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एक अनिकेत सेठ के आश्रय में

By   /  August 4, 2013  /  No Comments

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मेरे संपादक, मेरे संतापक-3                                                                           पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

एक शाम को मुझे कुछ ज्यादा ही अन्य मनस्क देख माथुर बाबा मुझे साथ ले गए. मुझे बगल में ही काका कालेलकर के आश्रम “सन्निधि” जाकर राधा कृष्ण बजाज उर्फ भाया जी के लिए गाय का दूध ले जाना था. उन्होंने कहा – मुझे भी वहीँ जाना है. क्यों जाना है, यह भला मै कैसे पूछता. रस्ते में कार रोक कर उन्होंने चना मूंगफली का एक चटपटा पत्ता बना कर खुद भी खाया और मुझे भी खिलाया. वह एम्बेसेडर जैसी भारी भरकम कार खुद चलाते थे. अम्बेसडर कार खुद हांकने वाले मैंने दो ही बड़े आदमी देखे, एक माथुर बाबा और एक प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह. खैर उन्होंने मुझे इशारों ही इशारों में आश्वस्त किया कि भयातुर होने की कोई ज़रूरत नहीं है. कुछ ही समय बाद तुम्हे नव भारत टाइम्स का उप संपादक बना दिया जाएगा. लेकिन मेरी चौपट अंग्रेज़ी का क्या होगा ? मैंने भाव कातर होकर पूछा. वह भी देख ली जायेगी, उनके इस अभय दान से मै कृतार्थ हो गया.यः बहुत बाद में पता चला, कई साल बाद, कि उनकी पत्नी श्रीमती मोहिनी माथुर काका कालेलकर के आश्रम में चुपचाप सफाई कर्मियों के बच्चों को निशुल्क पढाती थीं.Rajiv-nayan-bahuguna

रहने का सतूना तो मेरा ठीक ही हो गया था. अब जॉब का भी पक्का आश्वासन मिल गया. सेठ जमना लाल बजाज के भतीजे राधा कृष्ण बजाज एक दिन मेरा फजीता देख मुझे अपने साथ ले गए. इस वृद्ध, त्यागी – तपस्वी मारवाड़ी भूत पूर्व सेठ को सभी लोग श्रद्धा से भाया जी कहते थे. वह युवावस्था में ही पूरी तरह गांधी के रंग में रंग कर अनिकेत हो गए थे. गांधी ने उन्हें गो रक्षा का काम सौंपा था, जिसे अभी तक निभा रहे थे. उनका आपने पुश्तैनी व्यापार से कुछ लेना – देना नहीं था, फिर भी पारिवारिक कंपनियों से उनका नियत शेयर खुद – ब- खुद उनके एकाउंट में जमा हो जाता था. वह उस पैसे को खर्च नहीं करते, पर हिसाब के मामले में चौकस रहते थे. अपने बैंक एकाउंट चेक करते रहते थे. इससे मुझे सीख मिली कि बनिया चाहे संन्यासी भी हो जाए, वह अपना वणिक धर्म नहीं छोड़ता. गांधी और विनोबा दोनों बजाज परिवार की जागीर पर वर्धा जिले में रहते थे. इधर उस भूमि का स्वामी, और भारत के गिने चुने प्रतिष्ठित धन कुबेरों में से एक दिल्ली में किसी के पुराने मकान में अकिंचन होकर रहता था. विचार चाहे जैसा भी हो, वह सच मुच व्यक्ति को अमूल बदल देता है. अस्सी साल से ऊपर हो चुके राधा कृष्ण बजाज का जीवन सादगी की मिसाल था. उनकी पत्नी अनुसुईया देवी बजाज अंगीठी पर उनके लिए खाना बनाती. वह कस्तूरबा की प्रतिमूर्ति लगती थीं. हर गुरुवार को भाया जी के नेतृत्व में गो रक्षा के लिए गिरफ्तारियां दी जातीं. वह एक कर्म कांड, बल्कि नाटक ही था. क्योंकि सत्याग्रहियों को कुछ ही देर बाद छोड दिया जाता, थाने  में चाय पीला कर. दिल्ली के आस पास के गांवों के लोग गिरफ्तारी देने आते और फिर शाम को दिल्ली घूम कर या सौदा सुल्फा कर वापस लौट जाते. बजाज जी की तरफ़ से उन्हें दो टाइम का खाना और बस का आने जाने का किराया मिलता था. सौदा बुरा नहीं था. बजाज जी खुद भी दिल्ली की लोकल बस में सफर करते. चमरौंधे का जूता पहनते, और खद्दर की मारवाड़ी धोती. चीनी की बजाय गुड़ खाते. बजाज ऑटो का काम देख रहे अपने भाईयों को ताबड तोड़ पत्र लिखते रहते, लेकिन उनका जवाब शायद ही कभी आता हो.

उनके यहाँ लक्ष्मण वोरा नामक एक कुमाउनी लड़का भी काम करता था. हम वतन होने के नाते हम दोनों की खूब छनती. वह सीधा साधा बल्कि लाटा ( बावला ) सा था. एक दिन बजाज जी को कह बैठा कि मुझे रात में सपने में वीर्य गिरता है. भाया जी ने उसकी बात का बुरा नहीं माना, और सलाह दी कि वह रात को सोते समय भगवान का ध्यान करे. सब ठीक हो जाएगा. लेकिन उसकी स्वप्न दोष की समस्या जारी रही. अब उसे मैंने सलाह दी कि जब मन करे हस्त मैथुन कर लिया कर. मेरे उपचार से उसकी समस्या हल हो गयी और उस गधे ने मेरी तारीफ करते हुए यह बात भाया जी को बता दी.

(ज़ारी)                                                                 अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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