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मेरे संपादक, मेरे संतापक: वी बहुगुणा’ज़

By   /  August 10, 2013  /  No Comments

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मेरे संपादक, मेरे संतापक -9                                                             पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

हेमवती नंदन बहुगुणा कार और ब्यूरोक्रेसी दोनों को तेज गति से हांकने के माहिर थे. उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने एक नकचढे नौकर शाह को कुछ मौखिक आदेश दिया. टालने के अंदाज़ में अफसर बोला – कल तक देखूंगा सर. कल तक तो तुम जेल चले जाओगे, बहुगुणा ने उसे वार्निंग दी. वह कहा करते थे – नौकरशाही एक ऐसा घोड़ा है जो अपने सवार को पहचानता है. सवार अनाड़ी हुआ तो उसे पीठ से गिरा देता है. जब उन्होंने यह बात कही, संयोगवश उन्ही दिनों उनको अपदस्थ कर उत्तरप्रदेश के मुख्य मंत्री बने नारायण दत्त तिवारी उत्तरकाशी जिले में हरसिल नामक जगह पर घोड़े से गिर पड़े थे.hd-devegawda

नौकरशाह सचमुच बड़े ज़ालिम लोशन होते हैं. मै एक गोपनीय प्रसंग आज आपसे शेयर कर रहा हूँ. १९९६ में मेरे पिता टिहरी बाँध विरोधी अनशन कर रहे थे. केन्द्र सरकार की गहन चिंता के फलस्वरूप मुझे वार्ता के सारे अधिकार देकर दिल्ली भेजा गया. प्रधान मंत्री एच. डी. देवेगौड़ा से मिलने को मै भी उत्सुक था कि दो टांग वाला तथा हवाई जहाज़ में उड़ने वाला गौड़ा कैसा होता होगा. (गढवाली में गौड़ा गाय को कहते हैं). देवे गौड़ा सचमुच हम्बल फार्मर थे. वह मुझे रिसीव करने अपने घर के पोर्च में खड़े थे. उन्होंने मिलते ही मुझे गले लगा कर कहा – आई कान्ट स्लीप नाव ए डेज़. ही इज आल्सो लाइक माय फादर.

मैंने वहीं से अपने पिता को फोन किया कि यह तो लाल बहादुर शास्त्री से भी ज्यादा विनम्र प्रधान मंत्री है. इनकी लाज रखी जानी चाहिए. तय हुआ कि कल दोपहर ग्यारह बजे प्रधान मंत्री के दफ्तर में हमारी फाइनल वार्ता होगी. अंग्रेज़ी में बात – चीत में मदद के लिए मैंने अपने मित्र शिमला विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आर, एस. पिर्ता को बुलवा भेजा, और अपने भाई प्रदीप को कहा कि वह भी कल सुबह तक गंगा जल की एक शीशी लेकर दिल्ली पंहुचे, ताकि प्रधान मंत्री की सदाशयता को उचित सम्मान दिया जा सके. देवेगौड़ा ने कहा कि वह मेरे पिता को अपने हाथ से चिट्ठी लिखेंगे, और उनका हर आदेश मानेंगे. अपने परिवार तथा साथियों के लंबे संघर्ष को फलीभूत होता देख मै भाव विव्हल हो गया.

राजीव नयन बहुगुणा

राजीव नयन बहुगुणा

आप कहाँ रुके हैं?  प्रधान मंत्री ने मुझसे पूछा. मै जे. एन. यू. के हास्टल में सो जाऊँगा सर, मैंने जवाब दिया. मेरी ही अंग्रेज़ी जैसी विकलांग हिन्दी में उन्होंने आह्वान किया – ये देबेगौडा गरीब का ब्यटा, किसान का ब्यटा. मास मच्छी को ये काता नी, मुर्गी, अंडा, सराब को ये पीता नी. तुम हॉस्टल में क्यों सोती, मेरे ही घर क्यों नी सोती. थैंक्यू सर, थैंक्यू सर. सो कैन्ड आफ यू सर. आई विल कम्फेरटेबल दियर सर. मैंने प्रकटतः तो धन्यवाद देते हुए यह कहा, पर मन ही मन बोला – अरे चाचा तू मांस माछी, अंडा, सराब नी पीती, पर मै तो पीती. मुझे प्रधान मंत्री निवास में क्या आलू का झोल खिला कर मेरा नास मारोगे. आप चाय में चीनी कितनी लेंगे सर? विनम्र प्रधान मंत्री ने चीनी की टिकिया मेरे कप में डालते हुए पूछा. अतिशय सौहार्दपूर्ण वातावरण में कल मिलने का निश्चय कर मै वहां से विदा हुआ, ताकि जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय के भद्र ढलानों पर नीम अँधेरे में बैठ कर प्रणय बद्ध जोड़ों को देख कर हलके सुरूर में अपनी थकान उतार सकूं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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