/मेरे संपादक और संतापक: आजन्म भद्र, आमरण भद्र, माथुर बाबा

मेरे संपादक और संतापक: आजन्म भद्र, आमरण भद्र, माथुर बाबा

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-राजीव नयन बहुगुणा||

श्याम सुंदर आचार्य के प्रकोष्ठ से निकल कर मैंने दफ्तर के नीचे थडी पर चाय पी  और फिर राजस्थान विश्व विद्यालय की ओर चल पड़ा, जहाँ से मेरी कई विगतस्मृतियाँ जुडी थीं, और जहाँ से मुझे हॉस्टल की मेस का बिल समय पर न देने के कारण फिर से दिल्ली का रुख करना पड़ा था. यहाँ( दिल्ली में ) नव भारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर मेरे पिता के पुराने मित्र और परिचित थे. इस बार मैंने उन्हें कहा कि मै रिसर्च का काम छोड कर दिल्ली ही चला आया हूँ, और अब पूरी तरह से उनके सुपुर्द हूँ.

स्व. राजेंद्र माथुर
स्व. राजेंद्र माथुर

तेजस्वी, भद्र, आत्म विश्वासी और उत्साही तथा भावुक राजेन्द्र माथुर स्वयं को एक आधुनिक व्यक्ति समझते थे, शायद हों भी. लेकिन परम्पराओं का आदर्शवाद उनमे हठात छलक -छलक जाता था. वह बोले – मेरे लिए इतना ही यथेष्ठ है कि तुम सुंदर लाल बहुगुणा के आत्मज हो, लेकिन यदि तुम पत्रकारिता के योग्य साबित न हुए तो मै तुम्हे कहीं हिन्दी का प्राध्यापक बना दूँगा. वैसे वह मुझे तथा हर छोटे बड़े को आप कह कर ही संबोधित करते थे. मैंने हामी भरी. उन्होंने मुझे न्यूज़ एडिटर हरीश अग्रवाल के सुपुर्द किया, और हरीश अग्रवाल ने यू. पी डेस्क के इंचार्ज अरुण दीक्षित के.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

यहाँ बैठ कर मै कापी एडिटिंग, हेडिंग लगाना, इंट्रो बनाना तथा कापी पुनर्लेखन काम सीखने लगा. सब कुछ तो ठीक था, पर जब कभी अंग्रेजी का तार मुझे आनुवाद को दिया जाता तो मेरे फ़रिश्ते कूच कर जाते. पहाड़ के टाट पट्टी वाले स्कूलों में हमने अंग्रेजी उन गुरुओं से सीखी थी, जो अंग्रेज़ी भी गढवाली भाषा में पढ़ाते थे. उकता कर मै बार – बार माथुर साहब के पास अपनी विनय पत्रिका लेकर जाता, तो उनका दो टूक जवाब यही होता कि किसी नए संस्करण के लिए जब परीक्षा होगी, तो मुझे वह क्वाली फाई करनी होगी. नियुक्ति का इसके सिवा कोई भी उपक्रम नही है.

मै उनसे हर मुलाक़ात के बाद घोर निराशा से भर उठता, क्योकि नव भारत टाइम्स की पत्रकार परीक्षा में उस समय अंग्रेज़ी का एक कठोर पर्चा होता था, और मुझे अंग्रेज़ी उतनी ही आती थी, जितनी सोनिया गांधी को हिन्दी आती है. लेकिन मुझे क्या पता था कि नव भारत टाइम्स में सीनियर पदों पर काम कर रहे हमारे उत्तराखंडी वरिष्ठ मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नक़ल करवा कर पास करवा देंगे.

(ज़ारी)                                                                अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.