Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

अंबानी की मीडिया कंपनी की छंटनी के शिकार एक पत्रकार के नाम खुला पत्र…

By   /  August 17, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

भड़ास 4 मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ने नेटवर्क 18 से छंटनी कर निकाले गए मीडिया कर्मियों के नाम एक खुला पत्र लिखा है.. इस पत्र को हम जस का तस मीडिया दरबार पर भी प्रकाशित कर रहे हैं…

मेरे प्रिय साथी…. सलाम… नेटवर्क18 में कल तक काम करने वाले मेरे प्रिय साथी, तुम्हें बड़े भारी मन से पत्र लिख रहा हूं.. हालांकि, सोच तो रखा था कि चिट्ठी पत्री लिखने-लिखाने से कुछ नहीं होता क्योंकि जब तुमने अपने पत्रकारीय जीवन की गति को आम जन की बजाय पूंजी व पूंजीवादी जन की गति से जोड़ लिया था तो उसी समय से हम लोगों में फासला क्रिएट हो गया था.. तुम्हारे तर्क कुछ वैसे ही हुआ करते थे जैसे राजदीप सरदेसाई और आशुतोष के तर्क हुआ करते हैं. कारपोरेट और पूंजी की वकालत करते तुम्हारे तर्क मुझे अजीब लगते, लेकिन क्या करें, न तुम समझने को तैयार थे और न मैं तुम्हारी बात मानने को तैयार था…yashwant-singh-bhadas

पर आज जब पता चला कि अब तुम उस चैनल में चाह कर भी नहीं रह सके, पूंजीपति ने निकाल बाहर कर दिया तो मुझे कुछ कहने का मन हुआ… खुला पत्र लिखकर कह रहा हूं, ताकि बात हमारे-तुम्हारे जैसे दूसरे पत्रकार साथियों तक भी पहुंचे और हम सब जब पढ़ने लिखने कहने के पेशे में हैं तो अपनी बात, अपनी भावना को पब्लिक डोमेन में रखें जिससे दूसरे भी अपनी राय बना सकें, अपनी राय दे सकें…

हां, तो मैं कह रहा था कि चैनल चलाने के लिए जिस पूंजी की वकालत करते तुम नहीं थकते थे… तुम्हारे जैसे मीडियाकर्मी भाई नहीं थकते थे, उसी पूंजी ने बलि ले ली… मुकेश अंबानी जैसे बड़े सेठ के हाथों बिकने के बाद भी पूंजी की किल्लत क्यों आ गई भाई? आखिर जब 4800 करोड़ रुपये लगाकर नेटवर्क18 पर मुकेश अंबानी नियंत्रण हासिल कर लेता है तो वह पूंजी समर्थक लेकिन बेचारे (बीच हारे या बेच हारे) मीडियाकर्मियों को क्यों निकाल देता है? उसके पास तो पूंजी की कमी नहीं थी, फिर क्यों कर छंटनी का रास्ता अपनाना पड़ा?

जवाब सीधा है भाई.. ये पूंजीपति पहले हमारे आपके दिमाग को अपने पूंजी नियंत्रित तर्कों से भ्रष्ट करते हैं, हमारी चेतना, सरोकार, स्वाभिमान को कुंद करते हैं, फिर जब हम उनके हो गए लगते हैं तब वे हमारे पर वार करते हैं.. इसे ही कहते हैं न घर का न घाट का. और, आप तो गदहा बन ही गए जनाबेआली… सोचिए, अगर आपने पत्रकारिता को जनपक्षधर बनाए रखा होता, पूंजी के खेल में न फंसे होते तो इस मुकेश अंबानी की आज औकात न होती कि आपको यूं दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकता… वो आपके तेवर, आपके सरोकार, आपको जनसमर्थन के भय से आपके चरणों में पड़ा रहता..

बड़ी बारीक रेखा होती है सरोकारी पत्रकारिता और कारपोरेट जर्नलिज्म के बीच और उस लक्ष्मण रेखा को लांघते ही जो खेल शुरू होता है उसका दर्दनाक अंत ऐसे ही होता है पार्टनर.. आप लोगों को फायर किए जाने से दुखी हम लोग भी हैं, पर संतोष ये है कि हम लोग आपकी आवाज बुलंद कर पा रहे हैं, पर आप तो हम लोगों को अपना कभी माने ही नहीं… क्योंकि हम लोग पूंजी के खेल में नहीं हैं, इसलिए हम लोग आपकी नजर में हमेशा फालतू, न्यूसेंस क्रिएट करने वाले, सड़कछाप, अनार्किस्ट, और न जाने क्या क्या नजर आते थे..

यही कारण है कि न्यू मीडिया की पत्रकारिता करते हुए, छोटे मंचों, बिना पूंजी के मंचों के जरिए साहस और सरोकार की पत्रकारिता करते हुए जब-जब हम लोगों के सामने मुश्किलें आईं तो आप लोग हंसे, तिरस्कृत किया, उपहास उड़ाया, दूरी बनाए रखने में भलाई समझी..

पर आप जब मुश्किल में पड़े हैं तो आपको मुश्किल में डालने वालों के खिलाफ हम लोग बोल रहे हैं, लड़ रहे हैं, आवाज उठा रहे हैं, ललकार रहे हैं, रातों की नींद खराब कर रहे हैं… साथी, अगर पत्रकारिता करने आए थे तो पत्रकारिता ही करते.. जब लगा था आपको कि अब पत्रकारिता नहीं पेटपालिता कर रहे हैं, तभी आपको अपना रास्ता अलग बना लेना चाहिए था, आपको न्यू मीडिया को अपना लेना चाहिए था, पेट पालने के लिए ठेला लगाने से लेकर दुकान खोलने तक और पीआर एजेंसी चलाने से लेकर लायजनिंग कर लेने तक का काम कर लेना चाहिए था पर पत्रकारिता के नाम पर पूंजी के खेल और टर्नओवर के गेम से आपको बाहर निकल लेना चाहिए था….

पर आप ठहरे ज्यादा चालाक, तेज, बुद्धिमान और शातिर, सो आप को हमेशा खुद पर भरोसा रहा कि आप का कुछ न होगा क्योंकि आप बास को खुश रखने की कला जानते हैं, नौकरी चलाते रहने बजाते रहने के तौर-तरीके सारे के सारे अपनाते हैं… और जब जब छंटनी की बात चली चर्चा उड़ी तो आपको हमेशा लगा कि आपका नहीं बल्कि आपके पड़ोसी की छंटनी होगी, और आप बच जाएंगे.. पर इस बार ऐसा नहीं हुआ… अबकी आप को भी जाना पड़ा…

वो लोग जो बच गए हैं और अपनी खैर मना रहे हैं, वो लोग भी आपसे अलग नहीं हैं… पर उन्हें इस बार जब बच जाने पर लग रहा है कि वे तो अतीव मेधावी हैं, उनका कभी बाल बांका नहीं होगा, हमेशा बचे रहेंगे, और छंटनी किन्हीं दूसरे बेचारों की होती रहेगी, तो वो भी आपके ही जैसे जीव हैं, जो देर-सबेर आप जैसी हालत में आएंगे… पर क्या करें हम आप और वो.. क्योंकि हम आप और वो एक होते ही नहीं.. पत्रकारिता को पोर्नकारिता, पूंजीकारिता, पेटपालिता, पक्षकारिता के रूप में स्वीकार करके हम आप और वो अपने अपने रास्ते अलग-अलग कर लेते हैं…

ऐसे में आज नहीं तो कल, हम सबको सोचना ही पड़ेगा कि आखिर क्यों एक सेठ, एक पूंजीपति इतने बड़े कहे जाने वाले चौथे खंभे के पिछवाड़े जोर से लात मारता है और हम सब औंधे मुंह गिर कर धूल झाड़ते हुए उठ जाते हैं और बिना एक शब्द मुंह से निकाले अपने अपने घरों की ओर चले जाते हैं… हाय, ये क्यों हुआ… मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ की कुछ लाइनें याद आ रही हैं…. पढ़िए और सोचिए साथी…

ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया ?
जीवन क्या जिया !!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में कनात से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

दु:खों के दाग़ों को तमग़े सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,

अब तक क्य किया,
जीवन क्या जिया!!

बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गए
करूणा के दृश्यों से हाय ! मुंह मोड़ गए
बन गए पत्थर
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया
दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम !
लोक-हित पिता को घर से निकाल दिया
जन-मन करूणा-सी मां को हकाल दिया
स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया
भावना के कर्तव्य त्याग दिये,
हॄदय के मन्तव्य मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ ही उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए फंस गये,
अपने ही कीचड़ में धंस गये !!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में,
आदर्श खा गये.

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया !!
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया, दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम !

चलो, जो हुआ सो हुआ. अब इत्मीनान से सोचना. फिर कुछ ऐसा करना जिससे तुम्हारी आत्मा को संतोष हो और घर पर परिवार को जीने-खाने के लिए जरूरी पैसे मिल जाएं… यह बड़ा भारी काम नहीं है.. बस अपने खर्चे सीमित करने होंगे और लगकर, जुटकर एक दिशा में काम करना होगा.. करने वालों के लिए इसी दुनिया में बहुत कुछ बचा है करने के लिए है, रखा है रचने के लिए.. न करने वालों के लिए कहीं कोई आप्शन नहीं होता…

तुम जो भी करोगे, मैं तु्म्हारे साथ रहूंगा और तन-मन-धन जैसे भी कहोंगे, वैसे मदद करूंगा, बस एक आखिरी अनुरोध करूंगा कि अबकी पत्रकारिता ही करना, भले एक ब्लाग बनाकर या फेसबुक पर लिख लिख कर या भड़ास निकाल कर… पेट पालने के लिए कोई और काम कर लेना.. पर पत्रकारिता और पापी पेट और पूंजी के कुतर्क को एक साथ मत फेंट देना… क्योंकि इसका जो घोल बनेगा न, वह कल को हमारे तुम्हारे जैसों के बच्चों को ज्यादा तकलीफ देगा.. गलत के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं होगा क्योंकि सारे गलत करने वाले शासन-सत्ता-उद्योग-सरकार-शासन के सर्वेसर्वा होंगे… ऐसे में अपने वो शुरुआती दिन याद करो जब यह कहते हुए पत्रकारिता में आए थे कि इसके जरिए समाज को दिशा दोगे, गरीबों की मदद करोगे, अत्याचारियों को उखाड़ फेंकोगे… तो, वही करना जो सोच कर आए थे..

इस मुश्किल दौर में मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं मित्र. जो हुआ सो हुआ. अब तुम पीत-पत्रकारिता वाला रास्ता मत पकड़ना. हम सब मिल कर लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के खिलाफ…

तुम्हारा दोस्त,

यशवंत,

जिसे तुम लोग पागल, झक्की, भड़सिया, भड़भड़िया, शराबी, बवाली.. और ना जाने क्या-क्या कहते हो..

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: