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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: रपट पड़े तो हर हर गंगे…

By   /  August 13, 2013  /  2 Comments

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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक – 12                                                                    पिछली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

दर असल इंदिरा गांधी और हेमवती नंदन बहुगुणा के सिवा कोई भी महत्वपूर्ण नेता टिहरी बाँध को रुकवाने के पक्ष में नही था. बाँध का ठेकेदार पिछले कयी वर्षों से कांग्रेस और भाजपा दोनों को धन वृष्टि कर साध रहा था. कुछ लोग सत्ता से बाहर रहते हुए बाँध का जी तोड़ विरोध करते और फिर सत्ता में आते ही बाँध समर्थक बन जाते या फिर चुप्पी लगा जाते.जॉर्ज फर्नांडिस

जॉर्ज फर्नांडिस नर सिंह राव के शासन काल में, शायद १९९२ में, स्थानीय बाँध विरोधी भाड़े के गुंडों की धमकी और धमाल के बावजूद टिहरी आये और बाज़ार में सार्वजनिक बाँध विरोधी भाषण देकर जनता में जोश भर दिया. लेकिन इसके कुछ ही वर्षों बाद जब वह अटल विहारी वाजपेयी की सरकार में रक्षा मंत्री बने, तो बाँध विरोध की अपनी पिछली प्रतिबद्धता भूल गए. उन्होंने हमारी और से भेजी जाने वाली चिट्ठियों तक का जवाब देना बंद कर दिया.

मुझे जॉर्ज फर्नांडिस साहब का करीब दो दशक पुराना वह सीन हठात याद आ गया, जब मोरारजी देसाई सरकार को गिराने के लिए उन्होंने संसद में चरण सिंह और जनसंघ को जी भर कोसा, और फिर वहाँ से बाहर निकलते ही चौधरी चरण सिंह की कांग्रेस समर्थित सरकार में एक मंत्री के रूप में शपथ ले ली. इसी तरह विश्वनाथ प्रताप सिंह भी १९९५ में टिहरी आये, अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद घंटों वहां रहे, हमारे कैम्प में लकड़ी के चूल्हे पर बना भोजन किया और डाक्टरों के मना करने के बावजूद नल का पानी पीया, रैली को संबोधित किया, और कहा कि वैसे तो प्रधान मंत्री नर सिंह राव से मैं कभी भी बात नहीं करता, लेकिन इस बारे में अवश्य करूंगा.

राजीव नयन बहुगुणा

राजीव नयन बहुगुणा

लेकिन जब वह में ९० प्रधान मंत्री थे, तो अपने ऊर्जा मंत्री को इस बारे में अनाप शनाप बयान देने और पर्यावरण मानकों की अनदेखी कर बाँध का काम जारी रखने की खुली छुट दे दी. यद्यपि इतना सौजन्य अवश्य दिखाया की खुद चुप रहे. मुझे नहीं लगता कि विश्व नाथ जी या जॉर्ज साहब ने टिहरी बाँध के ठेकेदार से औरों की तरह पैसे खाए होंगे, लेकिन यह तो जाहिर है कि अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए ये दोनों सज्जन इस बारे में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता भूल गए. मेनका गांधी अवश्य इस बाँध के विरोध में खुल कर, मंत्री रहते हुए भी आवाज़ उठाती रहीं, लेकिन उनका एक्शन भी जय राम रमेश या दिग्विजय सिंह की तरह होता, जो अपनी सरकार की खामियों पर बोलते तो बढ़ चढ़ कर हैं, पर करते कुछ नहीं.

( जारी )                   अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Kya se kya Ho gaya bewafaaa tere pyarmen.

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