/अम्बेडकरनगर में बुर्कापोश महिला पाकेटमार सक्रिय…

अम्बेडकरनगर में बुर्कापोश महिला पाकेटमार सक्रिय…

रिक्शा एवं टैक्सी-टैम्पो सवारियों को बनाती हैं निशाना

-रीता विश्वकर्मा||

अम्बेडकरनगर। होशियार! खबरदार! बुर्कापोश पाकेट मारों से वर्ना आप की पाकेट से बटुआ और बड़े बैग में से पैसों से भरा पर्स पलक झपकते ही गायब हो जाएगा फिर आप इस करिश्मे से आश्चर्य चकित होकर हाथ मलते रह जाएँगे। जी हाँ यह एक दम सोलह आने सच बात है। लगभग एक दशक से बुर्कापोश पाकेटमार अकबरपुर, शहजादपुर उपनगरों से लेकर जिला मुख्यालय स्थित कचेहरी, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति, धरना-प्रदर्शन स्थल, जिला अस्पताल, विकास भवन, जिला पंचायत कार्यालय, तहसील एवं जनपद न्यायालय परिसर, कलेक्ट्रेट के बाहर अपने मालदार, शिकार की टोह में प्रत्येक दिन टैम्पो, रिक्शा स्टैण्ड के आस-पास मंडराते रहते हैं।pickpocketing by burka woman
इनके पाकेट मारने की स्टाइल अजीब सी है। एक दम विशुद्ध अहिंसात्मक तरीका अपना कर ये बुर्कापोश महिलाएँ अपने शिकार को हलाल कर देती हैं, जिसका दर्द लुटे-पिटे लोग अपने घर एवं बसेरों पर पहुँचकर महसूस करते हैं। यदि आप मालदार आसामी है और रिक्शे से अकेले जा रहे हैं तब ये बुर्कापोश रिक्शा रूकवाकर गन्तव्य तक चलने को कहेंगी। आप भी रिक्शे का आधा किराया बचत करने के चक्कर में इन्हें अपने बगल बिठा लेंगे। आप के गन्तव्य आने से पहले ही इन बुर्काधारी पाकेटमार महिलाएँ द्वारा रिक्शा रूकवाकर उतर जाती हैं और रिक्शा चालक को आधा किराया देकर देखते ही देखते अदृश्य हो जाती हैं और आप बेखौफ इस बात से अंजान बने अपने गन्तव्य को चल पड़ते हैं।
जब आप का डेस्टिनेशन आता है तो पता चलता है कि रिक्शेवाले का किराया कैसे दें? क्योंकि पाकेट, बैग में रखा पैसों वाला पर्स/बटुआ तो बगल बैठा बुर्कापोश सहयात्री ले उड़ा होता है। येने केन प्रकारेण आप अन्य जान पहचान वालों से पैसे लेकर रिक्शे का किराया अदा करते हैं। यदि आप पैसे वाले हैं चाहे स्त्री हों या पुरूष टैम्पो पर बैठे हुए गन्तव्य को जा रहे हैं तो झट से ये बुर्कापोश नमूदार होकर आप की बगल में बैठ जाएँगे फिर ये बुर्कापोश हाथ के करिश्मे से आपका पर्स पार करके बीच में ही उतर जाएँगी। आप को तब पता चलेगा जब टेम्पों का किराया देने के लिए आप अपने बैग में रखे पैसे वाला पर्स ढूंढेगे तब आपको जान पहचान वालों पैसे लेकर टैम्पों का किराया अदा करना पड़ेगा क्योंकि आपकी पॉकेट तो मर ली गयी होगी।
इस तरह के ‘बुर्कापोश‘ पाकेटमारों की सक्रियता थाना कोतवाली अकबरपुर क्षेत्र में एक दशक से है, लेकिन अभी तक पुलिस क्यों नहीं ध्यान दे रही है इसका उत्तर कुछ यूँ हो सकता है- पहला यह कि जब तक इस तरह के पाकेटमारों के शिकार वादी बनकर थाना पुलिस को तहरीर नहीं देंगे तब तक पुलिस कार्रवाई कैसे करे। दूसरा यह कि रिक्शा, टैम्पो चालक, क्लीनर पुलिस और इन पाकेटमारों का ‘याराना‘ होगा इसीलिए बुर्काधारी पाकेटमार अपने कार्य को अंजाम देकर पैसों की आपसी बाँट करते हैं।
यह तो रही बुर्कापोश पाकेटमारों के विषय में संक्षिप्त बात। प्रेस/मीडिया से भला ये क्यों अछूते हैं या प्रेस/मीडिया वाले इससे क्यों अंजान है? सीधी सी बात है पी फॉर पाकेटमार, पी फॉर पुलिस और पी फॉर प्रेस तब भला ऐसे में किस प्रेस/मीडिया वाले को पड़ी है कि वह बुर्कापोश पाकेटमारों की सक्रियता पर विशेष ध्यान दे। धार्मिक स्थलों, मनोरंजन केन्द्रों, पार्कों, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन, स्टापेज, टैम्पो स्टैण्ड, बैंकों के इर्द-गिर्द भी ऐसे राहजन पाकेटअ मार अपनी कारगुजारी से लोगों की जेबें ढीली कर दे रहे हैं। दो चार लाइनें अखबारों में छप गईं बस। प्रेस मीडिया इसे बड़ा क्राइम नहीं मानता ऐसे संवादों के प्रकाशन से उनका सर्कुलेशन और टी.आर.पी. नहीं बढ़ने वाला।
बहरहाल कुछ भी हो यदि पुलिस महकमा इस तरह की कथित छोटी वारदातों की तरफ गम्भीरता से ध्यान दे तो बड़ी वारदातों पर भी नियंत्रण लग सकता है। चोरी, पाकेटमारी, राहजनी, जहरखुरानी आदि जैसे अपराधों को जब तक हल्का लिया जाएगा तब तक बड़े और जघन्य अपराध पर काबू नहीं पाया जा सकेगा। क्योंकि अपराधियों को पुलिस का भय जब तक नहीं सतायेगा, अपराधों पर नियंत्रण लगना मुश्किल ही होगा। यह कोई भाषण नहीं, कोई प्रवचन नहीं अपितु नेकनीयती से यह आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि जिले के पुलिस महकमें के जिम्मेदार, कर्मठ अधिकारी, कर्मचारी सक्रिय होकर यदि किसी एक बुर्कापोश पाकेटमार को धर दबोचें तो बहुत बड़े आपराधिक गिरोह का पर्दाफाश हो सकता है।
इस सक्रिय बुर्कापोश पाकेटमार गिरोह की धरपकड़ के लिए नागरिक पुलिस को रिक्शा चालक, टैक्सी, टैम्पो चालक, क्लीनर, ड्यूटी पर तैनात यातायात पुलिस कर्मियों पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी पड़ेगी। बुर्कापोश पाकेटमारों के इस एपीसोड को अन्तिम टच देने के पूर्व थोड़ा सा और जो लिखना लाजमी हो जाता है वह यह कि ये एपीसोड काल्पनिक नहीं है, इस संवाद को विषय वस्तु बनाने के लिए ऐसे कई भुक्तभोगियों की व्यथा कथा को हर ‘ऐंगिल‘ से जाँचा परखा गया है। ये लोग बुर्काधारी पाकेटमारो, उचक्कों, राहजनों के शिकार तो हुए हैं, लेकिन पुलिस उनकी बात पर विश्वास नहीं करेगी ऐसा मानकर चुप्पी साधे हमारे दफ्तर में मिलकर अपनी पीड़ा को व्यक्त किया फलतः यह बुर्काधारी पाकेटमार एपीसोड वजूद में आया।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.