/मेरे सम्पादक , मेरे संतापक: अगम, अगोचर की ओर…

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक: अगम, अगोचर की ओर…

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक -२०

-राजीव नयन बहुगुणा||

भय और दौर्बल्य के कारण मेरे पिता सड़क के किनारे एक नाली में गिरे पड़े थे. हमें देख उन्होंने उठने का प्रयास किया , पर फिर लुढ़क गए.उनके शरीर पर धारित एक मात्र वस्त्र जांघिया भी सरक चुका था और वह लहू लुहान थे. सुधांशु धुलिया ने सहारा देकर उन्हें उठाया, और अपने वाहन में रखने लगे.jolly grant airport

एम्बुलेंस में बैठे डाकटर ने फरमान सुनाया यहाँ लाईये.  उनके साथ हम दोनों भी जबरन एम्बुलेंस में ठूंस गए. तुमने इन्हें मारा? बाँहें चढ़ा कर मेरे मित्र ने डाक्टर को घूरा. मेरे वह मित्र अब चूँकि हाई कोर्ट के माननीय न्याय मूर्ति हैं, इस लिए भावी प्रसंगों में अब मैं उनका नामोल्लेख नहीं करूँगा. करीब आधा घंटे बाद वाहन ऋषिकेश के पास जौली ग्रांट हवाई पट्टी पर जा लगा. वहां पहले से ही अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात थे.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

एस डी एम ने फरमान सुनाया – अब आप दोनों जाईये. ये गिरफ्तार हैं और जेल मैन्युअल के मुताबिक़ कैदी के साथ कोई बाहरी व्यक्ति नहीं रहा सकता. मेरे पिता ने प्रतिरोध किया – तुम लोगों से मुझे जान का खतरा है, और मेरी सुरक्षा के लिए इन दोनों की उपस्थिति अनिवार्य है. गधे की गांड में गया तू भी और तेरा ज़ेल मैन्युअल भी, मैंने मजिस्ट्रेट को खरी खोटी सुनाई. मेरे मित्र ने ललकारा – हिम्मत है तो हमे बाहर निकाल के देख. इसी उहा पोह में एक छोटा सा विमान हवाई पट्टी पर उतरा. इन्हें जहाज़ में रखो, मजिस्ट्रेट ने डाक्टर को इंगित किया. डाक्टर पुलिस वालों के साथ मेरे पिता की और लपका, तो वह ज़मीन पर लम्बे लेट गए और बोले – इन दोनों के बगैर मैं बोर्ड नहीं करूँगा. तुम मुझे जान से मारने को कहीं ले जा रहे हो.

( जारी )

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.