Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

आखिर क्या चाहती है हमारी संसद…

By   /  August 14, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

– अनुराग मिश्र||

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम् फैसले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8 (4) को समाप्त कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष सब मे खलबली मची हुई है. सब ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की तीव्र आलोचना की. कुछ ने तो सुप्रीम कोर्ट को अपने हद में रहने की नसीहत तक दे डाली. ऐसे में विचार करने योग्य प्रश्न ये है कि आखिर ऐसी परिस्थितयां क्यों बन रही है जहाँ हमारे संविधान का एक अंग विधायिका संविधान के दूसरे अंग न्यापालिका पर सख्त टिप्पणी कर रहा है. इस विषय पर वार्ता करने से पहले ये जान लिया जाये कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8 (4) है क्या? क्यों सुप्रीम कोर्ट ने इसे समाप्त कर दिया?indian-parliament

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (4) कहती है कि कोई भी जनप्रतिनिधि किसी भी मामले में दोषी ठहराए जाने की तिथि से तीन महीने की तिथि तक और अगर दौरान वो अपील दायर करता है तो उसका निबटारा होने तक अपने पद के अयोग्य घोषित नहीं होगा . जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की इसी धारा को सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई 2013 को ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा आठ (4) संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार पर खरी नहीं उतरती. कोर्ट ने यह भी कहा कि हमें अनुच्छेद 14 तक जाने की जरूरत ही नहीं है क्योकि संविधान के अनुच्छेद 102 तथा 191 के तहत संसद को इस प्रकार का कानून बनाने की इजाजत ही नहीं है.

अब सवाल ये उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के दायरे में रहकर अपना निर्णय सुनाया तो फिर टकराव कहाँ हो रहा है? इस सवाल का जवाब पाने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि न्यापालिका और विधायिका के अधिकारों के संदर्भ में संविधान में कहा क्या गया है?

26 जनवरी 1949 को स्थापित हमारे संविधान में लोकतंत्र के तीनो स्तम्भ विधायिका, न्यापालिका और कार्यपालिका को कई विशेषधिकार दिए गए हैं जिसके तहत ये तीनो ही एक दूसरे कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते है. विधायिका का काम है राज्य के कल्याणकारी हितों के संदर्भ में कानून बनाना, कार्यपालिका का काम है उन कानूनों को सुचारू रूप से क्रियान्वित करना और न्यापालिका का काम है उन कानूनों की समीक्षा करना कि वो संवैधानिक भावनाओ के अनुरूप है या नहीं. अर्थात वो राज्य की कल्याणकारी सोच को पूरा करते है कि नहीं.  वस्तुतः यही से न्यापालिका और विधायिका में टकराव की शुरूआत होती है.

आज के दौर में भ्रष्ट होती राजनीत ने संसद को लोकतंत्र के मंदिर से स्वःहित के  मंदिर में परिणित कर दिया हैं जहाँ बैठे राजनैतिक दल और उनके जनप्रतिनिधि अपने हितों के अनुरूप संविधान द्वारा निर्मित कानूनों में या तो संशोधन करवा रहे है या फिर अपनी मंशा के अनुरूप नये कानून बनवा रहे है, जिसका आम आदमी के हितों से कोई विशेष सरोकार नहीं है. अब चूँकि संविधान की रक्षक और समीक्षक हमारी सुप्रीम कोर्ट है, लिहाजा वो संसद द्वारा निर्मित कानून की समीक्षा कर सकती है. यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा निर्मित कानूनों की समीक्षा संविधान की उद्देशिका व उसकी आत्मा के अनुरूप, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के आलोक में करती है, और इस समीक्षा की प्रक्रिया में यदि उसे ये लगता है कि संसद अथवा राज्य की किसी विधानसभा द्वारा पारित कानून, नियम, उपनियम, अध्यादेश, शासनादेश, संविधान की मंशा, उसकी उद्देशिका अथवा कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत है तो वो उसें खण्डित कर सकती है और राज्य सरकार अथवा केन्द्र सरकार को नये सिरे से कानून बनाने के लिए दिशा र्निदेश जारी कर सकती है.

ताजा मामले में बात यही पर आकर फंस रही है विधायिका का कहना है कि जनप्रतिनिधि अधिनियम को हमें किस रूप में रखना है ये हमारा स्वविवेक है इसमें राज्य की लोक कल्याणकारी नीति भावनाओ का कोई उल्लंघन नहीं है जबकि न्यापालिका का कहना है कि यह अधिनियम राज्य की लोक कल्याणकारी नीति भावनाओ के अनुरूप ही होना चाहिए क्योकि जन प्रतिनिधि जनता चुनती है. अब इसमें आगे क्या होगा ये तो सरकार द्वारा दाखिल की गयी पुनः विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आने वाले दिनों में दिए जाने वाले निर्णय के बाद ही पता चलेगा.

पर यहाँ अहम सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से माननीय सांसदगणो को समस्या क्या है? सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर पुनः विचार याचिका दाखिल करके क्या सिद्व करना चाहती? क्या वह यह बताना चाहती है कि वो लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नही चलेगी और दागी, अपराधी होने के बावजूद भी  जनप्रतिनिधि अपने पद पर बना रहेगा. संसद व राजनैतिक दलो की ये सोच भविष्य में हमारी लोकतंत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा है खासकर ऐसे समय में जब सारे राजनैतिक दलों के माननीय नेताओं की सोच पूरी तरह से व्याक्तिवादी हो गयी हो और वो कमीशनखोरी, अवैध खनन से लेकर अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए लोकतंत्र की समस्त संस्थाओं को अपना चिर गुलाम बनाने के लिए पूर्णतयः उद्यत हों.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

पाकिस्‍तान ने नहीं किया लेकिन भाजपा ने कर दिखाया..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: