/मालिनी अवस्थी ने ठुकराया भोजपुरी अकादमी का प्रस्ताव…

मालिनी अवस्थी ने ठुकराया भोजपुरी अकादमी का प्रस्ताव…

अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत बनाने का दिया गया था प्रस्ताव..चयन पर हुई आलोचना से खिन्न होकर प्रो रविकांत दुबे को भेजी चिट्ठी के ज़रिये अस्वीकृति…

-अतुल मोहन सिंह||

लखनऊ. बिहार भोजपुरी अकादमी के की ओर से देश तथा विदेशों में भोजपुरी के विकास, संवर्धन, और प्रचार प्रसार क लिए लोकगायिका मालिनी अवस्थी को अकादमी की ओर से अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत बनाये जाने की पेशकश की गई थी. जिसको लेकर भोजपुरी पर काम कर रहे ठेकेदारों और संगठनों की ओर से लगातार इसका उपहास उड़ाया जा रहा था. अपने ऊपर लगने वाले इन आरोपों से क्षुब्ध होकर उन्होंने रविवार को अपनी ओर से पत्र लिखकर पदभार गृहण करने की अनिच्छा जाहिर की हैmalini avasthi

अकादमी के अध्यक्ष प्रो रविकांत दुबे को भेजे गए पत्र में उन्होंने अपनी इस पीड़ा का भी जिक्र किया है. खत को जिस भाषा में लिखा गया है उससे एक भोजपुरी के लिए काम करने वाले के दिल पर लगी चोट के दर्शन होते हैं. उन्होंने पत्र के माध्यम से बताया है कि समस्त विश्व में भोजपुरी सभ्यता, संस्कृति, आचार, व्यव्हार, गीत संगीत अपनी समृद्ध परंपरा के लिए जानी जाती है. मै विगत तीस वर्षों से भोजपुरी लोकसंस्कृति के प्रचार प्रसार में निस्वार्थ भाव से अहर्निश लीन हूँ. मेरे द्वारा बिहार राज्य में पटना, आरा, गया, चंपारण, मोतिहारी, बक्सर, सीतामढ़ी, दरभंगा, मुज्जफरपुर, कैमूर, समस्तीपुर, नवादा, मधुबनी, नालंदा, भागलपुर, वैशाली आदि अनेक मंचो पर समय समय पर भोजपुरी की सेवा प्रदान की गई है. झारखण्ड, उत्तर प्रदेश एवं हिंदुस्तान का कोई भी नगर एवं मंच नहीं है जिस से मैंने पारंपरिक भोजपुरी लोक प्रस्तुति न की हो.

इसके अतिरिक्त हमारे आदरणीय कर्मठ भोजपुरिया पूर्वज सात समंदर पार जिन देशों मे जा बसे है मैंने वहाँ भी भोजपुरी परंपरा का प्रसार किया उनमे प्रमुख है मारीशस , हालैंड, फिजी एवं अमेरिका. मुझे ६ अंतर्राष्ट्रीय विश्व भोजपुरी सम्मेलनों में अपनी प्रस्तुति देने का अवसर प्राप्त हुआ इन सम्मेलनों में मुझे “भिखारी ठाकुर सम्मान” एवं “महेंद्र मिश्र सम्मान” प्रदान किया गया है. दिल्ली मे आयोजित बिहार दिवस पर भी मुझे प्रस्तुति देने के लिए आमंत्रित किया गया था. मै पूरब की बेटी हूँ और पूरब में पली बढ़ी हूँ. पूर्वी उत्तर प्रदेश में भोजपुरी की गंगा बहती है. मुझे गर्व है की उन्ही भोजपुरी संस्कारों ने सींचा और निखारा है एवं लोकप्रियता दिलाई है. मै जब भी बिहार कार्यक्रम देने आई हूँ यहाँ की जनता का असीम आशीर्वाद एवं दुलार मिला है.

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महोदय आपने भोजपुरी के प्रति मेरा समर्पण एवं योगदान देखकर मुझे बिहार भोजपुरी अकादमी का “अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत” नियुक्त किया था. जिसका स्वागत बिहार एवं समस्त देश के भोजपुरी प्रेमियों द्वारा हर्ष निनाद से किया गया किन्तु कुछ व्यक्तियों ने स्वार्थवश इस नियुक्ति पर अकारण सवाल खड़े कर दिए है. जिसे देखकर मेरा अंतर्मन मुझसे कहता है कि मुझे यह पद स्वीकार नहीं करना चाहिए. बिहार एवं भोजपुरी के सम्मान के लिए मै अपनी स्वीकृति वापस लेती हूँ. आपके इस प्रस्ताव के लिए मै बहुत आभारी हूँ. महोदय मैंने गरिमामय जीवन व्यतीत किया है और अपनी गरिमा को अक्षुण बनाये रखना चाहती हूँ. मेरे संस्कार एवं शिक्षा भोजपुरी में गरिमा बनाये रखने के पक्षधर है. मै मानती हूँ कि कलाकार अपने परिश्रम से अपनी लगन से व समाज की स्वीकार्यता से बनता है. मै अपनी लोक प्रस्तुतियों द्वारा भोजपुरी के शालीन सुसंस्कृत एवं समृद्ध स्वरुप को आजीवन गौरवशाली बनाये रखना चाहती हूँ. बिहार में जब भी मुझे स्मरण किया गया है मैंने अपनी प्रस्तुतियां दी है और आगे भी देती रंहूगी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.