/शहीद भगत सिंह के विचारों को अपने हक़ में तोड़ मरोड़ कर पेश करता रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ…

शहीद भगत सिंह के विचारों को अपने हक़ में तोड़ मरोड़ कर पेश करता रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ…

भारत के हिन्दू संगठनों, विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगत सिंह, उनके परिवार और उनके विचारों तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया अपने फायदे के लिए…

चौंकिए मत. पिछले ८२ सालों से भारत के हिन्दू संगठनों ने भगत सिंह और स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों शहीदों के विचारों को “स्वहित” के लिए गलत तरीकों से प्रस्तुत किया, इस्तेमाल किया.. आज न तो भगत सिंह हैं और न ही उनके विचार…सबों का इस्तेमाल “साम्राज्यवाद” को मजबूत करने में किया गया…जिसके “बिलकुल खिलाफ थे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी…

-शिवनाथ झा||

बिद्याम्बर कौर महज चार साल छोटी थी भगत सिंह से. उन्होंने देखा था अपने क्रांतिकारी भाई को, उनके दोस्तों को. समझा था उनके विचारों को. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तो मातृभूमि की स्वतंत्रता और भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये जाने वाले “साम्राज्यवाद” के खिलाफ लड़ते-लड़ते फांसी के फंदों पर लटक गए आज से लगभग ८२ वर्ष पूर्व २३ मार्च १९३१ को.

bhagat-singhपरन्तु इन बीते दिनों में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारियों, विशेषकर भगत सिंह के विचारों को, जिसके तले सभी क्रांतिकारी ‘एकबद्ध’ थे, अगर किसी ने सबसे ज्यादा ‘क्षति’ पहुंचाई, अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया तो वह है भारत का हिन्दू संगठन, विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. यह बात बिद्याम्बर कौर की दो जीवित संतानों – जोगिन्दर कौर और प्रोफ़ेसर जग मोहन सिंह ने कही.

जोगिन्दर कौर, भगत सिंह के फांसी लगने के अगले वर्ष १९३२ में पैदा हुयी. जबकि प्रोफ़ेसर जगमोहन सिंह ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से सन २००४ में अवकाश प्राप्त किया. जग मोहन सिंह भगत सिंह सेंटेनरी फ़ौंडेशन के अध्यक्ष भी हैं और भगत सिंह की सम्पूर्ण लेखनी और दस्तावेजों पर अभी हाल में एक पुस्तक भी प्रकाशित की है.

प्रोफ़ेसर सिंह ने कहा: “भारत के हिन्दू संगठन, विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बहुत ही गलत तरीकों से भगत सिंह, उनके परिवार, उनके वंशजों और सबसे बड़ी बात, उनके विचारों को, सिद्धांतों को अपने हित, राजनैतिक लाभ के लिए प्रचारित, प्रसारित किया.

जिस साम्राज्यवाद के खिलाफ भगत सिंह और उनके सहयोगियों ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नयी दिशा दी, भगत सिंह के फांसी के बाद, इन लोगों ने विश्व को भ्रमित किया.”

प्रोफ़ेसर सिंह कहते हैं कि “भारत की आवाम शायद सोच भी नहीं सकती क्या पीड़ा होती है जब कोई अपना चला जाता है और उसके विचारों को “राजनैतिक-बाज़ार में” सबसे अधिक मूल्य पर मुनाफा कमाने के लिए बेचा जाता है – पिछले ८१ सालों में तो यही हुआ, विशेषकर पिछले ६७ सालों में मुनाफाखोरों की तो चाँदी ही चाँदी रही.”

भगत सिंह अपने जीवन के शुरू के ही दिनों से एक क्रन्तिकारी विचारधारा के थे और मार्क्स के सिद्धांतो से प्रेरित थे. वतन की आजादी के लिए दृढ-संकल्प थे और यही कारण है कि सन १९२८ आते-आते हिस्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के एक प्रमुख क्रन्तिकारी बन गये.

Bhagat Singh Family 1
प्रोफ़ेसर जगमोहन सिंह अपनी बहन जोगिन्दर कौर के साथ

सन १९१९ में बारह वर्ष की अवस्था में भगत सिंह अपने गाँव से कोसों दूर अमृतसर के जलियांवाला वाला बाग पहुंचे जहाँ अंग्रेजों ने हजारों निहत्थे भारतीयों को मार कर ढेर कर दिया था. मन ही मन अब तक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक द्वंद चल रहा था

वैसे अपने जीवन और आन्दोलन के प्रारंभिक दिनों में वे महात्मा गाँधी के कई सत्याग्रहों में बढ़-चढ़ का हिस्सा ले चुके थे परन्तु समय के साथ साथ और उन दिनों देश में आज़ादी के लिए युवाओं में बढती उन्माद और खास-कर गुरुद्वारा ननकाना और चौरी-चौरा कांड के पश्चात्,  भगत सिंह ही नहीं, अन्य  क्रांतिकारियों की गाँधी के विचारों से दूरियां बढती गयी.

सन १९२६ में भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा का गठन किया और राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आजाद, अशफाकुल्लाह खान जैसे क्रांतिकारियों को साथ ले हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के साथ मिलकर जंगे आज़ादी को एक नया तेवर दिया.

भगत सिंह का कहना था कि उन्होंने अपने जीवन को,  बहुमूल्य कार्य – मातृभूमि की स्वतंत्रता – के लिए समर्पित कर दिया है. संसार में कोई भी  ऐसी वस्तु या इच्छा नहीं है जो उन्हें अपने मार्ग से भ्रमित कर दे.

इसी तरह ८ अप्रैल १९२९ को दिल्ली के सेन्ट्रल एसेम्बली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज, भारत के लोगों की आवाज को पहुँचाने, मजबूत करते के लिए बमों का विस्फोट किया और “इन्किलाब जिंदाबाद” “समाज्यवाद मुर्दाबाद” का नारा दिया, आन्दोलन का बिगुल फूंका.

समय बीतता गया, आन्दोलन की दिशा और तेवर बदलते गए, सैकड़ों क्रन्तिकारी अब तक फांसी के फंदों तक पहुँच गए थे, सैकड़ों गोलियों के शिकार हो चुके थे.

और इसी क्रम में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव “मेरा रंग दे बसंती चोला” गाते गाते २३ मार्च १९३१ को लाहौर जेल में अंग्रेज़ सरकार द्वारा फांसी के फंदों पर लटका दिए गए. शरीर तो मर गया, मातृभूमि में मिल गया लेकिन उनके विचार अगर आज जीवित हैं तो सिर्फ उनके वंशजों में, उनके परिवार के जीवित सदस्यों में. शेष भारत के लोग तो उनका, उनके सिद्धांतों का अपने-अपने हितो की रक्षा के लिए ही इस्तेमाल, कर रहे हैं.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.