/मेरे संपादक, मेरे संतापक: बहुगुणा आख्यान…

मेरे संपादक, मेरे संतापक: बहुगुणा आख्यान…

मेरे संपादक, मेरे संतापक-6                                                       पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

उत्तराखंड मूल के, लेकिन इलाहाबाद से राजनीति के घाघ बने राज पुरुष हेमवती नंदन बहुगुणा उन दिनों दिल्ली में अपने दुर्दिन गुज़ार रहे थे. वह इलाहाबाद से लोक दल के टिकट पर फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन से लोक सभा चुनाव हार कर फिर से स्थापित होने के लिए हाथ – पांव मार रहे थे. वह मेरी तो क्या खुद की ही कोई मदद करने की स्थिति में नहीं थे. राजीव गांधी अपनी माँ की ह्त्या से उपजी सहानुभूति के कारण भारी बहुमत से सत्ता में आये थे, और उनके हाली – मवाली दून स्कूल के गिट पिट अंग्रेज़ी बोलने वाले चाकलेटी भद्रलोक के साथी और कांस्टीट्यूशन क्लब  से नेता बने नौसिखुए दोस्त पुराने राज नेताओं को चुन चुन कर अपमानित कर रहे थे.hemwati nandan bahuguna

हेमवती नंदन बहुगुणा उनके निशाने पर सबसे पहले आये. उनसे सरकारी मकान छीन लिया गया, यद्यपि वह चुनाव हार जाने के बाद सरकारी मकान के हक़दार नहीं रह गए थे, लेकिन अपनी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वाधीनता सेनानी, सुदीर्घ राजनैतिक सेवा तथा दिल का मरीज़ होने की बिना पर उन्होंने सरकारी बंगले पर बने रहने देने की गुहार लगाई. लेकिन सरकार का रुख सख्त था. बंगले से सामान बाहर फिंकवाए जाने की नौबत आते देख वह चुपचाप कांस्टीट्यूशन क्लब के दो कमरों में शिफ्ट हो गए, यह व्यवस्था भी एक माह के लिए थी.

इस दौरान मैंने उन्हें रोज मकान एलाटमेंट की अपनी फ़ाइल को फालो करने के लिए गृह मंत्रालय के बाबुओं के पास आते – जाते देखा. आखिर स्वाधीनता सेनानी के नाते उन्हें डिफेन्स कालोनी में एक छोटा सा फ्लेट एलाट हो गया. यहाँ वह कुंठा, निराशा, क्रोध, ग्लानि और प्रतिशोध की भावना से ओतप्रोत लेकिन पुनर्स्थापन के लिए छटपटा रहे थे. उन पर सत्ता लोलुप तथा दल बदलू होने का ठप्पा लग चुका था, यद्यपि वह एक होशियार, वाकपटु, मिलनसार, मेधावी, मह्त्वाकांक्षी और अनुभवी लेकिन अधीर राज नेता थे. वह जिसे एक बार देखते, उसे कभी भूलते नहीं थे थे, और सालों बाद मिलने पर भी उसे नाम लेकर पुकारते थे.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

उनको ठीक ठीक समझना हो तो उत्तराखंड के वर्तमान मुख्य मंत्री उनके पुत्र विजय बहुगुणा के व्यक्तित्व का ठीक विलोम कर लीजिए, तो हेमवती बाबू का व्यक्तित्व सामने आ जायेगा. लगातार पांच साल तक सत्ता से बाहर रहने, और कोढ़ पर खाज यह कि एम पी तक न बन पाने की विडंबना के कारण उनके फायनेंसरों ने उन्हें पैसा देने से लगभग हाथ खींच लिया था. एक बार मै उनके साथ उन्ही की कार से राजघाट की ओर गया तो, रास्ते में उन्होंने गाडी रोक् कर खुद घर के नौकर चाकरों के लिए साबुन – तेल की खरीद दारी की. यह देखना मेरे लिए त्रासद था, क्योंकि मै उनका चरम वैभव काल भी देख चुका था. उनकी फजीहत देख मै कुछ देर के लिए अपना संकट भूल जाता.

मेरे संपादक, मेरे संतापक-7

हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुझे और मैंने उन्हें पहली बार १९७५ में नवंबर महीने की चौदह तारीख को देखा. तब तक वह उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय,  लेकिन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी कि आँख की किरकिरी बन चुके थे. टिहरी में एक नहर परियोजना का शिलान्यास करने के बहाने आये थे. सदियों से दमित, दलित, कुंठित और तिरस्कृत पूर्व टिहरी रियासत की प्रजा ने उनमे अपना अभिनव स्वाभिमान देखा था. मै स्कूल में पढता था, लेकिन कुछ माह पहले ही चर्चित अस्कोट – आराकोट पदयात्रा पूरी कर आया था. मेरे पिता और हेमवती नंदन बहुगुणा, दोनों तब तक एक दुसरे से लंबा और घातक वैचारिक युद्ध करने के बाद आत्म समर्पण कर् चुके थे. दोनों पर एक दुसरे के प्रति सॉफ्ट कोर्नर अपनाने का आरोप लगना शुरू हो गया था. इन्ही सारे आरोपों के कारण, शायद मेरे पिता उनके टिहरी दौरे की खबर आते ही एक गुफा में ध्यानस्थ हो गए, अनिश्चित काल के लिए. ऐसा वह गाहे – ब- गाहे करते रहते थे. जब जब उनके पुराने राजनैतिक दोस्त व दुश्मन कांग्रेसी उन्हें घेरने का प्रयास करते. आखिर मेरे पिता भी पुराने कांग्रेसी रह चुके थे और अपने दोस्तों की रग रग से वाकिफ़ थे. मंच पर लगभग दौड कर चढ़ कर उर्दू, हिंदी और गढवाली में सम्मोहक व्याख्यान देकर उन्होंने मुझे मोह लिया. यही जादू उन पर शायद मैंने भी किया, जब मै थोड़ी देर बाद उनसे मिला. इसके बाद हम दोनों उनकी मृत्यु तक एक दुसरे के प्रति निष्ठावान रहे.

(जारी..)                                                                 अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.