/मिनी माता की पाती…

मिनी माता की पाती…

-गौरव शर्मा `भारतीय`||

मैं मिनी माता… वही मिनी माता जिसकी मौत 11 अगस्त 1972 को हो गई थी. आज मेरे भतीजों (डॉ. महंत के अनुसार उनके स्वर्गीय पिता बिसाहूदास महंत को मिनी माता राखी बाँधा करती थी इस लिहाज से मिनी माता डॉ. महंत की बुआ मानी जाएँगी और महंत के ही अनुसार जोगी उनके बड़े भाई हैं तो मिनी माता उनकी भी बुआ मानी जाएँगी) ने मुझे अंतर्कलह, गुटबाजी और विषवमन का माध्यम बनाकर एक बार फिर जीवित कर दिया है या शायद मेरे विचारों, मेरे सिद्धांतों और भावनाओं का गला घोंटकर मुझे फिर से मार दिया है… आप जो समझना चाहें समझ सकते हैं!mini

मेरी मौत के बाद से अब तक मेरे भतीजे को मेरी पुण्यतिथि मनाने की याद नहीं आई पर इस बार प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बनने के बाद उसने चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए प्रदेशभर में मेरी पुण्यतिथि मनाने का ऐलान कर दिया है. जोर-शोर से पूरे प्रदेश में मेरी पुण्यतिथि मनाई जा रही है पर मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ कि पुण्यतिथि के मंच से प्रदेश को आगे बढाने और सर्वहारा वर्ग की चिंता के स्थान पर हाथ पैर काटने और आखें फोड़ने का संदेश क्यों दिया जा रहा है?

मैंने तो समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया था. जातियों के भेद को मिटाकर हर वर्ग को सम्मान से जीने का हक़ देने की बात की थी पर आज मेरे तथाकथित भतीजों ने मेरे ही नाम को जातियों को बाँटने और जहर उगलने का हथियार बना लिया ? आज मैं यह सोचने पर भी मजबूर हूँ कि आखिर मैंने ऐसी कौन सी गलती की थी जिसकी सजा मुझे मेरे मरने के बाद भुगतनी पड़ रही है?

क्या समाज से छुआ-छूत मिटाने का प्रयास करना मेरी गलती थी या एकता का संदेश देकर मैंने गलती की? जो समाज मुझे अपना कहकर मेरी पुण्यतिथि के बहाने राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहा है उसे तो मैंने सम्मान और स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा दी थी. फिर आज क्यों आँख फोड़ने और हाथ पैर काटने की धमकी देने वाले निरंकुश नेता के चरणों में उस स्वाभिमान और सम्मान को गिरवी रखा जा रहा है.

मेरा बड़ा भतीजा चीख चीख कर कहता है कि मिनी माता के कामों को आगे बढ़ाना है… तो क्या लोगों के हाथ पैर काटकर और आँखें फोड़कर मेरे बचे कामों को आगे बढ़ाया जा रहा है? राजनीति मैंने भी की थी पर कभी किसी के खिलाफ विषवमन नहीं किया. मेरे ज़माने में भी गुटबाजी और आपसी मतभेद थे पर कभी किसी नेता ने हाथ पैर काटने की धमकी नहीं दी और न अपने स्वार्थ के लिए लोगों को आपस में लड़ाने का काम किया. उस समय भी प्रदेश में विद्या भैया और श्यामा भैया जैसे नेता थे जिन्होंने आपसी मतभेद के बावजूद कभी किसी के खिलाफ जहर नहीं उगला. किसी के मान सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने का काम नहीं किया. विद्या भैया भी कांग्रेस छोड़कर गए पर उन्होंने किसी के खिलाफ कड़े शब्द कहे ऐसा मुझे याद नहीं. श्यामाचरण जी को तो पार्टी से एक-दो नहीं बल्कि पूरे बारह वर्षों तक अलग रहना पड़ा पर न उन्होंने कभी किसी के खिलाफ कुछ कहा और न आक्रोश ही प्रकट किया. जवाहरलाल नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस में जीवन भर मतभेद रहे पर जवाहर लाल नेहरु मरते दम तक बोस की पत्नी एमिली शेंकेल बोस की मदद करते रहे. सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा गाँधी की मर्जी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीते भी पर गाँधी जी के सम्मान के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

मैंने उस दौर की राजनीति देखी थी और मुझे भ्रम था कि मेरी मौत के बाद भी राजनीति वैसी ही होगी पर मेरे भतीजों ने दिखा दिया कि आज की राजनीति कालिख की राजनीति है. मुझे ख़ुशी है कि मेरी मौत विमान दुर्घटना में ही हो गई थी वर्ना जो लोग मेरी मौत के बाद मेरे नाम और मेरे विचारों को मारने पर तुले हैं क्या वे जीते जी अपने लाभ के लिए मेरा गला नहीं घोंट देते ? बहरहाल जाते-जाते अपने ढाई करोड़ बच्चों को यही संदेश देना चाहती हूँ कि चाहे मेरे तथाकथित भतीजे जो भी कहें या करें पर एकता अखंडता और भाईचारे के उस पाठ को कभी मत भूलना जिसे सीखाने के लिए मैंने जीवन भर संघर्ष किया और अंत में अपने प्राणों की आहुति दे दी.

जय सतनाम.

तुम्हारी अपनी मिनी माता.

(लेखक छत्तीसगढ़ के युवा पत्रकार व साहित्यकार हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.