/मेरे संपादक, मेरे संतापक: फिर याद आये वी. पी. सिंह..

मेरे संपादक, मेरे संतापक: फिर याद आये वी. पी. सिंह..

मेरे संपादक, मेरे संतापक – 5                                                                 पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

जैसे – जैसे दिन – महीने गुजरने लगे, मुझे माथुर साहब पर संदेह होने लगा कि वह मुझे टरका रहे हैं. राजेन्द्र माथुर कम बोलने वाले व्यक्ति थे, जिससे मुझ समेत कईयों को लगता था कि वह उपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन ऐसा था नहीं. अब मैंने इधर- उधर हाथ – पैर मारने शुरू किये.

V.P.Singh

राधा कृष्ण बजाज से मिलने टाइम्स ऑफ इंडिया वालों के कुल गुरु सदृश गांधी वादी बुज़ुर्ग साहित्य कार जैनेन्द्र कुमार ( जैन ) भी यदा – कदा आते थे. सुना था कि उनकी कोई बात टाइम्स वाले नहीं टालते. लेकिन भाया जी ने उनसे मेरा परिचय तो कराया, पर मेरा दिल्ली में होने का मकसद नहीं बताया. मुझे विश्व नाथ प्रताप सिंह का ध्यान आया, जो उन दिनों राजीव गांधी की सरकार में एक प्रभावशाली मिनिस्टर थे. विश्व नाथ जी से मेरा परिचय पुराना था. वह मेरे पिता के प्रति स्नेह और आदर का भाव रखते थे.

एक बार जब वह उक्त घटना के करीब पांच साल पहले उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे तो उत्तराखंड के कुछ छूट भैया फरियादियों के साथ मै भी लखनऊ स्थित उनकी कोठी पर पंहुच गया. करीब दो सौ फरियादियों को आनन – फानन में निबटा कर मुख्य मंत्री कार में बैठ कर जाने लगे. हमारा नम्बर नही आया था. हमारे दल में से किसी ने ऊंचे स्वर में गुहार लगाई – सर ! सुंदर लाल बहुगुणा जी के सुपुत्र भी आपसे मिलने को खड़े हैं. कहाँ हैं, कहाँ हैं ? यह कहते हुए मुख्य मंत्री स्टार्ट हो चुकी कार से उतर गए, और मुझे अपने साथ बिठा ले गए. उन्होंने मुझसे पूछा पढाई का खर्चा पर्चा आराम से चल जाता है? मैंने संकोच सहित नकारात्मक उत्तर दिया तो उन्होंने उत्तर काशी के डी एम की मार्फ़त मुझे साढ़े तीन हज़ार रुपये भिजवा दिए.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

इस घटना से मेरा रूतबा बढ़ गया और मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी. इसके बाद मैंने उन्हें दो – तीन बार और ठगा. उत्तरकाशी का डी एम मेरे कब्ज़े में आ गया, और जब भी मै मांगू मुझे सरकारी गाडी मिलने लगी. खैर……विश्व नाथ जी ने कहा कि उद्योग पतियों पर छापे के कारण टाइम्स वाले मुझसे नाराज़ हैं, लेकिन आपके लिए कोई और राह देखते हैं. लेकिन मुझे तो पत्रकार बनने की और वह भी राजेन्द्र माथुर के साथ काम करने की लगन लगी थी. अब मैंने हेमवती नंदन बहुगुणा का दर खटखटाया, जिनका मै पुराना स्नेह पात्र था, और राजनीति का रास्ता छोड उन्ही के कहने पर पत्रकार बनने की ठानी थी.

( जारी )                                   अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.