/पाक में दखल और राजस्थान में राजनीति..

पाक में दखल और राजस्थान में राजनीति..

-रोशन लाल शर्मा||
जिस गाजी फकीर की हिस्ट्रीशीट खोलने को लेकर जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक पंकज चौधरी को तबादला झेलना पड़ा, उस गाजी फकीर की सीमावर्ती क्षेत्रों में राजनीतिक और प्रशासनिक पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाक में अपने संबंधों के बावजूद उसके परिवार के सदस्य पूरे के पूरे राजस्थान की राजनीति में सक्रिय है.
जिस गाजी फकीर की पाकिस्तान में दखल हो और जो राजस्थान की राजनीति में रुतबा रखता हो उसके लिए भला एक एसपी क्या चीज है लेकिन इस बार मामला जरा बड़ा हो गया है. गाजी फकीर और उसके परिवार की दबंगई से आजीज आ चुकी जनता परेशान है. सोमवार से लेकर आज मंगलवार तक वहां लगातार कई कस्बों में लोगों ने बंद रखा और एसपी के तबादले का विरोध प्रकट कर रहे हैं. पोकरण के कुछ गांव आज भी बंद है और जनता सड़क पर उतर आई है.gazi fakir with ashok gehlot
अलबत्ता इस प्रकरण से यह साबित हो गया है कि राज्य की कांग्रेस सरकार अपनी गोपनीयता और पारदर्शिता खोती जा रही है. इस सरकार में शामिल एक महिला विधायक और उसके पुलिस अधिकारी पति पर जहां एक पत्रकार को जान से मारने और उसके परिवार को दरबदर करने के आरोप लग रहे हैं, वहीं दूसरे विधायक सालेह मोहम्मद पर लगे आरोप और भी गंभीर हैं. आज जैसलमेर ही नहीं आमजन के मन में यह बात जरूर है कि आखिर कैसे एक ऐसे व्यक्ति के परिजन राजस्थान की सबसे बड़ी पंचायत में पंचायती करने के काबिल हो गए जो पाकिस्तान आता-जाता रहा है और जिसकी दबंगई के चलते लोग परेशान है.
गाजी फकीर व उनके बेटों की राजनीति में पकड़ के चलते वे कई बार एसपी व कलेक्टर का तबादला करवा चुके हैं. 1990 में तत्कालीन एसपी सुधीर प्रताप सिंह का 28 दिन के भीतर ही ट्रांसफर करा दिया गया था. उन्होंने गाजी फकीर की 1984 में गायब हुई हिस्ट्रीशीट को 1990 में दोबारा खुलवा दिया था. आरोप है कि इससे पहले कलेक्टर रहे गिरिराज सिंह कुशवाहा व एम.पी स्वामी, जिला परिषद के सीईओ के तबादले में भी इनकी मुख्य भूमिका रही. इसके अलावा कई अन्य छोटे-बड़े अधिकारियों के तबादले में इनका हाथ रहा है.
गाजी फकीर के आगे सरकार तक हमेशा नतमस्तक रहती है. इस फकीर की पाकिस्तान से सटी सीमा से लेकर पड़ोसी मुल्क तक में हुकूमत चलती है. जिस भी अधिकारी ने गाजी फकीर नाम के इस कुख्यात फकीर पर हाथ डाला, उसे सजा भुगतानी पड़ी. जैसलमेर के एसपी पंकज चौधरी को भी गाजी फकीर पर हाथ डालना महंगा पड़ा और उन्हें वहां से रिलीव कर दिया गया. एसपी ने रिलीव होने से पहले गाजी फकीर के बेटे और कांग्रेसी विधायक शालेह मोहम्मद के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में दखल देने, लपकों को छुड़ाने और अभद्र व्यवहार करने का मुकदमा दर्ज करवा दिया है.
गाजी फकीर पोकरण सेकांग्रेस विधायक शालेह मोहम्मद के पिता हैं. वे पाकिस्तान के पीर पगारो के अनुयायी और भारत में प्रतिनिधि के तौर पर हैं. वे पीर पगारो से मिलने जाते रहे हैं. उनके संदेश अपने समाज में प्रचारित करते हैं. उनके इसी रसूख के कारण तस्कर सीकिया को पाकिस्तान में जमानत मिली थी.
गाजी के रसूख के आगे सभी बौने
– जैसलमेर पुलिस ने गत 17 मई को लपकों को पकड़ा तो विधायक सालेह मोहम्मद ने उन्हें छुड़ा दिया और पुलिस कार्रवाई में बाधा डाली. इस विवाद में भी विधायक एसपी को हटाने के लिए मुख्यमंत्री से मिले थे, मगर जैसलमेर बंद होने पर एक बार ट्रांसफर टल गया.
– जिस एएसपी गणपतलाल ने मई 11 में हिस्ट्रीशीट बंद की थी, उसे हटाने में भी एसपी व आईजी को पसीना आ गया था. दोनों की रिपोर्ट के बावजूद फकीर परिवार के संरक्षण के कारण एएसपी को उस समय नहीं हटाया जा सका था.
– गाजी फकीर की हिस्ट्रीशीट 31 जुलाई 1965 में खुली. यह 1984 में गायब हो गई. इसके बाद 1990 में तत्कालीन एसपी सुधीर प्रतापसिंह ने 31 जुलाई को दुबारा हिस्ट्रीशीट खोली तो एक माह में उनका ट्रांसफर हो गया.
– मुख्यमंत्री का गत 8 जून को जैसलमेर में साइकिल व लैपटॉप वितरण का कार्यक्रम था. सरकार के निर्देश थे कि यह पार्टी का आयोजन नहीं है इसलिए झंडे-बैनर नहीं लगेंगे मगर मंच पर सीएम के साथ गाजी फकीर को प्रोटोकॉल तोड़ कर बैठाया गया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.