/मेरे संपादक, मेरे संतापक: घोड़े ने सवार को गिरा दिया…

मेरे संपादक, मेरे संतापक: घोड़े ने सवार को गिरा दिया…

मेरे संपादक, मेरे संतापक -10                                                         पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

जे. एन. यू. के उन्मुक्त लेकिन शिष्ट वातावरण में गंगा ढाबे के पीछे कल रात झुरमुटों और चट्टानों की ओट से आने वाली प्रणय कलह की उन्मादक ध्वनियाँ फंतासी बन कर अभी भी मेरे मस्तिष्क में कौंध रही थीं. मै उन्हीं के सहारे बोरियत से बच रहा था. क्योंकि प्रधान मंत्री ग्यारह बजे का समय देकर एक बजे तक भी नहीं मिले थे, जबकि उन्होंने कल कहा था कि – मै ठीक ग्यारह बजे अपने ऑफिस में आपका स्वागत करूँगा. बताया गया कि वह ज़रूरी मीटिंग में व्यस्त हैं.

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राजनेताओं से मेरा साबका बचपन से ही खूब पड़ा है, और बाद में अखबार का रिपोर्टर रहते हुए तो उनसे चोली – दामन का जैसा साथ रहा, इस लिए मै सब समझता था कि राजनेता मीटिंग के बहाने ईटिंग और चीटिंग खूब करते हैं. यह ईटिंग मुर्गे की भी हो सकती है और नोटों के बोरे की भी. उकता कर मै प्रो. पिर्ता के मना करने के बाद भी, गलियारे में चहल कदमी करने लगा. मुझे प्रधान मंत्री के गवाक्ष से ऊर्जा मंत्रालय का एक अफसर बाहर निकलते दिखा, जो कुछ दिन पहले ही ऊर्जा मंत्री के साथ टिहरी में हमारी कुटिया पर आया था. अब मुझे आभास होने लगा कि मीटिंग क्या चल रही है, और देरी का कारण क्या है. मै प्रधान मंत्री के विश्वस्त अफसर जैन के कमरे में घुसा, तो वहां मुझे टिहरी के पूर्व सांसद परिपूर्ण नन्द पैन्यूली बैठे मिले.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

आखिर हमारे तीन सदस्यीय दल को बुलावा आया. कल अतिशय अपनत्व के साथ पेश आ रहे प्रधान मंत्री का व्यवहार आज औपचारिक था. मुझे लगा कि कल घर की बात थी आज ऑफिस में हैं, इस लिए प्रोटोकाल की मर्यादा वश ऐसा होगा, लेकिन उन्होंने मेरे पिता के नाम टाइप किया हुआ जो पत्र मुझे थमाया, उससे मै सबकुछ समझ गया. कल उन्होंने अपने हाथ से पत्र लिखने की बात कही थी, लेकिन आज यह सधा हुआ कुटिल सरकारी भाषा विन्यास वाला पत्र. ब्यूरोक्रेसी उन्हें यथार्थ के मस्लेहत आमेज़ धरातल पर ला चुकी थी. घोड़ा अपने सवार को गिरा चुका था. पत्र में कहा गया था कि वह टिहरी बाँध बनने दें और राष्ट्र हित में अपना अनशन समाप्त करें. वचन और स्वप्न भंग के फलस्वरूप मै सन्नाटे में आकर रुआंसा हो गया. बस इतना ही किया जा सकता है, प्रधान मंत्री ने कहा.

मुझे फिर इंदिरा गांधी, हेमवती नंदन बहुगुणा और मोरारजी देसाई जैसे राजनेता याद आये, जिनसे ऐसे ही मसलों पर हमारा पहले साबका पड़ चुका था, और जिनका कहा पत्थर की लकीर होता था.
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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.