/मेरे संपादक, मेरे संतापक: क़ैद सही है पर उसमें ज़ंजीर का आहन चुभता है…

मेरे संपादक, मेरे संतापक: क़ैद सही है पर उसमें ज़ंजीर का आहन चुभता है…

मेरे संपादक, मेरे संतापक – 21                                               पिछली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

करीब पंद्रह मिनट तक यह झक बाज़ी होती देख विमान के दरवाज़े पर बैठे पायलट सरदार जी ने हस्तक्षेप किया – ” ओये, क्या मंदी गल कित्ता तुसी. मैं अपने इसी जहाज़ पर कयई उग्रवादियों तक को ढो चूका हूँ, तब भी ऐसा ड्रामा नहीं देखा. यासीन मलिक को श्रीनगर से मैं ही उठा लाया था. क्या ज़रुरत है इन पुलिस वालों की? छोडो इनको और इन दोनों बन्दों को बाबा जी के साथ आने दो. मैं ऐसे भी किसी हथियारबंद आदमी को जहाज़ पर नहीं बैठने दूंगा.slbahuguna

एस डी एम किंकर्तव्यविमूढ़ होकर एक किनारे जाकर वाकी टाकी से कहीं बात करने लगा. ज्यादा देर करना उसे भारी पड सकता था. कुछ ही देर पहले ओ एन जी सी का एक अन्य विशेष विमान वहां उतरा तो उसके सभी सवार अधिकारियों ने मेरे पिता सुन्दर लाल बहुगुणा को घेर लिया, और पुलिस – प्रशासन को जम कर कोसने लगे. उन्हीं में से एक ने डिटाल ला कर मेरे पिता के ज़ख्मों पर लगाया. मज़बूरन एस डी एम ने हमें भी गिरफ्तार कर लिया, क्योंकि इसके सिवा हमें साथ ले जाने का कोई रास्ता नहीं था.

कानूनी पेच फंस सकता था. विमान में चढ़ते ही दोनों पायलटों ने मेरे पिता के चरण स्पर्श किये. इन दोनों सरकारी कर्मचारियों की ” नमक हरामी ” पर एस डी एम हैरान था. वह एक राजद्रोही कैदी के चरणों में अवनत हो रहे थे. एक पायलट सरदार जी थे और दुसरे गले में क्रास लटकाए क्रिश्चियन.

विमान में सम्मान सहित बैठने लायक चार ही सीटें थीं. बाकी पीछे एक लम्बी आड़ी सीट सामान रखने या भृत्यों के बैठने के लिए थी. एस डी एम् ने मुझे और मेरे मित्र को उस नौकरों वाली सीट पर बैठने का इशारा किया. मित्र ने उसे धकियाया और हम दोनों ने प्रतिष्ठित सीट ले ली.

धक्का खाकर एस डी एम जवाबी हमला करने को उद्यत हुआ तो पायलट ने धमकाया – अभी ए टी सी को बताता हूँ की टिहरी से बाबा जी के साथ आया एडमिनिस्ट्रेशन का बन्दा जहाज़ में हंगामा कर रहा है. एस डी एम् घबराकर मेरे पिता की बगल में बैठ गया. उसे समझ आ गया था की अब उसका राज ख़त्म हो चुका है, और विमान में पायलेट ही मजिस्ट्रेट है.

हाथा पायी की नौबत एक बार फिर आई, जब मित्र ने उसके हाथ से अखबार छीन लिया, जो सरदार जी दिल्ली से लाए थे. सरदार जी ने फिर उसे धमकाया – ओये नहीं मानेगा न तू ? विमान अपनी वांछित ऊंचाई हासिल कर चुका था, और डाक्टर तथा डी एस पी नौकरों वाली सीट ग्रहण कर चुके थे. शाही कैदियों को लेकर जा रहे इस दल में अगर कोई तनाव मुक्त था, तो वह थे विमान के दोनों पायलेट

( जारी )                                                                                                                      अगली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.