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फरीदकोट के महाराजा की बेटियों को मिलेगी 200 अरब की संपत्ति

By   /  July 28, 2013  /  2 Comments

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फरीदकोट के पूर्व महाराजा की बेटियों को 21 साल तक चली कानूनी जंग में जीत मिली है और अदालत ने 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति को लेकर उनके हक में फैसला सुनाया है.

चंडीगढ़ की अदालत ने फैसला दिया कि पूर्व महाराजा की वसीयत पर जाली दस्तखत किए गए जिसके अनुसार उनकी संपत्ति एक ऐसे चैरिटेबल ट्रस्ट को चली गई जो महाराजा के पूर्व नौकरों और महल के अधिकारियों ने बनाया था.fcd22353-c57d-4f7a-8038-ff209eee99d7hires

जिस जायदाद को लेकर अदालत ने अब महाराजा की बेटियों के हक में फैसला सुनाया है उसमें चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और आंध्र प्रदेश में कई संपत्तियां हैं.

इसके अलावा एक साढ़े तीन सौ साल पुराना किला, दो सौ एकड़ में फैली एक हवाई पट्टी, सोना के जवाहारात और कई विंटेज कारें शामिल हैं.

अब ये सारी संपत्ति महाराजा की दो बेटियों के नाम कर दी जाएगी.

चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने गुरुवार को सर हरिंदर सिंह बराड़ की बेटी अमृत कौर के पक्ष में फैसला दिया, जिन्होंने वसीयत को चुनौती दी थी.

अदालत ने घोषणा की कि वसीयत जाली थी और हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत अमृत कौर और उनकी बहन दीपेंदर कौर को बीस हजार करोड़ रुपये की संपत्ति का वारिस बताया है.

महाराजा के परिवार के वकील विकास जैन ने कहा कि चूंकि एक जुलाई 1982 को बनाई गई वसीयत को अदालत ने ‘गैरकानूनी’ और ‘अमान्य’ घोषित किया है, इसलिए ‘मेहरवाल खेवाजी ट्रस्ट’ भी गैरकानूनी हो जाता है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार महाराजा की तीन बेटियों में से एक अमृत कौर चंड़ीगढ़ में जबकि दीपेंदर कोलकाता में रहती हैं. उनकी तीसरी बेटी महीपिंदर कौर का कुछ वर्षों पहले शिमला में निधन हो गया था.

बताया जाता है कि जब इस जाली वसीयत तैयार की गई थी उस वक्त सर बराड़ अपने इकलौते बेटे टिक्का हरमोनिंदर सिंह बराड़ की मौत के कारण अवसाद के दौर से गुजर रहे थे.

(सौजन्य बीबीसी)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Vijay Gupta says:

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