/अग्निकुंड में खिला गुलाब, शहीद महादेव भाई देसाई…

अग्निकुंड में खिला गुलाब, शहीद महादेव भाई देसाई…

15 अगस्त देश की आजादी का दिन है और साथ ही  ‘अंग्रेजों भारत छोडो आंदोलन’ के पहले  शहीद महादेव भाई देसाई की कुरबानी का भी. 15 अगस्त 1942 के दिन महादेव भाई  पुणे के आगा खान महल, जिसे कंटीले तारों से घेर कर जेल बनाया गया था,  में महात्मा गांधी की गोद  में सर रख स्वर्ग सिधारे. महादेव भाई ने अपने जीवन का आधा भाग महात्मा गांधी की सेवा में बिताया. उन्होंने गांधीजी के सचिव के तौर पर 1917 नवम्बर से 15 अगस्त 1942 तक काम किया. महादेव भाई गांधी जी के सचिव के साथ साथ गांधी जी के पत्र यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन साप्ताहिक के संपादक भी थे. उन्होंने पत्रकारिता के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम 1921 की 22 दिसंबर को उठाया जब उन्होंने इलाहाबाद से द इंडिपेंडेंट अखबार की हस्त लिखित प्रति निकाली.mahadev bhai desai

इसके लिए उन्हें एक साल की सश्रम कारावास की सजा हुयी. नैनी जेल में राजनैतिक कैदियों पर लगातार ढाए जा रहे जुल्म और बर्ताव पर महादेव भाई ने एक जीवंत और करारा लेख लिखा जिसे गांधीजी ने नवजीवन तथा यंग इंडिया में प्रकाशित किया. इस लेख की वज़ह से ब्रिटिश हुकूमत को जेल सुधार के लिए कई कदम उठने पर मजबूर भी होना पड़ा.

महादेव भाई  ने अंग्रेजी और गुजराती में 6000 से अधिक लेख लिखे और बारडोली सत्याग्रह, त्रावणकोर मंदिर में हरिजन प्रवेश की गाथा एवं अब्दुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान की जीवनी तथा अहमदाबाद मिल मजदूरों की अहिंसक और सफल लड़ाई का इतिहास भी लिखा.

भारत की प्रथम समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ऑफ़ इंडिया के महादेव भाई गांधी कैंप संवाददाता भी थे.

यही नहीं महादेव भाई अखिल भारतीय अखबार के संपादकों के सम्मेलन की स्थाई समिति के सदस्य भी थे.

आज़ादी पाने के लिए खुद को कुर्बान कर देने वाले पत्रकारों के पितामह महादेव भाई देसाई को टीम मीडिया दरबार और  पाठकों की तरफ से हार्दिक श्रद्धांजलि.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.