/मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: जिस धज़ से कोई मक़तल को गया…

मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: जिस धज़ से कोई मक़तल को गया…

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक -18                                                                            पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा|| 

दरअसल अपहरण का यह सरकारी षड्यंत्र केंद्र सरकार के आदेश पर लगभग एक सप्ताह से चल रहा था. उत्तरप्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती ने इस मामले में हाथ डालने से शायद इनकार कर दिया था , इस लिए सारा ओपरेशन सीधे केंद्र के इशारे पर चल रहा था.हमें इसकी कोई भी भनक नहीं थी.SUNDERLAL_BAHUGUNA

टिहरी का डी एम् इस प्रस्तावित योजना से घबराकर छुट्टी चला गया, और षड्यंत्र का ज़िम्मा एक ए डी एम ने संभाला, जो अव्वल दर्जे का शरीर और फ़ितनागर था. वह अभी उत्तराखंड सरकार में सचिव के रूप में तैनात है. मौक़ा मिलते ही उसे अपने मित्र हरक सिंह रावत से पिटवाऊंगा, जो बिगडैल नौकरशाहों को उन्ही के दफ्तर में कमरे की कुण्डी बंद कर ओवर हालिंग करने के विशेषज्ञ हैं.

खैर तत्कालीन डी. एम. मुझे दो साल पहले अल्मोड़ा सर्किट हाउस में मिला, जब हम अगल बगल के कमरों में ठहरे थे. मैंने पूछा – मेरे बुज़ुर्ग मित्र उस वारदात पर कुछ ज्ञान बढ़ाओ मेरा. अरे बस याद ही न दिलाओ भाई, वह सिहर उठे.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

खैर , मौके पर तनाव बढ़ता देख, घटना स्थल पर तैनात एस डी एम ने एक जीप हमारे हवाले कर दी. उसे भी इतना ही पता था की एक डाक्टर, मजिस्ट्रेट और भारी पुलिस बल के साथ देहरादून के जुली ग्रांट हवाई अड्डे की तरफ ले गए हैं. मैंने ड्राइवर को किल्ली दाबने को कहा. अँधेरा अभी तक भरपूर था. डेढ़ घंटे बाद हमने पुलिस के डी. एस. पी. की गाडी को ओवर टेक किया, तो उसने हैरत और क्रोध से हमारी और घूर की. आखिर आका की गाडी को ओवर टेक करने की हिम्मत कौन दिखा रहा है. मैंने उसकी और मुंह करके पान मसाले की पीक थूंकी.

आधा घंटे बाद टिहरी से ऋषिकेश के रास्ते में आगराखाल नामक जगह पर अपने दल बल के साथ एस. डी एम भी चाय पीता मिल गया. रात भर के उनींदे पन और इस अप्रिय आपरेशन में फंसने के कारण वह भी बुरी तरह से बौखलाया हुआ था. सुधांशु धुलिया की उससे हाथा पाई की हद तक ज़ोरदार झड़प हुयी. उसने फिर भी वस्तुस्थिति की कोई जानकारी नहीं दी. हम एस डी एम को वहीँ छोड़ सरपट आगे बढ़े. कुछ दूर नरेंद्र नगर के बाद एक ढलान पर हमें सरकारी एम्बुलेंस सड़क के किनारे खडी मिली. उसके चारों और पुलिस का घेरा था. पास में ही एक नाली में मेरे पिता निर्वस्त्र और लहू लुहान हालत में पड़े मिले. सुधांशु धुलिया फफ़क पड़े.

( जारी )

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.