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किनारा बाजार के दुकानदार…

By   /  July 27, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

जी, पाठक माईबाप, किनारा बाजार ही है, छपने की भूल-चूक नहीं कि किनारी बाजार का किनारा बाजार हो गया हो। साड़ियों के किनारे पर लगनेवाली किनारियों के बाजार को किनारी बाजार बोला जाता रहा है।

पर अब किनारा बाजार फल-फूल रहा है, फुल रफ्तार से।

फेसबुक पर प्रकाशित एक चित्र

फेसबुक पर प्रकाशित एक चित्र

एक नेता ने कहा- मुंबई में बारह रुपये में खाना खाओ, एक नेता बोला -दिल्ली में जामा मस्जिद के पास पांच रुपये में खाना खाओ। कश्मीर का एक नेता बोला -एक रुपये में खा लो खाना।

बारह रुपये और पांच रुपये में खाना खिलानेवाले नेताओं की पार्टी ने तो उनके बयानों से किनारा कर लिया।

कश्मीर के नेता की पार्टी में किनारेबाजी यूं ना होनी कि अपनी पार्टी के किनारे, गढ्ढे, भंवर, सब कुछ वो खुद और उनके बेटे ही हैं।

एक पार्टी के एक नेता ने कहा कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन से भारत रत्न वापस ले लिया जाना चाहिए। इस नेता की पार्टी ने इस बयान से किनारा कर लिया है।

पालिटिक्स नहीं, किनारा बाजार हो गयी है। एक धारा, सौ करोड़ किनारे। धारा तो दरअसल अब बची ही नहीं, सिर्फ किनारे ही किनारे दिखते हैं।

पार्टियों को अब किनारा नहीं करना चाहिए, नेता ने जो भंवर-गढ्डा किया हो, उसे और गहरा करना चाहिए, इतना गहरा कि पब्लिक उसमें आसानी से डूबकर मर ले।

आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

जैसे यूं कहना चाहिए कि खाना मुफ्त और कुछ रकम भी मिलेगी, बस सुबह उठकर पता करें कि आज भूखे-भिखारियों को कहां खिलाया जायेगा।

हाय, हाय यूं भिखारी बनकर खायेंगे। क्या इज्जत रह जायेगी।

देखो, बात खाना मिलने की हुई है, इज्जत मिलने की ना हुई।

एक पिज्जा कंपनीवाले को मैंने डांटा-तुम बताते हो 44 रुपये में सस्ता पिज्जा। पिज्जा के भाव बढ़ाकर साठ रुपये करो। और इश्तिहार करो -सस्ता पिज्जा-सिर्फ बारह रुपये में, टर्म्स एंड कंडीशन्स एप्लाई, फिर लिखो बारह रुपये पांच बार देने पड़ेंगे।

पिज्जावाला बोला-पब्लिक गुस्सा नहीं होगी, इस इश्तिहार पर।

मैंने उसे समझा दिया है-पब्लिक अब गुस्सा ना होती, हंसती है नेताओं के बयानों पर, ऐसे इश्तिहारों पर। अगर पब्लिक गुस्सा बहुत ही ज्यादा हो जाये तो इस इश्तिहार से किनारा कर लेना। फैशन है।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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