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टुकडे -टुकडे दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली. जितना-जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

By   /  July 31, 2013  /  No Comments

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-संजोग वाल्टर||

फिल्म साहिब बीबी और गुलाम में छोटी बहु (मीना कुमारी) (1अगस्त,1932-31 मार्च,1972) अकेलेपन से तंग आकर शराब का सहारा लेती है. ऐसा ही हुआ असलियत में उनकी ज़िन्दगी में जब उन्हें सहारे की ज़रूरत थी तब उनको सहारा नहीं मिला, मीना कुमारी बेमिसाल अदाकारा थीं,जिन्हें “ट्रेजेडी क्वीन” का खिताब मिला था, मीना कुमारी का असली नाम महज़बी बानो था और वे बंबई में पैदा हुई थीं. कहते है कि जिस रात मीना कुमारी ने जब कमाल अमरोही का घर छोड़ा था. उस रात किसी ने भी उनकी मदद नहीं की. भारत भूषण, प्रदीप कुमार, राज कुमार किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया.Meena-Kumari2

मीना कुमारी के वालिद अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के मझे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था. उनकी वालिदा प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था.

पैदा होते ही वालिद अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ दिया था, मीना कुमारी की माँ के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आये. मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं. विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया. दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं. नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं. प्रभावती की मुलाकात थियेटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई. उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया. अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं. खुर्शीद, महज़बी (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी).

अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे. घर की, परिवार हो या शादीशुदा जिंदगी मीना कुमारी के हिस्से में सिर्फ तन्हाईयाँ हीं आई. फिल्म फूल और पत्थर (1966) के हीरो ही-मैन धर्मेन्द्र से मीना की नजदीकियाँ बढ़ने लगीं. इस दौर तक मीना कामयाब, मशहूर व बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट हीरोइन के रूप में जानी जाने लगी थी. धर्मेन्द्र का करियर डाँवाडोल चल रहा था. उन्हें मीना का मजबूत पल्लू थामने में अपनी सफलता महसूस होने लगी. गरम धरम ने मीना की सूनी-सपाट अंधेरी जिंदगी को एक ही-मैन की रोशनी से भर दिया. कई तरह के गॉसिप और गरमा-गरम खबरों से फिल्मी पत्रिकाओं के पन्ने रंगे जाने लगे.

meena-kumari1इसका असर मीना-कमाल के रिश्ते पर भी हुआ. मीना कुमारी का नाम कई लोगों से जोड़ा गया. बॉलीवुड के जानकारों के अनुसार मीना-धर्मेन्द्र के रोमांस की खबरें हवा में बम्बई से दिल्ली तक के आकाश में उड़ने लगी थीं. जब दिल्ली में वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन से एक कार्यक्रम में मिलीं तो राष्ट्रपति ने पहला सवाल पूछ लिया कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड धर्मेन्द्र कैसा है? फिल्म बैजू बावरा के दौरान भारत भूषण भी अपने प्यार का इजहार मीना कुमारी से कर चुके थे. जॉनी (राजकुमार) को मीना कुमार से इतना इश्क हो गया कि वे मीना के साथ सैट पर काम करते अपने डायलोग भूल जाते थे. इसी तरह फिल्मकार मेहबूब खान ने महाराष्ट्र के गर्वनर से कमाल अमरोही का परिचय यह कहकर दिया कि ये प्रसिद्ध स्टार मीना कुमारी के पति हैं. कमाल अमरोही यह सुन नीचे से ऊपर तक आग बबूला हो गए थे.

धर्मेन्द्र और मीना के चर्चे भी उन तक पहुँच गए थे. उन्होंने पहला बदला धर्मेन्द्र से यह लिया कि उन्हें पाकीजा से आउट कर दिया. उनकी जगह राजकुमार की एंट्री हो गई. कहा तो यहाँ तक जाता है कि अपनी फिल्म रजिया सुल्तान में उन्होंने धर्मेन्द्र को रजिया के हब्शी गुलाम प्रेमी का रोल देकर मुँह काला कर दिया था. पाकीजा फिल्म निर्माण में सत्रह साल का समय लगा. इस देरी की वजह मीना-कमाल का अलगाव रहा. लेकिन मीना जानती थी कि फिल्म पाकीजा कमाल साहब का कीमती सपना है. उन्होंने फिल्म बीमारी की हालत में की. मगर तब तक उनकी लाइफ स्टाइल बदल चुकी थी. गुरुदत्त की फिल्म साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू परदे से उतरकर मीना की असली जिंदगी में समा गई थी. मीना कुमारी पहली हेरोइन थी, जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों के बीच बैठकर शराब के प्याले पर प्याले खाली किए.

महज़बी ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था. उनका नाम मीना कुमारी, विजय भट्ट की फिल्म बैजू बावरा से पड़ा. मीना कुमारी की

प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे. मीना कुमारी के आने के साथ भारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं. मीना कुमारी के वालिद अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के मझे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था. उनकी वालिदा प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो),भी मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था. महज़बी ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था. उनका नाम मीना कुमारी,विजय भट्ट की फिल्म बैजू बावरा से पड़ा.

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मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थी. मीना कुमारी के आने के साथ भारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं. धर्मेन्द्र की बेवफाई ने मीना को अकेले में भी पीने पर मजबूर किया. वे छोटी-छोटी बोतलों में शराब भरकर पर्स में रखने लगीं. जब मौका मिला एक शीशी गटक ली. कहते है की धर्मेन्द्र ने भी मीना कुमारी का इस्तेमाल किया. उन दिनों मीना कुमारी की तूती बोलती थी और धर्मेन्द्र नए कलाकार. मीना कुमारी ने धर्मेन्द्र की हर तरह से मदद की. फूल और पत्थर की कामयाबी के धर्मेन्द्र उनसे धीरे धीरे अलग होने लगे थे,1964 में धर्मेन्द्र की वज़ह से ही कमाल अमरोही ने मीना को तलाक दे दिया एक बार फिर से धोका मिला मीना कुमारी को, पति का भी साथ छुड गया और प्रेमी भी साथ छोड़ गया है धर्मेन्द्र को कभी उनसे सच्चा प्यार नहीं किया धर्मेन्द्र के लिए मीना तो बस एक जरिया भर थी यह बेबफाई मीना सह ना सकी. शराब की आदि हो चुकी मीना को लीवर सिरोसिस नामक बीमारी हो गई थी.

दादा मुनि अशोक कुमार, मीना कुमारी के साथ अनेक फिल्में कर चुके थे. एक कलाकार का इस तरह से सरे आम मौत को गले लगाना उन्हें रास नहीं आया. वे होमियोपैथी की छोटी गोलियाँ लेकर इलाज के लिए आगे आए. लेकिन जब मीना का यह जवाब सुना ‘दवा खाकर भी मैं जीऊँगी नहीं, यह जानती हूँ मैं. इसलिए कुछ तम्बाकू खा लेने दो. शराब के कुछ घूँट गले के नीचे उतर जाने दो’ तो वे भीतर तक काँप गए. 1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें: दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिये नया युग शुरु हुआ. परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था. चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी. लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाली अभिनेत्री तक सीमित हो गयी. लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा.

मीना कुमारी की शादी कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने कई फिल्मों का निर्देशन किया था. मीना 1964 में कमाल अमरोही से अलग हो गयीं. उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है. शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की. उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी. मीना कुमारी उम्र भर एक पहेली बनी रही महज चालीस साल की उम्र में वो मौत के मुह में चली गयी. इसके लिए मीना के इर्दगिर्द कुछ रिश्तेदार, कुछ चाहने वाले और कुछ उनकी दौलत पर नजर गढ़ाए वे लोग हैं, जिन्हें ट्रेजेडी क्वीन की अकाल मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

meena-kumari-111मीना कुमारी को एक अभिनेत्री के रूप में, एक पत्नी के रूप में, एक प्यासी प्रेमिका के रूप में और एक भटकती-गुमराह होती हर कदम पर धोखा खाती स्त्री के रूप में देखना उनकी जिंदगी का सही पैमाना होगा.

महजबीं को मात्र चार साल की उम्र में फिल्मकार विजय भट्ट के सामने खड़ा कर दिया गया. इस तरह बीस फिल्में महजबीं (मीना) ने बाल कलाकार के रूप में न चाहते हुए भी की. महज़बीं को अपने पिता से नफरत सी हो गई और पुरुष का स्वार्थी चेहरा उसके जेहन में दर्ज हो गया. फिल्म बैजू बावरा (1952) से मीना कुमारी के नाम से मशहूर महजबीं ने अपने वालिद की इमेज को दरकिनार करते हुए उनसे हमदर्दी जताने वाले कमाल अमरोही की शख्सियत में अपना बेहतर आने वाला कल दिखाई दिया, वे उनके नजदीक होती चली गईं. नतीजा यह रहा कि दोनों ने निकाह कर लिया. लेकिन यहाँ उसे कमाल साहब की दूसरी बीवी का दर्जा मिला. उनके निकाह के इकलौते गवाह थे जीनत अमान के अब्बा अमान साहब. कमाल अमरोही और मीना कुमारी की शादीशुदा जिंदगी करीब दस साल तक एक सपने की तरह चली. मगर औलाद न होने की वजह से उनके ताल्लुकात में दरार आने लगी. लिहाज़ा दोनों अलग हो गये.

आखिर 1956 में मुहूर्त से शुरू हुई पाकीजा 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई और 31 मार्च,1972 को मीना चल बसी. शुरूआत में पाकीज़ा को ख़ास कामयाबी नहीं मिली थी पर मीना कुमारी की मौत ने फिल्म को हिट कर दिया. तमाम बंधनों को पीछे छोड़  तन्हां चल दी बादलों के पार अपने सच्चे प्रेमी की तलाश में. पाकीजा सुपरहिट रही. अमर हो गईं ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी. मगर अस्पताल का अंतिम बिल चुकाने लायक भी पैसे नहीं थे उस  तन्हां मीना कुमारी के पास. अस्पताल का बिल अदा किया वहाँ के एक डॉक्टर ने, जो मीना का जबरदस्त प्रशंसक था. मीना कुमारी ने ‘हिन्दी सिनेमा’ में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी मिसाल बना हुआ है.

वो लाज़वाब अदाकारा के साथ शायरा भी थी, अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद ‘अल्लाह ताला’ की वदीयत थी जैसे.

तभी तो कहा उन्होंने -कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ

कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको

चाँद तन्हा है, आस्मां तन्हा

दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा

थरथराता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं

जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं

दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे

सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक

छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा.

 

टुकडे -टुकडे दिन बीता, धज्जी -धज्जी रात मिली

जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

 

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी

जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

 

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे

जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली

 

गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

 

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना

बुनती है रेशम के धागे

लम्हा -लम्हा खोल रही है

पत्ता -पत्ता बीन रही है

एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन

एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है

अपने ही तागों की कैदी

रेशम की यह शायरा एक दिन

अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी

 

“बैजू बावरा”,”परिणीता”,”एक ही रास्ता”, शारदा”.”मिस मेरी”,”चार दिल चार राहें”,”दिल अपना और प्रीत पराई”,”आरती”,”भाभी की चूडियाँ”,”मैं चुप रहूंगी”,”साहब बीबी और गुलाम”,”दिल एक मंदिर”,”चित्रलेखा”,”काजल”,”फूल और पत्थर”,”मँझली दीदी”,’मेरे अपने”,पाकीजा के किरदारों में उन्होंने जान डाल थी, जिस वक्त मीना कुमारी की उम्र हिरोइन पेड़ के चक्कर लगाकर प्रेम गीत गा रही थी तब मीना कुमारी ने “मेरे अपने” “गोमती के किनारे” में अपने बालों में सफ़ेदी लगाकर बुज़ुर्ग किरदार किये थे, “दुश्मन” में वो भाभी के किरदार में थी, “जवाब” में जीतेन्द्र की बड़ी बहन का किरदार बखूबी निभाया उस दौर की सभी हीरोइनों ने यह रोल करने से मना कर दिया था, अपनी इमेज खराब होने का वास्ता देकर.

 

मीना कुमारी की फ़िल्में:

1971   पाकीज़ा,दुश्मन,मेरे अपने

1970   जवाब,विद्या

1967   मझली दीदी,नूरजहाँ,चन्दन का पालना,बहू बेगम

1966   फूल और पत्थर

1965   काजल,भीगी रात

1964   गज़ल,बेनज़ीर,चित्रलेखा

1963   दिल एक मन्दिर,अकेली मत जाइयो,किनारे किनारे

1962   साहिब बीबी और ग़ुलाम,मैं चुप रहूँगी,आरती

1961   प्यार का सागर,भाभी की चूड़ियाँ

1960   कोहिनूर,दिल अपना और प्रीत पराई

1959   अर्द्धांगिनी, चार दिल चार राहें

1958   सहारा, फ़रिश्ता, यहूदी, सवेरा

1957   मिस मैरी,शारदा

1956   मेम साहिब,एक ही रास्ता,शतरंज

1955   आज़ाद,बंदिश

1954   बादबाँ

1953   परिनीता

1952   बैजू बावरा,तमाशा,

1951   सनम

1946   दुनिया एक सराय

मीना कुमारी को मिले फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार

1966 – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार – काजल

1963 – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार – साहिब बीबी और ग़ुलाम

1955 – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार – परिनीता

1954 – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार – बैजू बावरा

राजकपूर और नर्गिस के अलगाव की एक वजह मीना कुमारी को भी माना जाता है. कहते हैं कि नर्गिस राजकपूर से मिलने जब उनके कॉटेज गयी थी तो उन्होंने वहां राजकपूर के साथ मीना कुमारी को मौजूद पाया था इसके बाद फिर कभी नहीं मिली नर्गिस राजकपूर से. राज कपूर और मीना कुमारी एक साथ पहली और आखिरी बार फिल्म शारदा (1957) में आये मीना कुमारी ने इस फिल्म में उनकी प्रेमिका और सौतेली माँ का किरदार निभाया था. इस फिल्म के बाद राज कपूर ने मीना कुमारी के साथ फिर फ़िल्में साइन नहीं की, वज़ह थी स्क्रीन पर निभाया उनका किरदार!

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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