच पर कूदने के लिए प्रोत्साहित किया. हम लागों ने उनका स्वागत किया लेकिन साथ ही यह भी बता दिया कि उन्हें नई भगत के प्रशिक्षण के लिए खुद को तैयार करना होगा. उनमें से कुछ ने रज़ामंदी जाहिर की लेकिन बाकी हिचकिचाए. एक परिकल्पनाकार की हैसियत से इन लोगों के साथ काम करने का मेरा अनुभव अनूठा है. शुरू में वे स्वय भी परेशान थे और तालीम (रिहर्सल) के दौरान मुझे भी परेशान कर डालते. वे उसूलन मंचीय अनुशासन की बात मानते लेकिन अमल में उनका व्यवहार अराजक बना रहता. हमारे युवा और किशोर अभिनेता, अभिनेत्रियां जहां पूरी तरह अनुशासनबद्ध रहते वहीं ये लोग मनमर्जी आचरण करते. वे गायन और अभिनय करते, मंच के किसी भी हिस्से में चले जाते जिससे दूसरे अभिनताओं के लिए बड़ी मुश्किल होती. उनका सारा ध्यान गायन में रहता (जैसी कि भगत की परम्परा है), अभिनय की दिशा में वे हाथ-पांव तो चला लेते लेकिन चेहरे भावशून्य बने रहते. वे सभी अपने समय के श्रेष्ठ लोकगायक थे (और आज भी हैं) लेकिन अभिनय जैसी नई विधा को सीखना और मंचीय अनुशासन के भीतर रहकर काम करना उनके लिए बेहद कष्टदायक था. साल भर के कठिन परिश्रम के बाद स्थितियों ने कुछ-कुछ मोड़ लिया है. ‘संगत कीजे साधु की’ के दौरान ही मैंने उन्हें ‘मेरे बाबुल का बीजना की’ समान्तर कास्ट में शामिल कर लिया था. बीजना में कई ऐसे चरित्र हैं जो स्वभावतः उम्र-दराज अभिनेताओं पर ज्यादा फबते हैं. यद्यपि दोनों प्रस्तुतियों में कोई भी कलापारखी, उनके और युवा-किशोर अभिनेताओं के मंचीय आचरण के विभेद को अच्छी तरह पहचान सकता है, फिर भी उनकी कोशिशों से लगता है कि आने वाले दिनों में वे और भी सुधरेंगे.

सन् 2008 से 2013 के बीच हम लोग न सिर्फ भगत की नई डिजाइन पर काम करते रहे हैं, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर प्रस्तुतियाँ देकर नए दर्शकों का व्यापक समूह (जिसमें बड़ी तादाद उन युवाओं और अधेड़ों की है जिन्होंने अपने बुजुर्गों से ‘भगत’ का जिक्र भर सुन रखा था) तैयार कर रहे हैं, भगत से जुड़े अलग-अलग विषयों और ‘नई भगत’ के सामने चुनौतियाँ जैसे सवालों पर गोष्ठियां और सेमिनार करके छात्रों, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों के बीच वैचारिक चेतना पैदा करने का काम भी कर रहे हैं. हम लोगों की इन सारी कोशिशों से शैक्षिक जगत में भी नए सवाल उठ खड़े होने लगे हैं. हम लोगों के सहयोग से दयालबाग विश्वविद्यालय के संगीत विभाग की प्रो0 सत्संगी की देखरेख में ‘भगत’ के राग-रागनियों के नोटेशन पर पहली पीएचडी0 की गई. सुश्री निम्मी गुप्ता ने हाल ही में अपनी थीसिस जमा की है. हिन्दी विभाग में भी ‘भगत’ पर शोध कार्य हो रहा है. आगरा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग के छात्र कमलदीप ने ‘भगत’ पर लघु शोध प्रबंध तैयार किया है. भगत के पूर्व इतिहास में दस्तावेजीकरण का गंभीर संकट था. न कोई पुस्तक या पुस्तिका थी, न ब्रोशर, तस्वीरें या कॉस्ट्यूम्स सहेज कर रखे गए थे. ‘रंगलीला’ ने इस विषय में व्यापक पहल की है. पिछले 7 वर्षों में हम ‘भगत’ से जुड़ा 12 घण्टे का वीडियो डॉक्यूमेन्टेशन तैयार कर चुके हैं. यह प्रक्रिया आगे भी चलती रहेगी. अपनी और अन्य अखाड़ों से जुड़ी गतिविधियों की स्टिल फोटोग्राफ्स का एक बड़ा स्टॉक भी तैयार किया गया है. हम लोग दो किताबों के सम्पादन पर भी कार्य कर रहे हैं.

सात वर्षों के कठोर परिश्रम के बावजूद हम लोग मानते हैं कि अभी हमारा शैशव काल है और हम अभी भी घुटनों के बल चल रहे हैं. 50 साल के सन्नाटे को चीरने और एक नए स्वरूप को विकसित करने में इतने समय का लगना कोई बड़ी बात नहीं. हमारे यहां चार पीढ़ियां एक साथ ‘नई भगत’ सीख रही हैं. बुजुर्ग खलीफ़ा से लेकर किशोरों तक की यह रंग यात्रा आने वाले सालों में जब भी ”अपने पैरों“ पर खड़ी होगी, निःसन्देह वह देश भर के कलाकर्मियों के लिए अनोखी सीख की मानिंद होगी. आगरा के इस सांस्कृतिक नवजागरण आन्दोलन को देखकर शहर के बुजुर्गों के मुंह से बेसाख़्ता फूट पड़ता है – न भूतो न भविष्यति!

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{संगीत नाटक अकादमी  की पत्रिका ‘संगना’ ( अप्रैल-जून  2013) से साभार}

अनिल शुक्ल ,17/232, छिली ईंट रोड, आगरा-282 003, मो. 9412895544

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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