/मेरे संपादक और संतापक: केसरिया रंग में रंगे श्याम बाबू

मेरे संपादक और संतापक: केसरिया रंग में रंगे श्याम बाबू

वरिष्ठ पत्रकार, बांसुरी वादक और लोक कलाकार तथा सोशल एक्टिविस्ट होने के साथ बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी राजीव नयन बहुगुणा किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. राजीव बहुगुणा ने अपनी फेसबुक वाल पर अपने लम्बे पत्रकार जीवन पर नज़र डालते हुए अपने अनुभवों को श्रृंखलाबद्ध करना शुरू किया है. इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी आते ही हम इसे मीडिया दरबार के पाठकों के समक्ष रखने का लोभ संवरण नहीं कर पाए तथा उनकी अनुमति से आपके लिए भी यह श्रृंखला ले आये..

मैंने वर्षों तक एक पत्रकार के रूप में नव भारत टाइम्स नामक अखबार में नौकरी की. भांति – भांति के लोग मिले. अपने युवा साथियों के हित में मै आज से यह श्रृंखला शुरू कर रहा हूँ – राजीव नयन बहुगुणा

आलोक मेहता से भयंकर और सार्वजनिक झगडा होने एक बाद मेरा पटना में रहना असंभव सा हो गया. वह मुझे वहां से खदेड़ने की जुगत में लग गए. मुझे नौकरी से निकाल बाहर करना मुश्किल ही नहिं, नामुमकिन भी था, क्योंकि प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर का मुझ पर वरद हस्त था.

rajiv nayan bahuguna

उधर आलोक मेहता भी राजेद्र माथुर साहब के निकटस्थ थे. आखिर तय हुआ कि मेरा तबादला अखबार के जयपुर संस्करण में कर दिया जाए.

कुछ दिखावटी ना नुकुर के बाद मैं १९८९ की वसंत ऋतू में जयपुर पंहुचा. ट्रक पर सामान ढूलान के फर्जी बिल बना कर दफ्तर से दस हज़ार रुपये वसूले. लाइफ मस्त हो गयी. जयपुर में मै पी एच डी करने के बहाने दो साल पहले ही गुज़ार चुका था. चिर परिचित शहर था, लेकिन नए सम्पाद्क श्याम सुंदर आचार्य एकदम अपरिचित. वह कोई लेखक पत्रकार भी नहीं थे कि उनका नाम पहले से सुन पाता.

घोर संघी थे. उनकी केबिन में गया. दोहरा शरीर. मृदु भाषी, मददगार, जैसा कि संघी प्रायः होते ही हैं. मै तब तक नव भारत टाइम्स के एडिट पेज पर छपने लगा था, सो मैंने रोब गांठना चाहा. उन्होंने तुरंत ही चालाकी से समर्पण कर दिया, यह कहते हुए कि मै तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूँ. तुमने अब तक जो कुछ भी लिखा है वह सब पढ़ चुका हूँ. यद्यपि उनसे पांच मिनट की बात चीत के बाद मै समझ गया कि वह मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते, और मेरे लेख तो क्या, वह कुछ भी नहीं पढते. यह बात मेरी समझ में आ गयी. उन जैसा सज्जन, सीधा, झूठा, दिल का साफ़ और कलाकार संघी पत्रकार मुझे और कोई नहीं मिला. उन्होंने मुझसे रहने की दिक्कत के बारे में पूछा, अगले दिन अपने घर पर लंच के लिए आहूत किया, और मै धन्यवाद देता हुआ बाहर निकल आया.

( जारी रहेगा)                                  अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.