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मुमताज़: सफर फर्श से अर्श तक..

By   /  July 31, 2013  /  No Comments

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-संजोग वाल्टर||

मुमताज हिंदी फिल्में का वो नाम है जिसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं है मामूली रोल से शुरुआत और फिर अपनी मेंहनत और ईमानदारी की वजह से टाप पर पहुंचने की कोई दूसरी मिसाल नहीं है,मुमताज (31 जुलाई 1947, बॉम्बे) का नाम जेहन में आता है तो याद आती है वो फिल्में जिनमें उन्होंने छोटा सा का रोल किया था मुझे जीने दो (1963) में उनके हिस्से में यह सम्वाद था माँ भैया आये है, उनका गहरा दाग (1963) में राजेन्द्र कुमार की बहन का रोल, मेरे सनम (1965) में वैम्प का किरदार किया उन पर फिल्माया गया यह गाना ‘यह है रेशमी जुल्फों का अँधेरा’तो आज भी मशहूर है. मेरे सनम (1965) में वो खलनायिका थी यही से वो लोगों का धयान अपनी तरफ करने में कामयाब रही मुमताज ने जम कर दोस्ती भी निभाई,फिरोज खान जब 1970 में अपराध से निर्माता बने तो मुमताज ने हीरो प्रधान फिल्म में काम किया और फिरोज खान के कहने पर बिकनी भी पहनी, अपनी बेटी नताशा की शादी फिरोज खान के बेटे फरदीन खान से कर अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया, जीतेन्द्र की फिल्म हमजोली में एक आइटम सॉंग किया टिक टिक मेरा दिल बोले. देव साहब के कहने पर फिल्म हरे रामा हरे कृष्ण में काम करना पसंद किया इस फिल्म में मुमताज सिर्फ नाम की हेरोइन थी,पूरी फिल्म जीनत अमान के इर्द गिर्द थी, खिलौना (1970), तेरे मेरे सपने (1971), मुमताज की वो चुनिन्दा फिल्मं जिनमें उन्होने जान डाल थी खिलौना के लिए फिल्म फेयर अवार्ड सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का मिला.Mumtaz1

मुमताज के वालिद- नाम था अब्दुल सलीम अस्करी- बंबई (अब मुंबई) में फल विक्रेता थे,मुमताज़ के घराने का ताल्लुक ईरान से था, माता- पिता उनके पहली सालगिरह पर अलग हो गये और उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली,. महज़ 16 साल की उम्र में मुमताज़ के सर से उनकी माँ का साया भी झिन गया मुमताज़ की बड़ी बहन मल्लिका ने भी कुछ फिल्मों में काम किया था,बाद में मल्लिका ने दारा सिंह के भाई रंधावा से शादी कर ली. अभिनेता रुपेश कुमार मुमताज़ के चचेरे भाई थे..मुझे जीने दो(1963) में दिखी एक छोटे से किरदार,इस दौर में उनकी जोड़ी बनी दारा सिंह के साथ इस जोड़ी की 16 फिल्में आई थी बौक्सर, सेमसन, टार्जन, किंग कोंग, फौलाद ,वीर भीमसेन , हर्क्यूलिस टार्जन दिल्ली में, सिकन्दरे आज़म, रूस्तम-ए-हिन्द , राका, डाकू मंगल सिंह इत्यादि.

तब दारा सिंह को मिलते थे 4.5 लाख रुपये एक फिल्म के तो मुमताज को 2.5 लाख रूपये, मुमताज बी ग्रेड की फिल्मों में हेरोइन बन कर आ रही थी तो ऐ ग्रेड की फिल्मों में छोटे छोटे रोल कर रही थी. पत्थर के सनम इसकी मिसाल है, राम और श्याम (1967) में उन्होंने दिलीप कुमार के साथ काम किया जो 1967 की टॉप हिट फिल्म थी शर्मीला टैगोर के साथ सावन की घटा (1966),यह रात फिर न आएगी (1966) मेरे हमदम मेरे दोस्त (1968) राजेश खन्ना के साथ दो रास्ते (1969) और बंधन के बाद इस जोड़ी ने आठ फिल्में की. सच्चा झूठा (1970) में शशि कपूर ने उनके साथ काम करने से मना कर दिया था,(हीरो राजेश खन्ना) 1974 की सुपर हिट फिल्म चोर मचाये शोर शशि कपूर की यह कम बैक फिल्म थी. मुमताज ने यह जानते हुए भी इस फिल्म के हीरो शशि है काम करने से मना नहीं किया.

मुमताज ने करीब 108 फिल्मों में काम किया था, धर्मेन्द्र, संजीव कुमार,जितेंद्र सुनील दत्त, फिरोज खान, विश्वजीत, देव आन्नद, अमिताभ बच्चन के साथ भी काम किया 1965-1969 के बीच उनकी और राजेश खन्ना की जोड़ी ने कई हिट फिल्में दी. राजेश खन्ना के साथ उनकी कमाल की जुगल बंदी थी. 1974 में जब मुमताज अपने करियर की उंचाई पर थी तब उघोग पति मयूर माधवानी से शादी का फैसला कर लिया तब कई फिल्मों में बाकी था काम, आप की कसम , रोटी और प्रेम कहानी का इन तीनों फिल्मों में उनके हीरो थे राजेश खन्ना. इसके अलावा उन्होंने लफंगे (रंधीर कपूर) और नागिन का काम पूरा करने के बाद फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया और लन्दन जा बसी. 1989 में वो फिल्म आंधिया में आई यह फिल्म भारत में फ्लॉप रही पर पकिस्तान में इस फिल्म ने सिल्वर जुबली की थी. मुमताज़ की हिंदी फिल्मों में वापसी की कोशिश नाकामयाब रही .

हिंदी सिनेमा में मुमताज़ के योगदान के लिए साल 1996 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट जून 2008 में  अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी द्वारा  भारतीय सिनेमा में उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया. मुमताज की दो बेटियां है,मुमताज का नाम राजेश खन्ना के साथ भी जुड़ा,पर उनके और शम्मी कपूर के बीच रोमांस की खूब चर्चा है,बताया जाता है इस रिश्ते से पापा कपूर नहीं खुश थे वो नहीं चाहते थे उनके खानदान में एक और बहू फिल्मी दुनिया से हो (गीता बाली) शम्मी ने बाद में भाव नगर की नीला देवी से शादी कर ली थी फिल्म ब्रह्मचारी के दौरान मुमताज शम्मी का रोमांस जोरो पर था फिल्म का एक गीत इस रिश्त्ते पर मोहर भी लगाता है आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर..मुमताज स्टायलिश हेरोइन थी,उनकी मुमताज साड़ी बहुत मशहूर उस जमाने में खूब बिक्री होती थी मुमताज साड़ी की बेतरीन अदाकारा के साथ वो लाजवाब डांसर भी थी,उस दौर में जब हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना का नाम बिक रहा था और राजेश खन्ना का मेहनताना सबसे ज्यादा हुआ करता था तब मुमताज़ हिरोइन के रूप सबसे जयादा मेहनताना पा रही थी 1961स्त्री 1962 वल्लाह क्या बात है 1963 सेहरा रुस्तम सोहराब मुझे जीने दो गहरा दाग फौलाद 1964 वीर भीमसेन कव्वाली की रात हरक्यूलिस बागी आँधी और तूफान 1965 टार्जन किंग कांग हातिमताई का बेटा सिकंदर ए आजम 1965 रुस्तम ए हिंद राका मेरे सनम खानदान काजल जादुई अँगूठी हम दीवाने दिल अलबेली करो बहू बेटी 1966 ये रात फिर ना आएगी सावन की घटा साज मैं और आवाज रुस्तम कौन प्यार किये जा पति पत्नी लड़का लड़की जवान मर्द डाकू मंगल सिंह दादी मां सूरज 1967 वो कोई और होगा राम और श्याम पत्थर के सनम हमराज दो दुश्मन सी आर्द डी 909 चंदन का पलना बूंद जो बान गई मोती बगदाद की रातें आग 1968 मेरे हमदम मेरे दोस्त जंग और अमन जहां मिले धरती आकाश गोल्डन आंइजं सीक्रेट एजेंट 007 गौरी ब्रह्मचारी अपना घर अपनी कहानी शर्त मेरा यार मेरा दुश्मन मेरा दोस्त जिगरी दोस्त दो रास्ते बंधन अपना खून अपना दुश्मन आदमी और इनसान सच्चा झूठा परदेसी मैना खिलौना हमजोली हिम्मत एक नन्ही मुन्नी लड़की थी भाई भाईमाँ और ममता 1971 मेला लड़की पसंद है कठपुतली एक नारी एक ब्रह्मचारी दुश्मन चाहत उपासना तेरे मेरे सपने हरे रामा हरे कृष्णा तांगेवाला शरारत प्यार दीवाना गोमती के किनारे धड़कन अपराध अपना देश रूप तेरा मस्ताना 1973 प्यार का रिश्ता बंधे हाथ लोफर झील के उस पार चोर मचाए शोर आप की कसम 1974 रोटी 1975 प्रेम कहानी लफंगे आग और तूफान 1976 नागिन 1977 आईना 1989 आँधियाँ 2010 1 एक मिनट डाक्यूमेन्टरी .’

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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