/गल-गल कर मरने के लिए छोड़ दिया रंगा को!

गल-गल कर मरने के लिए छोड़ दिया रंगा को!

०० पैर में लगी है रॉड, लेकिन अस्पताल प्रबंधक ने बारिश के मौसम में कर दिया बाहर

०० गरीब होने की सजा मिल रही रंगा को!

-प्रतीक चौहान||
रायपुर। देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान… 1954 में नास्तिक फिल्म का ये गाना छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल के मेल में सही साबित हो रहा है. अस्पताल के बाहर पिछले तीन दिनों से रंगा नाम का एक मरीज गेट पर पड़ा हुआ है. अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर दिया है. लेकिन उसकी हालात बहुत ही खराब है. उसके दाए पैर में स्टील की दो रॉड लगी हुई हैं. इसके साथ ही उसका पैर पूरी तरह गल गया है. जिसपर मक्खियां भिनभिनाती रहती है. रंगा की हालत इतनी खराब है कि वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है.IMG_0268

उसे सिर्फ अपना नाम ही पता है. बाकी कुछ और पूछने पर वो सिर ही ही हिलाता है. रंगा कहां का रहना वाला है? उसके परिवार वाले कौन है? उसे ये कुछ भी नहीं पता. आंबेडकर के मेन गेट के बाहर रंगा पिछले तीन दिनों से पड़ा हुआ है. एक पतली सी चादर ओढ़े रंगा का इस दुनिया में शायद कोई भी नहीं. रंगा की गरीबी ने उसका यह हश्र किया है. न तो उसके पास इलाज करना के लिए पैसे है. न ही कुछ खाने के लिए.

सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों का मन इतना भी नहीं पसीजा कि सरकारी पैसों से उसके पैरों का इलाज किया जाए. न ही किसी डॉक्टर का मानवता के नाते उसका ख्याल रखा. रंगा तीन दिनों से आंबेडकर अस्पताल के गेट पर तड़प रहा है. इसके साथ ही इसके पैरों का इंफेक्शन भी फैल रहा है. जिस पर मक्खियां भिनभिनाती रहती है. पैरों में लगे रॉड की वजह से रंगा उस दर्द से सिहर उठता है. लेकिन उससे भी ज्यादा र्शम की बात ये है कि उसे अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा उसका इलाज  करने के बाजए उसे डिस्चार्ज कर अस्पताल से बाहर कर दिया गया.

खुली ढ़ोल की पोल
वैसे तो प्रदेश की रमन सरकार गरीब लोगों का मुफ्त में इलाज करनाने का ढोल बजाती है. लेकिन रंगा की हालत देख कर तो ऐसा लगता है कि सरकार के सारे ढ़ोल की पोल खुल गई है. ये हाल तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का है. न कि बस्तर का लेकिन यदि राजधानी का ये हाल है तो बस्तर के हालात तो भगवान भरोसे हीं होंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.