Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  कला व साहित्य  >  Current Article

विचारों का वामपंथी फासीवाद…

By   /  August 4, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

 -अनंत विजय||

प्रेमचंद की जयंती के मौके पर हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका हंस की सालाना गोष्ठी राजधानी दिल्ली के साहित्यप्रेमियों के लिए एक उत्सव की तरह होता है. जून आते आते लोगों में इस बात की उत्सुकता जागृत हो जाती है कि इस बार हंस की गोष्ठी के लिए उसके संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव किस विषय का चुनाव करते हैं. इस उत्सुकता के पीछे पिछले अट्ठाइस साल से इस गोष्ठी में होने वाला गहन चिंतन और मंथन करनेवाले प्रतिष्ठित वक्ताओं के विचार रहे हैं. पिछले तीन चार सालों से इस गोष्ठी पर विवाद का साया मंडराने लगा है. कई लोगों का कहना है कि राजेन्द्र यादव जानबूझकर विषय और वक्ता का चुनाव इस तरह से करते हैं ताकि विवाद को एक जमीन मिल सके. हो सकता है ऐसा सोचनेवालों के पास कोई ठोस और तार्किक आधार हो, लेकिन इतना तय है कि इस आयोजन में बड़ी संख्या में राजधानी के बौद्धिकों की सहभागिता होती है. पूर्व में हंस पत्रिका की संगोष्ठी में हुए विमर्श की गरमाहट राजधानी के बौद्धिक समाज के अलावा देशभर के संवेदनशील लोगों ने महसूस की. लेकिन इस वर्ष की हंस की संगोष्ठी साहित्य से जुड़े एक ऐसे विषय से जुड़ा है जिसपर साहित्य जगत को गंभीरता से सोचने की आवश्कता है. इस बार की संगोष्ठी ने खुद को हिंदी समाज का प्रगतिशील और जनवादी बौद्धिक तबका करार देने वालों के पाखंड को उजागर कर दिया.premchand

दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा. प्रेमचंद की जयंती इकतीस जुलाई को होने वाले इस सालाना जलसे का विषय था – अभिव्यक्ति और प्रतिबंध – और वक्ता के तौर पर हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दीक्षित और पूर्व भारतीय जनता पार्टी नेता गोविंदाचार्य, अंतराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका और नक्सलियों की हमदर्द अरुंधति राय, नक्सलियों के एक और समर्थक और कवि वरवरा राव को आमंत्रित किया गया था. वरवरा राव की कविताओं से हिंदी जगत परिचित हो या ना हो लेकिन उनकी ऐसी क्रांतिकारी छवि गढ़ी गई है जो उनको वैधता और प्रतिष्ठा दोनों प्रदान करती है. माओवाद के रोमांटिसिज्म और मार्क्सवाद की यूटोपिया की सीढ़ी पर चढ़कर वो प्रतिष्ठित भी हैं. कार्यक्रम की शुरुआत शाम पांच बजे होनी थी। अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य तो समय पर पहुंच गए. अरुंधति राय और वरवरा राव का घंटे भर से ज्यादा इंतजार के बाद कार्यक्रम शुरु हुआ. पहले तो बताया गया कि वरवरा राव दिल्ली पहुंच रहे हैं और कुछ ही वक्त में सभास्थल पर पहुंच रहे हैं. नहीं पहुंचे. कार्यक्रम के खत्म होने के बाद से सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर चर्चा शुरु हो गई. किसी ने लिखा कि जनपक्षधर कवि वरवरा राव ने हंस के कार्यक्रम का बहिष्कार किया क्योंकि उन्हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था. किसी ने अरुंधति की बगैर मर्जी के कार्ड पर नाम छाप देने को लेकर राजेन्द्र जी पर हमला बोला.

यह सब चल ही रहा थी कि सोशल मीडिया पर ही वरवरा राव का एक खुला पत्र तैरने लगा. उस पत्र की वैधता ज्ञात नहीं है लेकिन कई दिनों के बाद भी जब वरवरा राव की तरफ से कोई खंडन नहीं आया तो उस खत को उनका ही मान लिया गया है. उस पत्र में वरवरा राव ने गोष्ठी में नहीं पहुंचने की बेहद बचकानी और हास्यास्पद वजहें बताईं. अपने पत्र में वरवरा राव ने लिखा- मुझे हंस की ओर से ग्यारह जुलाई को लिखा निमंत्रण पत्र लगभग दस दिन बाद मिला. इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेन्द्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण पत्र में डाल देने की घोषणा कर रखी थी. बहरहाल मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन और क्यों और किस मंशा से बुला रहा है. मेरे साथ इस मंच पर मेरा साथ बोलनेवाले कौन हैं. वरवरा राव के इस भोलेपन पर विश्वास करने का यकीन तो नहीं होता लेकिन अविश्वास की कोई वजह नहीं है. भोलापन इतना कि किसी ने बुलाया और आप विषय देखकर चले गए. वरवरा राव ने आगे लिखा कि दिल्ली पहुंचने पर उनको यह जानकर हैरानी हुई कि उनके साथ मंच पर गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी हैं. राव के मुताबिक अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट से जुड़ाव सर्वविदित है. राव यहीं तक नहीं रुकते हैं और अशोक वाजपेयी की प्रेमचंद की समझ को लेकर भी उनको कठघरे में खड़ा कर देते हैं. इसके अलावा गोविंदाचार्य को हिंदूवादी राजनीति करनेवाला करार देते हैं। गोविंदाचार्च के बारे में उनकी राय सही हो सकती है लेकिन अशोक वाजपेयी के कॉरपोरेट से संबंधों की बात वरवरा राव की अज्ञानता की तरफ ही इशारा करती है. वरवरा राव को अशोक वाजपेयी का सांप्रदायिक राजनीति से विरोध ज्ञात नहीं है. शायद हिंदी के चेले चपाटों ने उन्हें बताया नहीं. खैर अशोक वाजपेयी वरवरा राव से कमतर ना तो साहित्यकार हैं और ना ही उनसे कम उनके सामाजिक सरोकार हैं. अशोक वाजपेयी को राव के सर्टिफिकेट की भी जरूरत नहीं है . अरुंधति की तरफ से समारोहा में उनके ना आने की वजह का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया. लेकिन साहित्यक हलके में यही चर्चा है कि उनको भी गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था. अरुंधति हंस के कार्यक्रम में पहले भी ऐसा कर चुकी हैं जब उनको और छत्तीसगढ़ के डीजी रहे विश्वरंजन को एक मंच पर आमंत्रित किया गया था. उस वक्त भी वो नहीं आई थी. premchand sangoshthi

दरअसल हंस की गोष्ठी के दौरान हुआ यह ड्रामा वामपंथी फासीवाद का बेहतरीन नमूना है. वरवरा राव ने अपने खुले पत्र में खुद की लाल विचारधारा का भी परचम लहराया है. राजसत्ता द्वारा अपनी अपनी प्रताड़ना का छाती कूट कूट कर प्रदर्शन किया है.  राजेन्द्र यादव भी खुद को वामपंथी रचनाकार कहते रहे हैं लेकिन इस मसले पर वामपंथियों के इस फासीवाद के बचाव में उनके तरकश में कोई तीर है नहीं, बातें चाहे वो जितनी कर लें। राजनीति की किताबों में फासीवाद की परिभाषा अलग है लेकिन लेनिन के परवर्तियों ने फासीवाद की अलग परिभाषा गढ़ी. उसके मुताबिक फासीवाद अन्य लोकतांत्रिक दलों का खात्मा कर पूरे समाज को एक सत्ता में बांधने का प्रयास करता है. फासीवाद के उनके इस सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण रूस और चीन हैं जहां लाखों लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता की विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. सैकड़ों नहीं, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. वामपंथी राजनीति का दुर्गुण ही यही है कि जिसे वो फासीवाद मानते हैं वास्तविकता में उसी को अपनाते हैं. हंस की गोष्ठी में वरवरा राव और अरुंधति का गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ शामिल नहीं होना यही दर्शाता है. दरअसल यह विचारों का फासीवाद तो है ही एक तरह से विचारों को लेकर अस्पृश्यता भी है. क्या वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों के पास इतनी तर्कशक्ति नहीं बची कि वो दूसरी विचारधारा का सामना कर सकें. क्या वाम विचारधारा के अंदर इतना साहस नहीं बचा कि वो दूसरी विचारधारा के हमलों को बेअसर कर सकें. अगर मैं ऑरवेल के डबल थिंक और डबल टॉक शब्द उधार लूं तो कह सकता हूं कि हिंदी समाज के वामपंथी विचारधारा को माननेवाले लोग इस दोमुंहे बीमारी के शिकार हैं. दरअसल सोवियत संघ के विघटन के बाद भी हमारे देश के मार्क्सवादियों ने यह सवाल नहीं खड़ा किया कि इस विचारधारा में या उसके प्रतिपादन में क्या कमी रह गई थी. दरअसल सवाल पूछने की जगह भारत के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने मार्कसवाद की अपने तरीके से रंगाई पुताई की और उसकी बिनाह पर अपनी राजनीति चमकाते रहे. रूस में राजसत्ता का कहर झेलनेवाले मशहूर लेखक सोल्झेनित्सिन ने भी लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है.‘ भारत में इस तरह के उदाहरण लगातार कई बार और बार बार मिलते रहे हैं. एक विचारधारा के तौर पर मार्क्सवाद पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं लेकिन उसको एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता है. लेकिन इस विचारधारा के वरवरा राव जैसे अनुयायी उसको फासीवादी बाना पहनाने पर आमादा हैं. राव और अरुंधति को गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ अभिव्यक्ति और प्रतिबंध विषय पर अपने विचार रखने चाहिए थे. अपने तर्कों से दोनों को खारिज करते. लेकिन हमारे समाज में वरवरा राव जैसे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अब भी मौजूद हैं जो विचारधारा की कारागार में सीखचों के पीछे रहकर प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं. इस बार जिस तरह से हंस की गोष्ठी में राव और राय के नहीं आने को लेकर सोशल मीडिया और अखबारों में संवाद शुरू हुआ है उससे तो यही कहा जा सकता है कि हंस की गोष्ठी अब शुरू हुई है और वो विचारों के कारागार से मुक्त है.

(अनंत विजय का यह लेख हाहाकार पर प्रकाशित हो चुका है)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

सामाजिक जड़ता के विरुद्ध हिन्दी रंगमंच की बड़ी भूमिका..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: