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वह जूं कहां मिलती है दोस्तों, जो हिन्दी वालों के कान पर रेंगती है..

By   /  July 27, 2013  /  No Comments

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राष्ट्र भाषा हिंदी को देश में उचित स्थान दिलवाने के लिए अपने ऊँचाईयों की ओर जाने वाले करियर को छोड़ अपनी ज़िंदगी इस आन्दोलन के लिए होम कर देने वाले श्यामरूद्र पाठक की पत्नी मंजू जी बताती हैं कि श्यामरुद्र जी ने भाषाओं के काम के लिए अपने चमचमाते वैज्ञानिक भविष्य (करियर) को नष्ट हो जाने दिया। वह दोनों आईआईटी में मिले थे, प्रेम हुआ, विवाह हुआ। तीन संतानें-तीनों मेधावी, उच्चपदस्थ, कुछ विदेशस्थ। वह TIFR (Tata Institute of Fundamental Research) में रहे, मौलिक विश्वस्तरीय शोध कर रहे थे, पर अपनी सिधाई और अटल सिद्धांतप्रियता के कारण धोखे और ईर्ष्या का शिकार हुए। कई विदेशी विश्वविद्यालयों से निमंत्रण थे। अंतरराष्ट्रीय ख्याति, धन, पद पा सकते थे। सब ठुकराया भारत और भारतीय भाषाओं के माध्यम से उसके जन की सेवा करने के लिए। वर्षों पर पुष्पेन्द्र चौहान, पाठक और उनके साथियों ने संघ लोक सेवा आयोग के सामने ऐतिहासिक धरना दिया, भारतीय भाषाओं में अखिल भारतीय सेवाओं में परीक्षा संभव बनाने में अपने को होम किया, अब उच्च न्यायालयों में प्रादेशिक भाषाओं और सर्वोच्च न्ययालय में हिन्दी सहित दूसरी भाषाओं के लिए संविधान संशोधन की मांग पर लड़ रहे हैं। पचास से ज्यादा सांसदों ने समर्थन में हस्ताक्षर किए हैं। उनकी सहयोगी गीता मिश्र, विनोद पांडे आदि ने दर दर जाकर, द्वार खटखटा कर यह किया है। ऑस्कर फर्नांडीज ने समर्थन में बहुत अच्छी चिट्ठी लिखी है। पर जहां रेंगनी चाहिए वहां कोई जूं नहीं रेंगी।

रेंगे कैसे…लोकतंत्र में तो संख्या चाहिए न…और वह संख्या पाठक-चौहान जैसे बलिदानी पागलों के पीछे थोड़े आती है…भले ही हमारी जनगणना बताए कि सिर्फ 110-115 करोड़ भारतीय सिर्फ अपनी अपनी भाषाओं में जीते-मरते हैं…

-राहुल देव||

सौ करोड़ से ज्यादा भारतीयों के अपनी भाषा में न्याय पाने, होते देखने, उस प्रक्रिया में शामिल होने और उससे अवगत होने के बुनियादी अधिकार के लिए ऐतिहासिक और अभूतपूर्व लड़ाई लड़ने वाले श्यामरूद्र पाठक को गलत, झूठे, मनगढंत आरोप लगा कर तिहाड़ जेल में भेजे जाने, वहां सामान्य अपराधियों के साथ रखकर शारीरिक और मानसिक यंत्रणा दिए जाने, फिर एक सप्ताह के बाद परसों 24 जुलाई को पहली बार अदालत में पेश किए जाने तक के समय में सारी भाषाओं तो क्या हिन्दी के अधिकांश अखबारों, चैनलों, लेखकों, विद्वानों, दुकानदारों, मठाधीशों को उनकी सुध लेने की जरूरत़ महसूस नहीं हुई।shyamrudra-pathak

जिस दिल्ली में रोज कम से कम आधा दर्जन साहित्यिक गोष्ठियां, कविता-कहानी पाठ, लोकार्पण, सम्मान आदि के कार्यक्रम अकेली हिन्दी में ही होते हैं, दर्जनों सरकारी-गैरसरकारी हिन्दी और अन्य भाषाओं की अकादमियां, संस्थाएं हैं, हजारों लेखक हैं, एक करोड़ से ज्यादा भारतीय भाषाभाषी हैं, चंद हजार हिन्दी शिक्षक हैं, छात्र हैं – उसमें उसका हाल पूछने, उसका साथ देने, उसकी गैरकानूनी गिरफ्तारी का विरोध करने मुश्किल से डेढ़ सौ लोग रहे।

नहीं जानता कितने संपादकीय लिख गए उनके अभूतपूर्व 225 दिन के अनशन पर, या उस मुद्दे पर जिसे वह उठा रहे थे। कितने समाचार, कितनी गंभीर संपादकीय टिप्पणियां, लेख। कितने लेखकों, संपादकों, पत्रकारों, वकीलों, पूर्व न्यायाधीशों ने उनसे मिल कर बात की…

वह बता रहे थे जिस 16 जुलाई को अपने धरना-स्थल 24, अकबर रोड, के फुटपाथ से वह गिरफ्तार किए गए उस समय वह बिलकुल अकेले थे। इतने अकेले कि रोज़ लगाने वाले नारे लगाने का भी विचार त्याग दिया…

अकेली हिन्दी में ही कितने लखटकिया पुरस्कार हैं, हजारों वाले तो दर्जनों होंगे…कितने सम्मान हैं…कितने पुरस्कृत, सम्मानित, समादृत हिन्दी साधक-चिंतक-लेखक-वेखक-कवि-संस्था अध्यक्ष- उपाध्यक्ष- कार्याध्यक्ष- सचिव-मुनीम-खजांची-दुकानदार-मठाधिपति-दलपति और अंत में सेवक-पाठक-प्रेमी हैं…

पर सैकड़ों दिन श्यामरुद्र पाठक अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय और यूपीए-कांग्रेस अध्यक्षा के घर के बीच के फुटपाथ पर, और उधर पुष्पेन्द्र चौहान तथा चंद प्रतिबद्ध साथी जंतर मंतर पर भारतीय भाषा आंदोलन के बैनर तले अनशन करते रहे – अकेले, उपेक्षित, साधनहीन पर अदीन।

वह जूं कहां मिलती है दोस्तों जो हिन्दी वालों के कान पर रेंगती है..

 

(राहुल देव की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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