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घरेलू हिंसा की पराकाष्ठा, पति नहीं शैतान है वो…

By   /  July 28, 2013  /  No Comments

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-भंवर मेघवंशी||

‘‘जब मैं मात्र 17 वर्ष की थी, मुझे स्कूल से बहला-फुसला कर चन्दू ले भागा, साल भर ठीक चला, बाद में मेरे साथ मारपीट करना, शक करना शुरू कर दिया, हर बार टॉचर्र करता, एक बार तो मेरा हाथ तोड़ दिया। सास-ससुर के सामने भी पीटता, मेरे मम्मी-पापा से भी बात नहीं करवाता और ना ही मिलने देता है, उनको भी फोन करके गाली-गलौज करता है और मुझसे जबरदस्ती फोन करवा कर उन्हें गाली बोलवाता है। कहता है कि तू वहां चली गई तो उनको मार दूंगा या तुझे मार दूंगा, वो मेरे बच्चों को भी बुरी तरीके से मारता है, मुझे भी जो भी चीज हाथ में आ जाए उससे मारने लगता है, बेल्ट से, जूतों से, लकड़ी से…, घर के अन्दर बंद करके चला जाता है, बाहर भी नहीं जाने देता (टॉयलेट तक के लिए भी नहीं), घर के सदस्यों पर भी शक करता है, हमेशा ‘रंडी’ कहकर बुलाता है, सबके सामने गालियां देता है, जब मैं अपने मां-बाप के साथ आ जाती हूं (चोरी-छिपे) तब पीहर में आकर मारपीट करके मुझे ले जाकर कहीं ऐसी जगह रखता है जहां मुझे कोई ढूंढ नहीं सके, मुझे एक-दो दिन तक बंद रखता, पैसा भी नहीं देता, ना ही मेरी कोई इच्छा उसके लिए मायने रखती है।domestic-violence

घर पर खाने के लिए भी कुछ नहीं लाता, मैं उससे इतनी परेशान हूं कि मर जाने की इच्छा होती है। मेरा पति चन्दू थोरिया, जिला-राजसमंद का निवासी है, आपराधिक प्रकृति का आदमी है, थाना देवगढ़ का हिस्ट्रीशीटर है। वह मेरे मां-बाप को मारने की धमकी देता है बार-बार, उसने मुझे इतना डरा रखा है कि तीन बार मैं घर छोड़कर भागी, मुझे रातें बीहड़-जंगलों में जंगली जानवरों के भय के बीच गुजारनी पड़ी। मैंने उसे समझने व सुधार करने के लिए कई मौके दिए, पर वह नहीं सुधरा, सामाजिक तौर तरीके से भी कई बार समझाईश की गई मगर उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। मैं मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद प्रताड़ित हूं। मुझे उस शैतान से बचाया जाए। इसको काबू में करना मेरे तथा मेरे परिवार के लिए क्षमता के बाहर की बात है। इसका पीटने का तरीका एक राक्षस की तरह का है, दरवाजा बंद करके बुरी तरह से पीटता है। जब मैं रोती हूं, चीखती, चिल्लाती हूं और मदद मांगती हूं तो वह टी वी की आवाज तेज कर देता है। घर वाले, पड़ोसी सब यही सोचते है कि टी वी चल रही है। एक दिन तो दिन के ग्यारह बजे वह गुण्डे लेकर आ गया और उठा कर ले जाने की कोशिश की, मगर गांव वालों ने मुझे बचाया, मैं उसके उत्पीड़न से इतनी तंग आ गई हूं कि मैंने आत्महत्या तक की कोशिश की है।’’
यह बयान है 19 वर्षीय एक फूल सरीखी प्यारी सी मगर बिल्कुल मुरझायी हुई एक लड़की की कहानी है।
स्ंक्षिप्त घटनाक्रम इस प्रकार है कि निर्मला (बदला हुआ नाम) को सन् 2006 में देवगढ़ थाने का एक हिस्ट्रीशीटर 11वीं में पढ़ते वक्त जबकि वह नाबालिग थी, तभी अपहरण करके ले गया, उसके साथ शादी किए बगैर ही पत्नी बना कर रहने लगा, निर्मला के परिजनों ने पाली जिले की जैतारण तहसील के सैंदड़ा थाने में अपनी नाबालिग पुत्री के अपहरण का मामला दर्ज करवाया, पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही नहीं होने से निर्मला उसी व्यक्ति के साथ रही। एक साल के बाद जैसे ही निर्मला वयस्क हुई उसके साथ मारपीट और शारीरिक प्रताड़ना प्रारंभ हो गई, कई बार समझाईश भी की गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
बढ़ती हुई प्रताड़ना से दुखी होकर सन् 2009 में निर्मला के पिता ने जाति समुदाय के पंचों व मोतबीर लोगों का सहारा लिया, दोनों परिवारों को इकट्ठा किया गया, स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी की गई जिसमें चन्दू ने माना कि वह आज के बाद कभी भी अपनी पत्नी निर्मला के साथ मारपीट नहीं करेगा, न ही तंग-परेशान व हैरान करेगा, उसने इकरार किया कि- ‘‘मुझसे पहले गलती हो गई थी, जिसमें मैंने मेरी पत्नी के साथ मारपीट की थी तथा उसे परेशान किया था।’’
निर्मला राखी के त्यौहार पर अपने पिता के घर आ गई, उसे वापस ले जाने से पहले चन्दू ने, उसके पिता घीसा तथा रविन्द्र तथा भगवती इत्यादि के साक्षी में 10रु. के नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर लिख कर दिया कि- ‘‘आज (30 जुलाई 2009) के बाद मैं किसी भी तरह से किसी को भी परेशानी या शिकायत का मौका नहीं दूंगा। मेरी पत्नी को कभी भी उसके पीहर आने-जाने में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं रहेगी, न ही बच्चों को मैं परेशान करूंगा। आज मोतबीरानों के समझाने पर मुझे महसूस हुआ है कि मैंने वास्तव में मेरी पत्नी को बहुत दुखी व तंग किया, लेकिन आज यह स्टाम्प मैं पश्चाताप में होशोहवास, स्वस्थचित्त, बुद्धि, अक्ल, होशियारी, बिना किसी दबाव के लिख रहा हूं।’’
इस प्रकार के माफीनामे के बाद निर्मला को उसके पिता ने वापस उसके ससुराल थोरिया भेज दिया जहां पर फिर से उसको प्रताड़ित करने का दौर चला, उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। प्रताड़ना की तब तो हद ही हो गई जब 12 जून 2010 को चन्दू ने निर्मला के साथ गाली-गलौज किया तथा बेरहमी से मारपीट कर भयंकर चोटें पहुंचाई। पता चलने पर निर्मला की मां थोरिया पहुंची तथा अपनी बेटी को घर लिवा लाई, निर्मला का थोरिया छोड़कर चले जाना मानसिक रूप से असामान्य चन्दू को अखर गया, वह 15 जून को दोपहर करीब डेढ़ बजे अपने चार साथियों के साथ काले शीशे की काली गाड़ी में आया तथा सबके सामने निर्मला से मारपीट की और घसीटकर ले जाने लगा, उसने निर्मला को करीब आधा किलोमीटर घसीटा, जिससे वह बेहोश हो गई, निर्मला की मां ने बीच-बचाव की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हो सकी, उसे भी मारपीट आौर जलालत झेलनी पड़ी, विरोध करने पर उसका गला घोंटने की कोशिश की गई। इस प्रकार जो भी बीच-बचाव के लिए आया, उसी की हालत बिगाड़ दी गई।
निर्मला बचाव के लिए जोर-जोर से चिल्लाने लगी तो पड़ोसी मौके पर पहुंच गए, उसके पिता भी आ गए, यह देखकर चन्दू कार लेकर अपने साथियों सहित जंगल की तरफ भागा, भागते वक्त उसने देशी कट्टे से फायरिंग भी की, उसके अन्य साथी नकाब पहने हुए थे और धारदार हथियारों से लैस थे, पुलिस ने 15 जून 2013 को सैन्दड़ा थाने में प्राथमिक सूचना रिपोर्ट संख्या 117/10 भारतीय दण्ड संहिता की धारा 143, 452, 323, 379 दर्ज कर ली, मगर पारिवारिक समझाईश से निर्मला के पिता ने मुकदमा वापस ले लिया।
इससे चन्दू के हौंसले और बुलन्द हो गए, उसकी क्रूरता बढ़ती ही गई, वह निर्मला को शारीरिक, मानसिक और यौनिक प्रताड़ना देता रहा, उसका शक बढ़ता ही रहा, वह छोटे-छोटे बच्चों पर भी शक करता कि उनके निर्मला से नाजायज संबंध है। वह निर्मला को निवृत होने तक के लिए बाहर नहीं जाने देता, घर, परिवार, पीहर, ससुराल किसी भी जगह पर किसी से बात नहीं करने देता, पहले तो वो निर्मला को मारता, इतना मारता कि वह बेहोश हो जाती, फिर उसे इलाज के लिए ले जाता, निर्मला को यह भी लगता है कि वह ईलाज के बहाने किसी बाबा के पास भी कभी-कभी ले जाता था जो कि तंत्र क्रिया किया करता था, कुल मिलाकर निर्मला का जीवन चन्दू ने नरक बना दिया, वह किससे अपना दुख सुनाती, किसे अपने जख्म दिखाती, गांव-समाज में जो भी उसके दुख के बारे में सुनता, उल्टे उसे ही दोष देता कि वह स्कूल से उसके साथ क्यों भागी? उसी की गलती है, सब तरफ ऐसा ही माहौल, मगर निर्मला के पिता हेमसिंह जो कि पूर्व फौजी है तथा वर्तमान में शिक्षक है, उन्होंने लोगों की परवाह किए बगैर अपनी बेटी के पक्ष में चट्टान की भांति खड़े होते रहे, वे चूंकि एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक है तथा इस जंग में बिल्कुल अकेले पड़ गए थे, ऊपर से जबरन बने कथित दामाद की गुण्डागर्दी और बेटी पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों से त्रस्त थे, उन्होंने सोचा कि कहीं से मदद ली जाए, क्योंकि जब भी वे चन्दू के विरुद्ध थाने तक पहुंचते, वह अपने संबंधों का इस्तेमाल करके येन-केन-प्रकारेण समझौता करवा लेता, निर्मला तो उससे इतनी डरी हुई थी कि उसे सामने पाते ही वह उसी की तरफ बोलने लगती थी। क्योंकि उसे पुलिस कार्यवाही पर यकीन ही नहीं आता था, उसे चन्दू के कारनामे और रसूखात बहुत बड़े लगने लगे थे, उसे महसूस हुआ कि शायद वो कभी भी इस दलदल से नहीं निकल पाएंगे, वो हतोश थी, घनघोर निराशा के माहौल में उसने एक बार आत्महत्या की भी कोशिश की, वह चन्दू के जुल्मों से इतनी पीड़ित हो चुकी थी कि उसने 17 जून 2013 की पूरी रात जंगल में जंगली जानवरों के बीच गुजारी, उसे जंगल के हिंसक जानवरों से ज्यादा खौफनाक अपना अपहर्ता कथित पति चन्दू लगता था, जिसने उसे पढ़ते हुए स्कूल से उठा लिया तथा बिना शादी दो बच्चे पैदा किए, कई बार गर्भपात के लिए मजबूर किया तथा यौन उत्पीड़न करता रहा।
17 जून की सुबह परिवारजन निर्मला को जंगल से ढूंढकर वापस अपने घर लाए, उसके पिता, मां और बहन भाई ने तय किया कि वे इस अन्याय के खिलाफ मुंह खोलेंगे, उन्होंने क्षेत्र में कार्यरत मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता शंकर सिंह को अपनी आत्मव्यथा सुनाई। सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह निर्मला की कहानी सुनकर अंदर तक हिल गए, उन्होंने निर्मला तथा उनके परिवार को सांत्वना दी तथा उन्हें बताया कि महिला हिंसा के विरुद्ध देवगढ़ में एक जनसुनवाई संगठन कर रहा है, आप उसमें आए और अपनी बात रखें।
24 जून 2013 को राजसमंद जिले के देवगढ़ ब्लॉक मुख्यालय पर स्थित ओसवाल भवन में मजदूर किसान शक्ति संगठन की ओर से महिला हिंसा के खिलाफ एक जनसुनवाई आयोजित की गई, जिसमें सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की कामरेड एनी राजा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक प्रदीप मोहन, उपखंड अधिकारी मनोज शर्मा, महिला मंच राजसमंद की समन्वयक शंकुतला पामेचा, समाजकार्य एवं अनुसंधान केन्द्र की सुशीला बाई, हरमाड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच नौरती बाई तथा पीयूसीएल अजमेर के डी.एल. त्रिपाठी बतौर ज्यूरी मौजूद थी, सुबह से शाम तक चली इस जन सुनवाई में तकरीबन 22 मामले पेश किए गए, जिसमें दहेज के लिए हत्या के दो गंभीर मामले भी थे, तो एक नाबालिग जो कि मिर्गी का मरीज है, उसके साथ नरेगा कार्यस्थल से नजदीक एक ऑटो ड्राईवर द्वारा बलात्कार, एक विवाहिता के घर में घुसकर बलात्कार करने तथा छेड़छाड़, जातिगत अपमान करते हुए बलात्कार की कोशिश से संबंधित प्रकरण सामने आए, एकल महिलाओं को सम्पत्ति से बेदखल करने के लिए उन्हें डायन घोषित करके प्रताड़ित करने तथा गांव से भगा देने संबंधी भी एक मामला सामने आया, ज्यादातर मामले पतियों द्वारा शराब पीकर पीटने के थे, जिनमें से दो युवतियों द्वारा हाल ही में की गई आत्महत्याएं भी शामिल है जिसमें से एक कुएं में कूद गई, जबकि दूसरे मामले में उसे पहले तो मार-मार कर अधमरा कर दिया गया और बाद में दवा-गोली देने के बहाने जहर पिला कर मार डाला गया। कई मामले एक पत्नी के मौजूद रहते दूसरी पत्नी से शादी कर लेने तथा पहली पत्नी को घर से निकाल देने से संबंधित थे, अगर देखा जाए तो 70 फीसदी मामले कहीं न कहीं शादी से जुड़े हुए थे, या यह शादी जन्य बीमारी की पीड़ाएं थी। एक समाज जो शादी को एक संस्कार के रूप में देखता है और रिश्तों की स्वर्ग में निर्मिति के दावे करता है, उसे ईमानदारी से देखना चाहिए कि उसकी शादी नामक संस्था लोगों को कितना नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर रहे है।
खैर, इसी जनसुनवाई में आई थी निर्मला, अपने मां-बाप के साथ, लेकिन मीडिया को वहां देखकर वह थोड़ा घबरा गई, उसे लगा कि अगर वह अपनी कहानी यहां सार्वजनिक मंच पर कहेगी तो जरूर कल उसकी बात और फोटो मीडिया के जरिए सबके सामने होगा, उसका कथित क्रूर पति चन्दू जैसे ही यह पढ़ेगा, वह उसे तथा उसके परिजनों को मार डालेगा, वह इसलिए भी अत्यधिक भयभीत थी कि उसके दोनों बच्चे भी चन्दू के पास थे, उसे लगा कि अगर उसने उसके खिलाफ मुंह खोला तो बच्चों की जान पर खतरा हो सकता है। स्थित बेहद विकट थी, निर्मला की आंखों में पीड़ा का एक पूरा समंदर था, लेकिन वह एक कतरा भी बता नहीं सकती थी। भय, परिजनों की सुरक्षा और बच्चों के प्रति एक मां का लगाव, इन सब बातों ने उसे मुखर होने से रोक दिया, उसने तय किया, वह नहीं बोलेगी, मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े साथियों ने उसे हौंसला दिया, उससे बात की, उसके परिजनों को समझाया कि कुछ भी हो उन्हें इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठानी ही पड़ेगी। उन्हें आश्वस्त किया गया कि मीडिया उनकी कहानी नहीं छापेगा, कोई भी इसे रिकॉर्ड नहीं करेगा और फोटोग्राफ्स भी नहीं लिया जाएगा, तब कहीं जाकर निर्मला ने अपनी बात कहने का साहस किया, वह माइक तक आई और उसने अपनी आपबीती सुनाई, मंच पर मौजूद ज्यूरी के सदस्यों से लेकर जनसुनवाई में उपस्थित सैंकड़ों महिला पुरुष उसकी दर्दनाक कहानी सुनकर स्तब्ध रह गए, चारों ओर नीरव सन्नाटा था, दुख, पीड़ा और आक्रोश था, सब कोई हैरान थे कि एक इंसान ऐसा हैवानियत भरा व्यवहार कैसे कर सकता है?
सबने एक स्वर में कहा कि यह पति नहीं राक्षस है, इस शैतान के खिलाफ हमें कड़ी कार्यवाही चाहिए, मंच पर ज्यूरी सदस्य के रूप में मौजूद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजसमंद प्रदीप मोहन ने वादा किया कि इस आदमी के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी और निर्मला को इस नरक से निकाला जाएगा, जन सुनवाई के संचालन कर रहे लोगों ने कहा कि अगर ये इंसान पागल है तो इसे पागलखाने भेजो क्योंकि उसकी हरकतें इंसानों सी नहीं है और यदि यह जानबूझकर ऐसा कर रहा है तो इसे तुरंत जेल भेजो, क्योंकि यह समाज में खुला घूमने लायक इंसान नहीं है।
उसी दिन चन्दू के खिलाफ निर्मला की तरफ से देवगढ़ थाने में मामला दर्ज करवाया गया। 26 जून को पाली जिले के सैन्दड़ा थाने में 498 (ए) तथा 323 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत 156/13 संख्यांक प्राथमिकी चन्दू के विरुद्ध दर्ज की गई जिसमें स्पष्ट रूप से निर्मला ने कहा कि अभियुक्त चन्दू उसे नाबालिग अवस्था में बहला-फुसला कर अपहरण कर ले गया, उसने उसकी मर्जी के बगैर शारीरिक संबंध बनाए तथा बिना शादी किए 2 बच्चे पैदा किए, फिर मुझे शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहा, अमानवीय यातनाएं देता रहा, मुझे उसकी क्रूरता और हिंसा से बचाया जाए।
जैसा कि हम सब जानते है पुलिस के काम करने की एक गति है, वह चन्दू को पकड़ पाती उससे पहले ही चन्दू की गुण्डागर्दी का कहर निर्मला के परिजनों पर बरपा हो गया। 15 जुलाई 2013 को प्रातः साढ़े नौ बजे निर्मला तथा उसकी बड़ी बहन तथा उसकी मां घर पर काम कर रही थी, हेमसिंह स्कूल पढ़ाने गए हुए थे, पीछे से एक काले रंग की स्कार्पियो में चन्दू तथा उसका भाई रविन्द्र, बहन पिस्ता, कब्बा तथा ज्योसिया एक राय होकर हथियारों से लैस होकर निर्मला के पिता के घर आ धमके, उन्होंने घर में जबरन प्रवेश किया तथा निर्मला की मां तथा बड़ी बहन को पीटते हुए एक कमरे में बंधक बना लिया। उन्होंने हाथ, पैरों से मारपीट की तथा चोटें पहुंचाई, चिल्लाने पर जान से मारने की धमकी दी, बाद में कमरे के बाहर कुण्डी लगा दी, फिर वे निर्मला का अपहरण करके ले गए, निर्मला चिल्लाई, उसने बचने की भरपूर कोशिश की लेकिन अंततः चन्दू उसे लेकर चला गया।
जब हेमसिंह स्कूल से लौटे तो उन्हें घटना का पता चला, उन्होंने तुरंत सैंदड़ा थाने पहुंचकर मुकदमा दर्ज करवाया तथा पुलिस से मदद की मांग की, हेमसिंह को अपनी बेटों की चिंता खाए जा रही थी, कि कहीं वह निर्मला को मार ही ना डाले, उन्होंने मजदूर किसान शक्ति संगठन तथा प्रशाासन व पुलिस सबसे मदद की गुहार की, संगठन की ओर से अरुणा रॉय, निखिल डे, शंकर सिंह तथा जननी श्रीधरन ने पूरी शक्ति लगाकर सैंदड़ा पुलिस थाने से लेकर राज्य के मुख्य सचिव तक निर्मला की जान की रक्षा की बात को रखा, अंततः तीन दिन पश्चात् पुलिस ने पुष्कर से चन्दू के कब्जे से निर्मला को छुड़वाया, उन्हें थाने लाया गया, निर्मला ने मजिस्टेªट के समक्ष अपने मां-बाप के घर जाने की इच्छा जताई, निर्मला वापस अपने गांव आ गई, वहीं चन्दू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जहां से वह एक सप्ताह बाद ही जेल से बाहर आ गया। इस बीच जिस दिन चन्दू जमानत पर रिहा हुआ निर्मला सामाजिक कार्यकर्ता जननी श्रीधरन के साथ पाली की पुलिस अधीक्षक के बी वंदना से मिली तथा उन्हें अपने साथ हुए अत्याचारों से अवगत कराया, एस.पी. वंदना स्वयं उसकी दुखभरी कहानी सुनकर द्रवित हो गई, उन्होंने निर्मला को पूरा न्याय दिलाने का आश्वासन दिया, उसके बयान फिर से लिए गए है, उसके घर पुलिस तैनात की गई सुरक्षा हेतु, लेकिन चन्दू जैसा बदमाश प्रकृति का व्यक्ति जेल से बाहर है और निर्मला आज भी न्याय और सुरक्षा के लिए भटक रही है, वो दो दिन सुकून से गुजारने के लिए मजदूर किसान शक्ति संगठन के दफ्तर देवडूंगरी आई, लेकिन यहां भी उसे चैन नहीं मिला, चन्दू यहां तक भी पहुंच गया, उसने फोन पर संगठन के साथियों के समक्ष अपना पक्ष रखने की कोशिश की और खुद को निर्दोष बताया पर सवाल यह है कि क्या वह निर्दोष है? क्या ऐसा पति होना चाहिए? क्या पति ऐसा ही होता है? अगर पति ऐसे होते है तो शादी जैसी संस्थाओं को ही समाप्त कर देना चाहिए। नहीं चाहिए ऐसे अमानवीय पति और अराजक शादी की व्यवस्था, जो सिर्फ औरतों को उत्पीड़ित ही करती है।

(लेखक खबरकोश डॉट कॉम के संपादक है।)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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