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आखिर और कब तक चलेगा अनशन…? अन्ना से न्यूज़ मीडिया की बल्ले-बल्ले

By   /  August 27, 2011  /  3 Comments

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बीबीसी हिन्दी की एडीटर सलमा ज़ैदी का मानना है कि अन्ना हजारे का जो अनशन खबरिया चैनलों के लिए टीआरपी बढ़ाने का जरिया बन कर शुरू हुआ था उसे पंद्रह दिनों तक लीड बनाए रखना आसान नहीं होगा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बारहवें दिन भी जहां एक ओर सरकार और टीम अन्ना के बीच गतिरोध बरकरार है वहीं मीडिया भविष्यवाणी पर भविष्यवाणी किए जा रहा है। चार-पांच दिनों से लगातार मीडिया पहले सुबह, फिर दोपहर, फिर शाम को और फिर रात को ‘कुछ ही देर में’ अनशन टूटने की उम्मीद जताता है, फिर आखिर में वही ढाक के तीन पात रह जाते हैं।

अन्ना के अनशन को जन-आंदोलन और क्रांति की शुरुआत बताकर रिपोर्ट करनेवाले खबरिया चैनलों के लिए अन्ना का अनशन वह मौका साबित हुआ जिसमें उनके दर्शकों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। हाल ही में ज़ी न्यूज के संपादक सतीश के सिंह ने कहा था कि अन्ना का अनशन शुरू होने के बाद जो पहली टीआरपी जारी हुई है उसमें उनके चैनल को अच्छी खासी बढ़त मिली है। दर्शक जहां पहले ज़ी न्यूज़ पर प्रतिदिन औसत 15 मिनट का समय बिताते थे, वहीं उनके न्यूज चैनल को 40 मिनट देखा। लेकिन यह फायदा केवल ज़ी न्यूज़ को नहीं मिला है। दूसरे समाचार चैनलों के लिए भी अन्ना का अनशन एक ऐसा अवसर है कि वे बालिका वधू और केबीसी देखनेवाले शहरी मध्यवर्गीय दर्शकों को अपनी ओर खींच सकें। और इसमें वे कामयाब भी रहे।

दर्शक बटोरने के इस खेल को असरदार बनाने के लिए समाचार चैनलों ने अनशन को जनआंदोलन की मुनादी, अन्ना की अगस्त क्रांति जैसे भड़कदार अलंकरणों से विभूषित कर दिया। जिस दिन अन्ना तिहाड़ जेल से निकलकर रामलीला मैदान की ओर आ रहे थे उस दिन आज तक ने दिल्ली समेत देश भर  में 48 रिपोर्टरों को तैनात कर रखा था। तैनने इसका बाकायदा प्रचार भी किया कि वह अन्ना हजारे के अनशन का सबसे व्यापक कवरेज करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। इसी तरह से इंडिया टीवी ने 50 रिपोर्टरों की तैनाती की थी और अकेले दिल्ली में तीन ओवी वैन लगा रखे थे। अभी भी रामलीला मैदान के बाहर अन्ना के अनशन को कवर करने के लिए कई शिफ्टों में पत्रकारों और कैमरामैनों और मीडियाकर्मियों की तैनाती की जा रही है।

लेकिन अब ऐसा लगता है कि मीडिया अपने ही बुने जाल में फंस गया है। हालांकि कई वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि 15 दिन लंबा वक्त होता है और 15 दिनों तक टीवी के लिए एक ही समाचार पर बने रहना मुश्किल होता है लेकिन भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है जो लोगों के दिलो-दिमाग पर हावी है और वे इसे देखना पसंद कर रहे हैं। मीडिया वाच मैगजीन की एडीटर सीमा मुस्तफा पहले ही कह चुकी हैं कि टीवी मीडिया अन्ना के अनशन के लिए कैम्पेन नहीं कर रहा है बल्कि अपने फायदे के लिए एक ड्रामा रच रहा है।

लेकिन ग्यारह दिनों तक खिंच चुके इस अन्नालीला को मीडिया और अधिक से अधिक आकर्षक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यही कारण है कि अब मीडिया टीम अन्ना और सरकार के बीच हो रही बातचीत के बीच ही अनशन टूटने की अटकलें लगा-लगा कर दर्शक खींचने में जुटा है। सारे चैनल अब एक सुर से बता रहे हैं कि कैसे दोनों पक्षों में सहमति बन जाने पर ‘ कुछ ही देर में’ अन्ना अपना अनशन तोड़ने वाले हैं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. kulwant mittal says:

    यह सच है की अन्ना के अनशन के दौरान मीडिया ने जमकर टी आर पी बटोरी, किन्तु उन्होंने जनता को सरकार का एक गन्दा चेहरा भी सबके सामने उजागर किया कि सरकार किस हद तक गिर सकती है , हालाँकि मीडिया को इस बीच में समाचार भी दिखने चाहिए थे, किन्तु अपनी टी आर पी के चक्कर में वो अपने इस कर्तव्य से हट गए , जो नहीं होना चाहिए था……!!!!!!!!!!!!!

  2. Suresh Rao says:

    इस देश के मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग अन्ना को हीरो बनाकर पैसा कमाने में लगा हुआ है एसा लगता है…..क्या मीडिया दुसरे लोग की बात को भी छाप रहा है ? कुछ और लोग भी इस देश में कुछ बोल रहे है…….उनकी बात क्यों नहीं छाप रहा है…..देश के तमाम लोग अन्ना के आन्दोलन को लोकतंत्र और संविधान के लिए खतरा बता रहे है.. कल लोकसभा में राहुल गाँधी ने स्वयं अन्ना के आन्दोलन को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है….देश के तमाम दुसरे दलित/ पिछड़े और अल्प्शंख्यक लीडर पहले से ही इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे है..स्वामी अग्निवेश ने भी कुछ ऐसा ही बोला है…… समझ में नहीं आता की फिर कुछ चाँद लोग इसे सही ठहराने की मुहीम में क्यों लगे हुवे है……भ्रष्टाचार समाप्त हो ये सबकी इच्छा है.लेकिन इसकी आंड में कही हमारे लोकतान्त्रिक ढांचे को कोई नुकसान पहुचे ये बिलकुल राष्ट्र हित में नहीं होगा. धन्यवाद् .

  3. Dr.O.P.Verma says:

    अन्ना की मुहीम देश को सिर्फ जगाने के बराबर है अब बाकी काम सर्कार को करने दे तो अच्छा होगा. हठधर्मी छोड़ने का समय आ गया है इसलिए अनशन ख़त्म कर देना चाहिए .जो त्रिमूर्ति उनके कंधे पर बन्दूक चला कर अपना छुपा मकसद पूरा करना चाहती है उसे समझना चाहिए.ये भी समझना होगा की पूरा का पूरा देश उनके साथ नहीं है ,सिर्फ यूथ ही सारे देश की नुमाइंदगी नहीं करता.

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