/नमो और कांग्रेस की सोशल मीडिया पर जूतमपैजार…

नमो और कांग्रेस की सोशल मीडिया पर जूतमपैजार…

-सुग्रोव्रर||

जैसे जैसे लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, राजनैतिक दलों की प्रचार गतिविधियाँ बढ़ती चली जा रही हैं. राजनेताओं द्वारा मतदाताओं को गुमराह किये जाने वाली हरकतें कोई नई बात नहीं है,  लेकिन इस बार तो इन नेताओं ने सभी सीमायें लाँघ दी है. लोकसभा चुनावों के मद्दे नज़र इस बार यह राजनैतिक दल सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए हैं और खालिस झूठ, फरेब और ब्लैक हैट तौर तरीकों से सोशल मीडिया पर गन्दगी फैला रहे हैं.fenku express

अपने सैंकड़ों वेतनभोगी कर्मचारियों के ज़रिये भारत में सोशल मीडिया का उपयोग सबसे पहले अरविन्द केजरीवाल ने शुरू किया और सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं के भीतर भ्रष्टाचार के खिलाफ सुलगती हुई चिंगारियों को भड़का कर धधकती आग में तब्दील कर दिया, नतीज़न देश का युवा जन लोकपाल के समर्थन में फेसबुक और ट्विटर पर खुल कर सामने आ गया. यही नहीं जब अन्ना हजारे ने जन्तर मंतर पर अनशन शुरू किया तो देशभर के एनजीओ’ज़ के अलावा सोशल मीडिया पर सक्रिय यह युवा भी सडकों पर उतर आया. अरविन्द केजरीवाल ने भी फेसबुक पर बहुत गंद फैलाया था. जो भी फेसबुक यूजर टीम केजरीवाल के तौर तरीकों का विरोध करता था, केजरीवाल के वेतनभोगी सामूहिक रूप से उस यूजर पर टूट पड़ते थे, उन्हें भ्रष्टाचारी का तमगा ही नहीं मिलता था बल्कि उसकी माँ-बहन से अपने रिश्ते जोड़ कर उसे चुप करवाने की कवायद शुरू हो जाती थी.  आलम यह था कि जो अरविन्द केजरीवाल के तौर तरीकों का समर्थक नहीं, वह देशद्रोही और भ्रष्टाचारी करार दे दिया जाता था टीम अन्ना द्वारा. टीआरपी के चक्कर में नम्बर एक कहे जाने वाले न्यूज़ चैनल आजतक से लेकर छुटभैया न्यूज़ चैनल्स भी टीम अन्ना को चौबीसों घंटे स्क्रीन पर दिखा रहे थे. जिसके चलते टीम अन्ना के हौंसले कुछ अधिक ही बुलंद हो गए थे.

केजरीवाल को फेसबुक पर मिलती सफलता ने बाबा रामदेव को उकसाया और बाबा ने भी अपनी टीम फेसबुक पर उतार दी. बाबा रामदेव ने सबसे पहले फेसबुक पर दिवंगत राजीव दीक्षित को फैलाया तथा सच्चा देशभक्त साबित किया. वाकपटु राजीव दीक्षित के वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करवाए गए और उन्हें फेसबुक पर पोस्ट किया जाने लगा. राजनेताओं और सत्ताधीशों की तुष्टिकरण की नीति से परेशान युवा राजीव दीक्षित के  राष्ट्र भक्ति और स्वदेशी समर्थक वीडियो देख देख कर राजीव दीक्षित का मुरीद हो गया और बाबा रामदेव की दवाइयों और नुस्खों का प्रचार करने लगा. यहाँ तक कि जो राजीव दीक्षित खुद कैन्सर जैसी बीमारी का शिकार होकर असमय काल के ग्रास बन गए, उसी राजीव दीक्षित द्वारा बाबा रामदेव के  कैन्सर से छुटकारा दिलाने के नुस्खों पर बनाये गए वीडियो को फेसबुक पर यह जाने बिना पोस्ट करने लगे कि राजीव दीक्षित ने इन नुस्खों पर विश्वास कर अपनी जान गँवा दी थी और यदि कोई अन्य कैंसर का रोगी इन नुस्खों पर भरोसा जता बैठा तो उसकी भी जान पर बन सकती है.

तब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नमो ने भी अपनी साइबर टीम खड़ी कर दी थी और फेसबुक का हर पन्ना हिंदुत्व, नरेन्द्र मोदी के नाम, फोटो और कारनामों से भर गया. हर तरफ फोटोशॉप पर बनाई गई उलटी सीधी तस्वीरों से फेसबुक अट गई. टीम केजरीवाल हो या टीम रामदेव या फिर टीम आरएसएस और नरेन्द्र मोदी, फेसबुक पर इन सबकी टीम का रवैया लगभग एक सा ही रहा कि जो भी उनका किसी भी तरह का विरोध करे या अपने निष्पक्ष और स्पष्ट विचार अपनी वाल पर पोस्ट करे, उस पर आक्रमण करो, गालियाँ दो, कुतर्क करो और यदि इसके बाद भी वह विरोध करे तो उसकी फेसबुक प्रोफाइल की सामूहिक रिपोर्ट करो ताकि वह फेसबुक यूजर बैन हो जाये.

फेसबुक पर इस तरह के आक्रामक अभियान से इन सबने बहुत से समर्थक भी बटोरे मगर ऐसी गंद फैलाती गतिविधियों को देख कई सामान्य यूजर चुप ही रहे और किसी विवाद का हिस्सा बनने की बजाय अपने मित्रों और रिश्तेदारों तक सीमित हो गए. लेकिन सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही यह गन्दगी थमी नहीं है बल्कि जैसे जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं वैसे वैसे यह गंदगी अपना विकराल रूप धारण करती जा रही है. फेसबुक पर अफवाहों, असत्य तथ्यों और गाली गलोच का बाज़ार गर्म है. यहाँ तक कि एतिहासिक तथ्यों को बदलने का प्रयास चल रहा है.

नरेन्द्र मोदी द्वारा हैदराबाद रैली में इस्तेमाल किये गए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जुमले “यस, वी कैन, वी विल डू” को टीम आरएसएस और नरेन्द्र मोदी स्वामी विवेकानंद का जुमला साबित करने पर उतारू हो गई है. जबकि सत्य कुछ और ही है. स्वामी विवेकानंद द्वारा अमेरिका के शिकागो शहर में दिए गए पूरे व्याख्यान में “यस, वी कैन, वी विल डू” है ही नहीं. स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो की धर्म संसद में दिए गए  व्याख्यान का शब्दानुशः पाठ इस  लिंक में पढ़ा जा सकता है.

स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया व्याख्यान पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

इसके अलावा किसी अन्य की आवाज में इस वीडियो में इस व्याख्यान को सुना जा सकता है.

यहाँ सवाल यह नहीं है कि नरेन्द्र मोदी ने यह जुमला क्यों इस्तेमाल किया. इस जुमले पर किसी का कोई कॉपीराइट भी नहीं है और न पेटेंट. सवाल इतना सा है कि इसे स्वामी विवेकानंद का जुमला बताने की कोशिश क्यों कर रही है टीम मोदी? क्या झूठ की बुनियाद पर खड़ी की गयी इमारत मज़बूत हो सकती है?

दशकों पहले इसी देश में गणेश जी की मूर्तियों को दूध पिला चुकी आरएसएस के कहने में इस देश के भोले भाले युवा जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास से परिचित ही नहीं, तो आ सकते हैं मगर वे लोग नहीं जो इनकी रग रग से वाकिफ हैं. चिंता की बात यही है कि हमारे देश के युवाओं को झूठ और फरेब के सहारे बरगलाया जा रहा है. जब उनका विश्वास टूटेगा तो वे किसी पर भी आसानी से विश्वास करने की स्थिति में नहीं होगें.

कांग्रेस भी कोई कम नहीं है. कांग्रेस ने भी अपनी साइबर टीम सोशल मीडिया पर उतार दी है. नरेन्द्र मोदी की हैदराबाद रैली से ठीक पहले फेंकूएक्सप्रेस नामक वेबसाईट खड़ी कर फेंकूएक्सप्रेस को ट्विटर पर ट्रेंड बनवाने के लिए बाकायदा रोबोट सॉफ्टवेयर बनवाया गया तथा इस सॉफ्टवेयर के ज़रिये लाखों फर्जी ट्विटर एकाउंट बनाये गए और फेंकूएक्सप्रेस को टैग कर करोड़ों ट्विट और रिट्विट करवाए गए ताकि ट्विटर पर ट्रेंड बना कर ट्विटर यूजर्स तक फेंकूएक्सप्रेस पहुंचाई जा सके.

अभी तो सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा में युद्ध की शुरुआत हुई है मगर इस तरीके की हरकतों से वास्तविक सोशल मीडिया यूजर्स परेशान भी हैं तो इन दोनों राजनैतिक दलों द्वारा एक दूसरे पर किये जा रहे वार को देखने के लिए उत्सुक भी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.