/वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला को ब्रेन स्ट्रोक…

वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला को ब्रेन स्ट्रोक…

-पलाश विश्वास||

यशवंत सिंह की बुराई में लोग कुछ भी कहें, लेकिन यह सच है कि मीडिया के अंतर्महल के घिनौने सामाजिक वास्तव को उसने बेपर्दा कर दिया है और इसके लिए उसकी जितनी तारीफ की जाये, कम है.

पहले हमें मीडिया में अपने साथियों के बारे में कोई खबर होती नहीं थी, बाकी दुनिया की चाहे हम खबर लेते रहे हों, अब हमें अपने लोगों के सुख दुख की जानकारी हो जाती है और हम चाहें तो अपने साथी के हक में खड़ा हो सकते हैं.Jagmohan_Phutela

यशवंत के जेल से लौटने के बाद भड़ास के अपडेट से कोई कोना अब बचा नहीं है.

य़शवंत, अमलेंदु,  अविनाश, फुटेला और दूसरे साथियों का ही करिश्मा है कि बिल्कुल नहीं छपने वाल हम जैसे लोग अब पाठकों के साथ अनवरत संवाद करने की हालत में हैं.

ऐसे ही एक हमारे बड़े सिपाहसलार जगमोहन फुटेला है, जिसका घर उत्तराखंड नें मेरे घर से ठीक सोलह किमी की दूरी पर है.हमारी तरह वे भी जनसत्ता में काम करते रहे हैं.हमारी तरह वे भी वीरेन दा के साथ काम करते रहे हैं.

अभी अभी फुटेला कैंसर से लड़कर उसे परास्त कर अपने मोरचे पर लौटा है.

मैं अवाक था कि कई दिनों से जर्नलिस्ट कम्युनिटी में अपडेट नहीं हो रहा है. अब हमें भी सोशल मीडिया की मुसीबतों के बारे में मालूम है. कैसे कैसे ये लोग अलख जगाये हैं, उसका अंदाजा है. मोहल्लालाइव की अपडेट बारंबारता अब लगभग शून्य के नीचे जाने को है. अमलेंदु का सर्वर भी कभी कभार फेल हो जाता है. जनज्वार भी बहुत तेज अपडेट नहीं कर पाता. यही हाल विस्फोट का है. हस्तक्षेप, भड़ास और मीडिया दरबार को छोड़कर अपडेट निरंतरता एक बड़ी समस्या बनी हुई है.

फुटेला को इसलिए मेंने फोन नहीं लगाया और उम्मीद कर रहा था कि जल्दी ही समस्या सुलझ जायेगी. बीच में तीन चार दिन के लिए भुवनेश्वर चला गया था.आज वापसी के बाद भड़ास खोला तो बुरी खबर मिली.

हां, चंडीगढ़ से बुरी खबर है. वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार जगमोहन फुटेला को ब्रेन स्ट्रोक हुआ है. घटना छह अगस्त की है. उन्हें चंडीगढ़ में अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उनके नजदीकी लोगों का कहना है कि कई दिनों के इलाज के बाद फिलहाल वे खतरे से बाहर हैं लेकिन ब्रेन स्ट्रोक के साइड इफेक्ट बरकरार हैं.

जगमोहन फुटेला ने अभी हाल में ही हरियाणा से शुरू होने वाले एक चैनल के संपादक पद से इस्तीफा दिया था और चैनल के अंदर की गड़बड़ियों को उजागर करते हुए बेबाक लेख लिखे थे. जगमोहन फुटेला लंबे समय तक दैनिक जागरण में रहे. जागरण प्रबंधन द्वारा किए गए अन्याय के खिलाफ उन्होंने कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की. उन्होंने जर्नलिस्टकम्युनिटी डाट काम की स्थापना कर मीडिया और राजनीति के कई स्याह पक्षों के बारे में विश्लेषणात्मक लेख लिखा करते हैं और अन्य लोगों की अभिव्यक्ति को भी मंच प्रदान करते हैं.

जगमोहन फुटेला के ब्रेन स्ट्रोक की खबर मिलते ही उनके जानने वाले लोग अस्पताल पहुंचने लगे और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की दुवाएं की. जगमोहन फुटेला के पुत्र अभिषेक उनकी देखरेख में लगे हुए हैं. परिवार के अन्य सदस्य भी मुकम्मल इलाज के लिए सक्रिय हैं. बताया जाता है कि पहले वे मैक्स अस्पताल में एडमिट कराए गए थे. बाद में उन्हें पीजीआई ले जाया गया. भड़ास4मीडिया जगमोहन फुटेला के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता है और चंडीगढ़ के पत्रकारों से अपील करता है कि फुटेला जी के बेहतर इलाज के लिए हर संभव सक्रियता दिखाएं.

यशवंत की यह पहल काबिले तारीफ है.फुटेला से उसके हाल में थोड़े मतभेद हो गये और मैं अपने प्रिय दो मित्रों और अपने मोर्चे के दो सबलसे अच्छे लड़ाकों के मतभेद से खासा चिंतित रहा हूं.

अब जैसे इस मामले में पहल करके यशवंत ने बड़े दिल का नमूना पेश किया है,मुझे उम्मीद है कि फुटेला के स्वस्थ होकर लौटते ही रही सही गलतफहमियां भी दूर हो जाएंगी और हम लोग मिलजुलकर वैकल्पिक मीडिया के मिशन को आगे बढ़ायेंगे.

अपने वीरेन दा पहले से बीमार चल रहे हैं और अब फुटेला भी अस्पताल में हैं.जैसाकि यशवंत की गिरफ्तारी के वक्त हम सबने एकजुटता दिखायी ,उसी तरह फुटेला का इलाज सही तरीके से हो,अड़ोस पड़ोस के मीडियाकर्मी िसका जरुर ख्याल रखेंगे ,ैसी उम्मीद है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.