Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

मेरे संपादक, मेरे संतापक: डॉ. अंसारी की हवेली में कुछ दिन..

By   /  August 5, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

मेरे संपादक, मेरे संतापक -४                                                                 पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

दिल्ली में राधा कृष्ण बजाज उर्फ “भाया जी” दिल्ली गेट के पास अंसारी रोड के पास एक कोठी से अपना सत्याग्रह चलाते थे. यह कोठी किसी सेठ ने खरीदी थी और इसको लेकर लफडा था,  सो उसने यहाँ भाया जी को अपना आंदोलन यहीं से संचालित करने के लिए प्रेरित किया,  ताकि वहां भजन – कीर्तन होता रहे,  और भीड़ – भाड़ बनी रहे. दो – चार साल बाद झगडा सुलट जाने के बाद उसने अपनी कोठी खाली करवा ली,  और भाया जी कुछ दिन एक गेराज में रहने के बाद अंततः वापस वर्धा चले गए.

THAVD_MILKING_COW

यह ऐतिहासिक हवेली थी,  जो कभी महात्मा गांधी और स्वामी श्रद्धा नन्द के निकट सहयोगी रहे डॉ. अंसारी की संपत्ति थी. यहाँ मेरा काम भाया जी के पत्र और लेख टाइप करने का था. लेकिन ड्यूटी चूंकि स्वेच्छिक थी,  इस लिए जब मुझे फुर्सत मिलती तब करता,  वरना नहीं भी करता. उन्हें पत्र लिखने का बड़ा चाव था. रोज गांधी जी की तर्ज़ पर गो रक्षा को लेकर दर्ज़नों पत्र लिखते,  यद्यपि जवाब शायद ही किसी का आता हो.

गाय के दूध,  गोबर,  मूत्र आदि के फायदे को लेकर लंबे लंबे लेख और प्रेस नोट बना कर मुझे सौंपते,  जिन्हें अखबार वाले रद्दी की टोकरी के हवाले कर देते थे,  लेकिन वह हार नहीं मानते,  और सतत लिखते रहते. अपने साथ रहने वाले हम पांच – छह स्थायी अन्तेवासियों को वह रोज प्रार्थना के बाद गाय के दूध पर प्रवचन देते. एक दिन हम में से सबसे वरिष्ठ महावीर त्यागी ने उलाहना दिया – आप हमेशा कहते रहते हो कि गाय का दूध हर भारत वासी को रोज कम से कम आधा सेर मुहैय्या होना चाहिए,  जबकि यह हमें कभी नहीं मिलता तो औरों की बात क्या करें? भाया जी किन्कर्तव्यमूढ हो गए,  और नतीजतन हमें रोज रात को दो सौ ग्राम दूध मिलने लगा. गाय का दूध लेने प्रायः मै ही जाता. एक दिन गाय का दूध उपलब्ध न होने पर सप्लायर ने भैंस का दूध दे दिया. भाया जी बहुत नाराज़ हुए और वह दूध वापस फेरना पड़ा. यह नौबत एकाधिक बार फिर आई,

राजीव नयन बहुगुणा

राजीव नयन बहुगुणा

लेकिन अब प्रदाता ने मुझे साध लिया था. वह भैंस के दूध में चुटकी भर हल्दी पावडर मिलाता,  और भाया जी देख कर खुश होते – देखो यह हुआ न असली गाय का दूध,  रंग और स्वाद में कितना खरा है. मै हामी भरता. यहाँ मुझे रहने – खाने की कोई दिक्कत न थी,  फिर भी मै माथुर साहब से बार – बार कहता कि खाना कभी मिलता है कभी नहीं,  जल्दी मेरा उद्धार कीजिए. लेकिन वह अडिग होकर कहते कि कम खाने से आज तक कोई नही मरा,  दुनिया के तमाम लोग ज्यादा खाने से मर रहे हैं. प्रतीक्षा करो.

मै प्रतीक्षा न करता तो क्या करता? नवभारत टाइम्स में भी मै स्वयं सेवा ही कर रहा था. असल में माथुर साहब का उद्देश्य यह था कि मै कुछ काम सीख लूं,  ताकि उन पर कोई आंच न आये. एक सतूना उन्होंने मेरा यह बिठा दिया था कि अखबार के उत्तर प्रदेश संस्करण में मेरे लेख या रपटें छप जातीं,  जिनका मुझे भुगतान होता था. मै हर माह एकाउंट में जाकर पूछता – मेरा चेक बना क्या? और जब पता चलता कि बन गया तो सौ या दो सौ रूपये का चेक लेने अपने गाँव टिहरी चला जाता,  तीन सौ रूपये खर्च करके. चेक गाँव के पते पर ही जाता था,  क्योंकि दिल्ली में मेरा कोई स्थायी ठिकाना तो था नहीं. गाँव आने – जाने का किराया भाया जी सहर्ष दे देते,  लेकिन उन्हें वापसी में बस के टिकट सौंपने पड़ते. दो रुपये की चाय भी रस्ते में पी तो उसका भी अलग से पर्चा बना के देना होता था. यह साधन शुचिता का गांधी माडल था,  जिसके तहत चवन्नी का हिसाब देना भी लाजमी था.

(ज़ारी)                                                                             अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

राजस्थान के पत्रकार सरकार के समक्ष घुटने टेकने पर विवश हैं..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: