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हुई इंसानियत शर्मसार, मुंह पर कालिख पोत कर दलित दम्पति को घुमाया.. वीडियो देखें…

By   /  July 25, 2013  /  No Comments

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-चन्दन सिंह भाटी||

जालोर  राजस्थान के जालोर शहर में सोमवार को दलित दम्पति को काला मुंह कर घुमाने की घटना ने जहां मानवता को शर्मसार कर दिया. वहीं पूरे घटनाक्रम ने पुलिस महकमे की कार्यशैली पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है.dalit ka munh kala kiya

करीब डेढ़-दो घंटे चले इस घटनाक्रम में भीड़ मन मर्जी करती रही. सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि यह घटना शहर में हुई है वो भी पुलिस और प्रशासन के सामने हुई लेकिन किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी  दम्पति लोगो से रिहाई के लिए की भीख मागता रहा लेकिन वह खड़े सेकड़ो लोगो में से किस ने इस दम्पति का मदद करना उचित नहीं समझा जबकि पुलिस सारे माजरे को हलके में लेती रही. यही नहीं काफी देर तक ट्रैफिक समेत कई कांस्टेबल इस माजरे के तमाशबीन भी बने रहे.

इस दम्पति पर भीड़ का यह आरोप था कि दम्पति गो तस्करी करता है. लेकिन दलित दम्पति का कहना है कि यह आरोप निराधार है फिर क्या था, आक्रोशित लोगों ने पति-पत्नी को भक्त प्रह्लाद चौक से पकड़ा. इस दौरान इन लोगों ने दम्पति के हाथ बांधने के साथ पति का मुंह काला किया. ये लोग दम्पति को मारते-पीटते और घसीटते हुए बड़ी पोल, घांचियों की पिलानी होते हुए तिलकद्वार से अस्पताल चौराहे तक लेकर पहुंचे.

आप खुद फुटेज में देखिए की किस तरह दलित दम्पति को लोग घुमा रहे है पुलिस वाले मूक दर्शक बन कर देख रहे है और किस तरह इस दम्पति के हाथो को रसी से से बांध रखे है किस तरह से मन्नते माग रहे है दोनों अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर इन्होने गो तस्करी की भी है तो इन लोगो को किस ने इस तरह का अधिकार दे दिया कि दलितदम्पति के साथ इस तरह की इंसानियत को शर्मसार करने की करतूत करे और इससे भी बड़ा सवाल पुलिस क्यों मूक दर्शक बनकर सब कुछ घंटो तक देखती रही.

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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