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आटे की नासमझी

By   /  July 25, 2013  /  4 Comments

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-आलोक पुराणिक|| 

भुट्टे भूनकर वह रोज करीब दो सौ रुपये कमा लेती है, और सामने उसकी सहेली नाली के ऊपर पत्थर जमाकर प्रेस करके करीब ढाई सौ रुपये रोज कमा लेती है.

योजना आयोग की नयी परिभाषाएं सुनकर एक ने दूसरे को बधाई दी- बहन हम अमीर हो गये हैं.

बहन, कैसे अमीर हो गये, हमें तो पता ही ना चला. वैसे के वैसे फटेहाल से हैं.

आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

बहन, तुम नासमझ, सो अमीरी ना समझ पा रही, योजना आयोग वाले जाने हैं सारी बात, हम अब घणे अमीर हो लिये. अब गांव में 27 रुपये 20 पैसे रोज से कम खर्च करनेवाला और शहर में 33 रुपये 33 पैसे से कम खर्च करने वाला ही गरीब माना जायेगा.

बहन, कब हो लिये अमीर, पता ना चला.

बहन, पता ना चलता इस मुल्क में, आदमी कब क्या हो जाये. पुराने चोर मंत्री हो जायें. मंत्री तिहाड़ जेल निवासी संघ के सदस्य हो जायें. भुट्टेवाली अमीर हो जाये.

बहन,33 रुपये की अमीरी में तो दो किलो कायदे का आटा भी ना आ रहा. अमीरी में आटा गीला हो रहा है, पहले तो कंगाली में हुआ करता था.

बहन, आटा ना आ रहा दो किलो, तो इसमें अमीरी की क्या गलती है. योजना आयोग समझ रहा है , तू अमीर है. तू समझ ले, तू अमीर है. अब आटा नासमझ है कि तुझे अमीर ना समझ रहा.

मैंने समाज के विभिन्न वर्गों से बात की- क्या 33 रुपये 33 पैसे रोज से अमीरी आ सकती है.

एक पुलिस वाला बोला-अमीरी-गरीबी की तो यूं है कि ईमानदारी से चलेगा, तो हमेशा ही गरीब बना रहेगा और जो सही रास्ता पकड़ लिया तो हवलदारी में भी अमीरी दिख जाये. तैंतीस रुपये घर से लेकर निकलूं, शाम तक पांच हजार तैंतीस हो जायें. घणी अमीरी हो जाये.

चोर ने इस बारे में यूं कहा- दूसरों के माल पे हाथ साफ करो, तो कभी ना चिंता सताती कि गरीबी रहेगी कि अमीरी रहेगी.

दूसरों के माल पर हाथ साफ करने लगो, तो फिर गरीबी की प्राबलम ना रहती.

प्राबलम तो भुट्टेवाली को है, पर क्या खाक प्राबलम, वो नासमझ तो अमीर हो ही चुकी है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. Ashok Gupta says:

    jok-aayog aate hi me too ghta hai sare me ghun lgagi hai

  2. mahendra gupta says:

    आटे को अर्थ शास्त्र समझ नहीं आता और न योजना आयोग की योजना.तब उस आटे को खाने वालों को यह सब समझ कैसे आएगी यदि .यह सब हो गया है तब तो सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल लाने की जरूरत ही नहीं.अक्ल के अमीर, योजना आयोग की यह सब बातें माननी ही होगी आखिर साठ साल से देश में अमीरी गरीबी का विकास उसी के दिशा निर्देशन में हो रहा है. आलोकजी अच्छा व्यंग,,बधाई

  3. आटे को अर्थ शास्त्र समझ नहीं आता और न योजना आयोग की योजना.तब उस आटे को खाने वालों को यह सब समझ कैसे आएगी यदि.यह सब हो गया है तब तो सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल लाने की जरूरत ही नहीं.अक्ल के अमीर, योजना आयोग की यह सब बातें माननी ही होगी आखिर साठ साल से देश में अमीरी गरीबी का विकास उसी के दिशा निर्देशन में हो रहा है. आलोकजी अच्छा व्यंग,,बधाई.

  4. आटे को अर्थ शास्त्र समझ नहीं आता न योजना आयोग की योजना.तब उस आटे को खाने वालों की समझ कैसे बनेगी.यह सब हो गया है तब तो सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल लेन की जरूरत ही नहीं.अकाल का अमीर योजना आयोग जब यह सब मानना ही होगा आखिर साठ साल से देश में अमीरी गरीबी का विकास उसी के दिशा निर्देशन में हो रहा है. आलोकजी अच्छा व्यंग,,बधाई.

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